ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई

अमेरिका से बातचीत पर ईरान की शर्तें सख्त,ओमान में केवल परमाणु मुद्दों पर वार्ता की माँग,अरब सागर में ड्रोन घटना से बढ़ा तनाव

नई दिल्ली,4 फरवरी (युआईटीवी)- ईरान और अमेरिका के बीच एक बार फिर तनावपूर्ण माहौल के संकेत मिल रहे हैं। इस हफ्ते प्रस्तावित द्विपक्षीय बातचीत को लेकर ईरान ने साफ कर दिया है कि वह यह वार्ता तुर्किए के इस्तांबुल में नहीं,बल्कि ओमान में करना चाहता है। इसके साथ ही तेहरान ने यह भी स्पष्ट किया है कि बैठक का एजेंडा केवल और केवल परमाणु मुद्दों तक सीमित रहना चाहिए। ईरान की इस माँग को अमेरिका द्वारा मध्य पूर्व में सैन्य गतिविधियाँ बढ़ाने और हाल ही में अरब सागर में हुई ड्रोन घटना के संदर्भ में देखा जा रहा है,जिसने दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद अविश्वास को और गहरा कर दिया है।

दरअसल,शुक्रवार को इस्तांबुल में ईरान-अमेरिका के बीच बातचीत होने की चर्चा थी,लेकिन उससे ठीक पहले ईरान ने स्थान और विषय दोनों पर आपत्ति जता दी। ईरान का कहना है कि ओमान पहले भी संवेदनशील कूटनीतिक वार्ताओं के लिए एक भरोसेमंद और तटस्थ मंच रहा है,जहाँ बिना किसी बाहरी दबाव के संवाद संभव हो सकता है। साथ ही,ईरानी अधिकारियों का यह भी तर्क है कि यदि बातचीत का दायरा बढ़ाया गया तो इससे मूल मुद्दे,यानी ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर केंद्रित चर्चा भटक सकती है।

ईरान का यह रुख ऐसे समय सामने आया है,जब अमेरिका ने मध्य पूर्व में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ा दी है। अमेरिकी नौसेना के अनुसार,मंगलवार को अरब सागर में एक ईरानी ड्रोन को मार गिराया गया,जो यूएसएस अब्राहम लिंकन एयरक्राफ्ट कैरियर के बेहद करीब आ गया था। यह एयरक्राफ्ट कैरियर ईरान के दक्षिणी तट से करीब 500 मील दूर अंतर्राष्ट्रीय जल क्षेत्र में तैनात था। इस घटना ने दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद तनाव को और तेज कर दिया है।

अमेरिकी सेंट्रल कमांड के प्रवक्ता कैप्टन टिम हॉकिन्स ने इस घटना को लेकर मीडिया को जानकारी दी। उन्होंने बताया कि बिना पायलट वाला ईरानी ड्रोन अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर की ओर तेजी से बढ़ रहा था। हॉकिन्स के अनुसार,अमेरिकी सेना ने स्थिति को शांत करने के लिए डी-एस्केलेटरी उपाय अपनाए, लेकिन इसके बावजूद ड्रोन जहाज की दिशा में उड़ता रहा। ऐसे में कैरियर और उस पर तैनात कर्मियों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए यूएसएस अब्राहम लिंकन से जुड़े एक एफ-35सी फाइटर जेट ने ड्रोन को मार गिराया।

कैप्टन हॉकिन्स ने यह भी स्पष्ट किया कि इस पूरी घटना में किसी भी अमेरिकी सैनिक को कोई नुकसान नहीं हुआ और न ही अमेरिकी सैन्य उपकरणों को कोई क्षति पहुँचीं। अमेरिका की ओर से इसे आत्मरक्षा में उठाया गया कदम बताया जा रहा है। हालाँकि,ईरान ने इस घटना को अलग नजरिए से पेश किया है।

ईरानी मीडिया,खासतौर पर तस्नीम न्यूज एजेंसी ने दावा किया है कि यह ड्रोन ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी आईआरजीसी का था और वह अरब सागर के अंतर्राष्ट्रीय जल क्षेत्र में एक निगरानी मिशन पर था। एजेंसी के मुताबिक,ड्रोन से संपर्क उस समय टूट गया,जब वह उड़ान पर था। तस्नीम ने एक जानकार ईरानी सूत्र के हवाले से कहा कि संपर्क टूटने से पहले ड्रोन ने अपनी निगरानी से जुड़ी फुटेज सफलतापूर्वक आईआरजीसी कमांड सेंटर को भेज दी थी।

ईरान का कहना है कि ड्रोन के साथ संपर्क टूटने की असली वजह की जाँच की जा रही है और जाँच पूरी होने के बाद विस्तृत जानकारी सार्वजनिक की जाएगी। हालाँकि,अमेरिकी पक्ष के इस दावे पर कि ड्रोन आक्रामक तरीके से एयरक्राफ्ट कैरियर के करीब आया था,ईरान ने सीधे तौर पर कोई टिप्पणी नहीं की है। इसके बावजूद,यह साफ है कि दोनों देशों के बयानों में जमीन-आसमान का फर्क है,जो आपसी अविश्वास को दर्शाता है।

इसी पृष्ठभूमि में ईरान की ओर से बातचीत के स्थान और एजेंडे को लेकर सख्त रुख अपनाना कई संकेत देता है। विश्लेषकों का मानना है कि तेहरान नहीं चाहता कि सैन्य तनाव के बीच व्यापक राजनीतिक या क्षेत्रीय मुद्दों पर बातचीत हो,क्योंकि इससे अमेरिका को दबाव बनाने का मौका मिल सकता है। ईरान की प्राथमिकता फिलहाल अपने परमाणु कार्यक्रम से जुड़े प्रतिबंधों और शर्तों पर स्पष्ट और केंद्रित संवाद करना है।

वहीं,अमेरिका की ओर से अभी तक ईरान की इन नई माँगों पर औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है,लेकिन यह तय माना जा रहा है कि यदि बातचीत का स्थान बदला जाता है और एजेंडा सीमित किया जाता है,तो इसका असर व्यापक कूटनीतिक समीकरणों पर भी पड़ेगा। ओमान लंबे समय से अमेरिका और ईरान के बीच बैकचैनल कूटनीति का केंद्र रहा है और ऐसे में वहाँ बातचीत होना दोनों पक्षों के लिए अपेक्षाकृत सहज हो सकता है।

अरब सागर में ड्रोन घटना,मध्य पूर्व में अमेरिकी सैन्य तैनाती और बातचीत की शर्तों पर ईरान की सख्ती यह संकेत देती है कि आने वाले दिनों में ईरान-अमेरिका संबंधों में तनाव और कूटनीति,दोनों साथ-साथ चलने वाले हैं। यह देखना अहम होगा कि क्या दोनों देश किसी साझा आधार पर बातचीत के लिए तैयार होते हैं या फिर हालिया घटनाक्रम संवाद की राह को और मुश्किल बना देगा।