ओलंपिक (तस्वीर क्रेडिट@siryanshyadav)

आईओसी का बड़ा फैसला,2028 ओलंपिक से महिला स्पर्धाओं में ट्रांसजेंडर महिलाओं की एंट्री पर रोक

नई दिल्ली,28 मार्च (युआईटीवी)- अंतर्राष्ट्रीय खेल जगत में एक बड़ा और बहस को जन्म देने वाला फैसला सामने आया है। इंटरनेशनल ओलंपिक कमेटी (आईओसी) ने घोषणा की है कि 2028 के लॉस एंजिल्स ओलंपिक और भविष्य में होने वाले ओलंपिक खेलों में ट्रांसजेंडर महिलाएँ महिला कैटेगरी के इवेंट्स में हिस्सा नहीं ले पाएँगी। यह फैसला खेलों में निष्पक्षता,प्रतिस्पर्धा के संतुलन और एथलीटों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए लिया गया है।

आईओसी की नई नीति के अनुसार अब केवल वे एथलीट,जो जन्म से जैविक रूप से महिला हैं,उन्हें ही महिला वर्ग की प्रतियोगिताओं में भाग लेने की अनुमति दी जाएगी। इस निर्णय के तहत लिंग की पुष्टि के लिए खिलाड़ियों को एक बार जीन टेस्ट से गुजरना होगा। यह परीक्षण थूक,ब्लड सैंपल या गाल के स्वैब के माध्यम से किया जा सकेगा। इस प्रक्रिया का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि प्रतियोगिता में भाग लेने वाले एथलीट समान जैविक आधार पर प्रतिस्पर्धा करें।

हालाँकि,आईओसी ने इस नीति में एक महत्वपूर्ण अपवाद भी रखा है। जो एथलीट जन्म के समय महिला थे,लेकिन बाद में स्वयं को ट्रांसजेंडर के रूप में पहचानते हैं,उन्हें महिला कैटेगरी में भाग लेने की अनुमति दी जाएगी। इस तरह समिति ने एक संतुलन बनाने की कोशिश की है,जिससे खेलों की निष्पक्षता के साथ-साथ व्यक्तिगत पहचान का भी सम्मान बना रहे।

आईओसी की अध्यक्ष क्रिस्टी कोवेंट्री ने इस फैसले का बचाव करते हुए कहा कि यह नीति पूरी तरह वैज्ञानिक तथ्यों और मेडिकल विशेषज्ञों की सलाह पर आधारित है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ओलंपिक जैसे उच्च स्तरीय खेलों में जीत और हार के बीच बहुत ही छोटा अंतर होता है और ऐसे में जैविक अंतर महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

कोवेंट्री ने कहा कि बायोलॉजिकल पुरुषों का महिला कैटेगरी में प्रतिस्पर्धा करना न केवल निष्पक्षता के खिलाफ है,बल्कि कुछ खेलों में यह सुरक्षा के लिहाज से भी जोखिम भरा हो सकता है। उन्होंने यह भी जोर देकर कहा कि हर एथलीट के साथ सम्मान और गरिमा के साथ व्यवहार किया जाना चाहिए और इस नीति का उद्देश्य किसी के अधिकारों का हनन करना नहीं,बल्कि खेलों में संतुलन बनाए रखना है।

यह फैसला पहले लागू नियमों से काफी अलग है। अब तक आईओसी ट्रांसजेंडर महिलाओं को महिला स्पर्धाओं में भाग लेने की अनुमति देता था,बशर्ते उनका टेस्टोस्टेरोन स्तर एक निर्धारित सीमा से नीचे हो। कई मामलों में यह निर्णय व्यक्तिगत खेल संघों पर छोड़ दिया जाता था,जिससे अलग-अलग खेलों में अलग-अलग नियम लागू होते थे।

नई नीति के तहत आईओसी ने एक समान और स्पष्ट नियम लागू करने का निर्णय लिया है,ताकि सभी खेलों में एक जैसी गाइडलाइन का पालन किया जा सके। इससे खेल संगठनों के बीच नियमों में असमानता खत्म होगी और एथलीटों के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश उपलब्ध होंगे।

गौरतलब है कि पिछले कुछ वर्षों में ट्रांसजेंडर एथलीटों की भागीदारी को लेकर खेल जगत में लगातार बहस होती रही है। कई अंतर्राष्ट्रीय खेल संगठनों ने पहले ही ट्रांसजेंडर महिलाओं की महिला वर्ग में भागीदारी पर प्रतिबंध लगा दिया है या सख्त नियम लागू किए हैं। ऐसे में आईओसी का यह फैसला इस बहस को एक नई दिशा देने वाला माना जा रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय महिला खिलाड़ियों के लिए अधिक निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करेगा। कई महिला एथलीटों ने पहले भी इस मुद्दे को उठाया था कि जैविक रूप से पुरुष रहे खिलाड़ियों के साथ मुकाबला करना उनके लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है। इस फैसले से उन चिंताओं को कुछ हद तक संबोधित किया गया है।

हालाँकि,इस निर्णय के आलोचक भी सामने आ सकते हैं,जो इसे ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों के खिलाफ मान सकते हैं। ऐसे में आने वाले समय में इस नीति को लेकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बहस और चर्चा जारी रहने की संभावना है।

आईओसी का यह फैसला ओलंपिक खेलों की दिशा और स्वरूप को प्रभावित करने वाला एक बड़ा कदम है। यह न केवल खेलों में निष्पक्षता को प्राथमिकता देता है,बल्कि यह भी दिखाता है कि वैश्विक खेल संस्थाएं बदलते सामाजिक और वैज्ञानिक संदर्भों के अनुसार अपनी नीतियों में बदलाव करने के लिए तैयार हैं। आने वाले वर्षों में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस निर्णय का अंतर्राष्ट्रीय खेल जगत पर क्या प्रभाव पड़ता है और विभिन्न देश तथा खेल संगठन इसे किस तरह अपनाते हैं।