वाशिंगटन,11 मार्च (युआईटीवी)- पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और वैश्विक ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता के बीच अमेरिका ने एक अहम फैसला लेते हुए भारत को रूसी तेल खरीदने के लिए अस्थायी छूट देने की घोषणा की है। व्हाइट हाउस के अनुसार यह निर्णय वैश्विक ऊर्जा बाजार को स्थिर रखने और ईरान के साथ चल रहे सैन्य टकराव से उत्पन्न आपूर्ति संकट को कम करने के उद्देश्य से लिया गया है। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि यह कदम पूरी तरह अस्थायी है और इसका मकसद दुनिया भर में तेल की आपूर्ति में पैदा हुए अंतर को भरना है।
व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लीविट ने मीडिया से बातचीत के दौरान बताया कि यह फैसला राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप,अमेरिकी ट्रेजरी विभाग और राष्ट्रीय सुरक्षा टीम के वरिष्ठ सदस्यों के बीच गहन चर्चा के बाद लिया गया। उन्होंने कहा कि भारत अमेरिका का एक महत्वपूर्ण साझेदार है और दोनों देशों के बीच ऊर्जा और रणनीतिक सहयोग लगातार मजबूत हुआ है। लेविट ने कहा कि भारत ने पहले भी कई मौकों पर रूस से तेल खरीद को सीमित करने के लिए कदम उठाए थे,इसलिए मौजूदा परिस्थितियों में उसे यह अस्थायी छूट देना उचित समझा गया।
लेविट के अनुसार ईरान से जुड़े मौजूदा संकट ने वैश्विक तेल आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित किया है। पश्चिम एशिया दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा उत्पादक क्षेत्रों में से एक है और यहां किसी भी प्रकार की अस्थिरता का सीधा असर वैश्विक बाजारों पर पड़ता है। उन्होंने कहा कि ईरान के कारण उत्पन्न स्थिति से वैश्विक तेल आपूर्ति में अस्थायी कमी पैदा हो गई है। इसी कमी को दूर करने के लिए अमेरिका ने भारत को सीमित समय के लिए रूसी तेल आयात की अनुमति दी है।
व्हाइट हाउस का कहना है कि इस निर्णय का उद्देश्य केवल वैश्विक ऊर्जा संतुलन बनाए रखना है। प्रशासन के अनुसार इस व्यवस्था से रूस को कोई बड़ा आर्थिक लाभ मिलने की संभावना नहीं है। अधिकारियों का कहना है कि छूट देने से पहले ही कुछ तेल शिपमेंट भारत के लिए भेजे जा चुके थे,इसलिए इस फैसले का मकसद उन आपूर्ति प्रक्रियाओं को व्यवस्थित करना भी था जो पहले से चल रही थीं।
यह घोषणा ऐसे समय में हुई है,जब अमेरिका ईरान के खिलाफ व्यापक सैन्य अभियान चला रहा है। इस अभियान को ऑपरेशन एपिक फ्यूरी नाम दिया गया है। अमेरिकी प्रशासन के मुताबिक इस ऑपरेशन का उद्देश्य ईरान की मिसाइल क्षमता और उसकी नौसैनिक ताकत को कमजोर करना है,ताकि क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखी जा सके और अंतर्राष्ट्रीय समुद्री मार्ग सुरक्षित रह सकें।
लेविट ने बताया कि करीब दस दिन पहले शुरू हुए इस अभियान में अब तक तेज प्रगति हुई है। उन्होंने दावा किया कि अमेरिकी सैन्य बलों ने अब तक 5,000 से अधिक लक्ष्यों पर हमला किया है। इन हमलों में ईरान के कई सैन्य ठिकानों,मिसाइल लॉन्चिंग साइट्स और रणनीतिक सुविधाओं को निशाना बनाया गया है। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि इन कार्रवाइयों का उद्देश्य ईरान की आक्रामक सैन्य क्षमता को कम करना और उसके क्षेत्रीय प्रभाव को सीमित करना है।
व्हाइट हाउस के अनुसार इस अभियान के बाद ईरान की जवाबी हमले करने की क्षमता में काफी गिरावट आई है। प्रशासन का दावा है कि ऑपरेशन शुरू होने के बाद ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल हमलों में 90 प्रतिशत से अधिक की कमी आई है। इसी तरह ड्रोन हमलों में भी लगभग 35 प्रतिशत तक गिरावट दर्ज की गई है। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि यह संकेत है कि अभियान अपने रणनीतिक लक्ष्यों को हासिल करने में सफल हो रहा है।
अमेरिकी सेना ने इस दौरान ईरान की नौसैनिक क्षमताओं को भी निशाना बनाया है। लेविट के अनुसार अब तक 50 से अधिक ईरानी नौसैनिक जहाजों को नष्ट कर दिया गया है। इनमें एक बड़ा ड्रोन कैरियर जहाज भी शामिल है,जिसे ईरानी नौसेना की महत्वपूर्ण संपत्ति माना जाता था। अमेरिकी प्रशासन का दावा है कि इन कार्रवाइयों के बाद ईरान की नौसेना को युद्ध की स्थिति में काफी हद तक निष्क्रिय कर दिया गया है।
व्हाइट हाउस ने यह भी स्पष्ट किया कि ऑपरेशन एपिक फ्यूरी के लक्ष्य पहले से तय हैं और उनमें कोई बदलाव नहीं किया गया है। प्रशासन के अनुसार इस अभियान का मुख्य उद्देश्य ईरान की बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता को नष्ट करना,उसके मिसाइल उद्योग को कमजोर करना और यह सुनिश्चित करना है कि ईरान से जुड़े आतंकवादी संगठन या प्रॉक्सी समूह क्षेत्र में अस्थिरता न फैला सकें। इसके साथ ही अमेरिका का एक प्रमुख लक्ष्य यह भी है कि ईरान कभी परमाणु हथियार हासिल न कर सके।
अमेरिकी प्रशासन ने ऊर्जा आपूर्ति मार्गों की सुरक्षा को भी इस अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया है। पश्चिम एशिया का होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक है। वैश्विक स्तर पर बड़ी मात्रा में कच्चा तेल इसी संकरे समुद्री रास्ते से होकर गुजरता है। ऐसे में यदि इस मार्ग पर किसी प्रकार का संकट पैदा होता है तो उसका असर पूरी दुनिया के ऊर्जा बाजार पर पड़ सकता है।
लेविट ने कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप ने इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग से ऊर्जा आपूर्ति के निरंतर प्रवाह को सुनिश्चित करने का वादा दोहराया है। उन्होंने कहा कि अमेरिका अपने सहयोगियों के साथ मिलकर यह सुनिश्चित करेगा कि होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल और गैस का परिवहन बिना किसी बाधा के जारी रहे। यह न केवल अमेरिका बल्कि उसके सभी सहयोगी देशों की ऊर्जा सुरक्षा के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को दी गई यह अस्थायी छूट वैश्विक ऊर्जा संतुलन बनाए रखने की रणनीति का हिस्सा है। भारत दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा आयातकों में से एक है और उसकी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात पर निर्भर करता है। ऐसे में यदि वैश्विक बाजार में आपूर्ति बाधित होती है,तो उसका असर भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर भी पड़ सकता है।
अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि भारत के साथ उसका रणनीतिक संबंध लगातार मजबूत हो रहा है और दोनों देश कई वैश्विक मुद्दों पर मिलकर काम कर रहे हैं। ऊर्जा सुरक्षा,समुद्री मार्गों की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता ऐसे मुद्दे हैं जिन पर दोनों देशों की साझेदारी महत्वपूर्ण मानी जाती है।
कुल मिलाकर अमेरिका द्वारा भारत को दी गई रूसी तेल खरीद की अस्थायी छूट को वैश्विक ऊर्जा बाजार में संतुलन बनाए रखने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। ईरान के साथ बढ़ते सैन्य तनाव और पश्चिम एशिया में अस्थिरता के बीच यह फैसला न केवल ऊर्जा आपूर्ति को बनाए रखने,बल्कि अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में कीमतों और आपूर्ति के दबाव को कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
