संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी ) (तस्वीर क्रेडिट@Quantum_akr)

खाड़ी देशों पर ईरान के हमलों की संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने की कड़ी निंदा,13 मतों से प्रस्ताव पारित

संयुक्त राष्ट्र,12 मार्च (युआईटीवी)- मध्य पूर्व में बढ़ते सैन्य तनाव के बीच संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) ने खाड़ी देशों पर हुए हालिया हमलों को लेकर एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किया है। इस प्रस्ताव में ईरान द्वारा खाड़ी क्षेत्र के कई देशों पर किए गए मिसाइल और ड्रोन हमलों की कड़ी निंदा की गई है। प्रस्ताव को सुरक्षा परिषद में बहरीन की ओर से पेश किया गया था और इसे परिषद के 13 सदस्यों का समर्थन मिला। हालाँकि,मतदान के दौरान रूस और चीन ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया,जिससे यह मुद्दा वैश्विक कूटनीति के केंद्र में आ गया है। प्रस्ताव पारित होने के बाद तेहरान ने इसकी तीखी आलोचना करते हुए इसे सुरक्षा परिषद के मंच का “खुलेआम दुरुपयोग” बताया है।

यह प्रस्ताव खाड़ी क्षेत्र में हाल ही में हुए हमलों की पृष्ठभूमि में सामने आया है,जिनमें कई देशों के महत्वपूर्ण नागरिक और आर्थिक ढाँचे को निशाना बनाए जाने का आरोप लगाया गया है। संयुक्त राष्ट्र में बहरीन के स्थायी प्रतिनिधि जमाल फारिस अलरोवैई ने परिषद में कहा कि खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) के सदस्य देशों ने सामूहिक रूप से ईरान की ओर से दागी गई 954 से अधिक मिसाइलों,लगभग 2,500 ड्रोन और 17 विमानों को इंटरसेप्ट किया है। उनके अनुसार इन हमलों ने न केवल क्षेत्रीय सुरक्षा को गंभीर रूप से प्रभावित किया है,बल्कि वैश्विक व्यापार और समुद्री मार्गों पर भी दबाव बढ़ा दिया है।

अलरोवैई ने परिषद को बताया कि जीसीसी के छह सदस्य देशों—बहरीन,कुवैत,ओमान, कतर,सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था के तहत इन हमलों का मुकाबला किया। उन्होंने कहा कि इन हमलों का उद्देश्य क्षेत्रीय स्थिरता को कमजोर करना और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मार्गों को बाधित करना था। उनके मुताबिक इस प्रकार की सैन्य गतिविधियाँ अंतर्राष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सिद्धांतों का स्पष्ट उल्लंघन हैं।

इस प्रस्ताव में यह भी कहा गया कि हमलों के दौरान कई नागरिक प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया गया। रिपोर्टों के अनुसार आवासीय इमारतों,खाद्य वितरण केंद्रों,हवाई अड्डों, बंदरगाहों,ऊर्जा संयंत्रों और अन्य महत्वपूर्ण नागरिक ढाँचों पर हमले किए गए। प्रस्ताव में इन कार्रवाइयों को अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बताया गया है।

संयुक्त राष्ट्र में संयुक्त अरब अमीरात के स्थायी प्रतिनिधि मोहम्मद अबुशाहब ने परिषद में अपने संबोधन में कहा कि यूएई ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि उसकी भूमि,हवाई क्षेत्र या क्षेत्रीय जल का उपयोग किसी भी देश पर हमले के लिए नहीं किया जाएगा। इसके बावजूद ईरान ने उनके देश को निशाना बनाया। उन्होंने बताया कि यूएई की रक्षा प्रणाली ने कई हमलों को विफल किया,अन्यथा भारी जान-माल का नुकसान हो सकता था।

अबूशहाब के अनुसार ईरानी हमलों का असर केवल क्षेत्रीय देशों तक सीमित नहीं रहा,बल्कि इसके कारण कई अन्य देशों के नागरिक भी प्रभावित हुए। उन्होंने कहा कि इन हमलों से कम से कम 25 देशों के नागरिक प्रभावित हुए हैं,जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह संकट केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं है,बल्कि इसका असर वैश्विक स्तर पर महसूस किया जा रहा है।

सुरक्षा परिषद में पारित प्रस्ताव में बहरीन,कुवैत,ओमान,कतर,सऊदी अरब,संयुक्त अरब अमीरात और जॉर्डन पर हुए हमलों की कड़ी निंदा की गई है। इसमें यह भी कहा गया है कि इस प्रकार की कार्रवाइयाँ संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सिद्धांतों के खिलाफ हैं और अंतर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन करती हैं। प्रस्ताव में ईरान से तुरंत इन हमलों को बंद करने और क्षेत्र में शांति बहाल करने की अपील की गई है।

इसके साथ ही प्रस्ताव में संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 51 का भी उल्लेख किया गया है,जो किसी देश को व्यक्तिगत और सामूहिक आत्मरक्षा का अधिकार देता है। परिषद ने कहा कि यदि किसी देश पर हमला होता है,तो उसे अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठाने का अधिकार है।

प्रस्ताव में विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य और उसके आसपास के क्षेत्रों का उल्लेख किया गया है,जो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग माना जाता है। प्रस्ताव में कहा गया कि इस क्षेत्र में नागरिकों,महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे और वाणिज्यिक जहाजों को निशाना बनाना अत्यंत गंभीर और अस्वीकार्य है।

इस बहस के दौरान संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के राजदूत आसिम इफ्तिखार अहमद ने भी परिषद को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि 28 फरवरी को हुए हमलों के बाद अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को गंभीर खतरा पैदा हो गया है। उन्होंने बताया कि संयुक्त अरब अमीरात में हुए हमलों में कम से कम दो पाकिस्तानी नागरिकों की जान चली गई। इसके अलावा खाड़ी देशों में रहने वाले लाखों पाकिस्तानी नागरिक भी इस संकट से प्रभावित हो सकते हैं।

आसिम इफ्तिखार अहमद ने यह भी कहा कि इन हमलों के कारण ईंधन की आपूर्ति और आवश्यक विमानन संपर्क भी प्रभावित हुए हैं। उन्होंने परिषद से अपील की कि इस संकट का समाधान सैन्य कार्रवाई के बजाय संवाद और कूटनीति के माध्यम से खोजा जाना चाहिए। उन्होंने सभी पक्षों से जल्द-से-जल्द बातचीत की मेज पर लौटने का आग्रह किया।

फ्रांस के प्रतिनिधि जेरोम बोनाफॉन्ट ने परिषद में कहा कि वर्तमान तनाव बढ़ने के लिए ईरान काफी हद तक जिम्मेदार है। उन्होंने यह भी कहा कि फ्रांस लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर चिंतित रहा है। उनके अनुसार क्षेत्र में बढ़ता सैन्य तनाव वैश्विक सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है।

इस प्रस्ताव को अंततः सुरक्षा परिषद में 13 मतों से पारित कर दिया गया। रूस और चीन ने मतदान में भाग नहीं लिया,जबकि अन्य सदस्य देशों ने इसका समर्थन किया। पाकिस्तान ने भी इस प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया और कहा कि वह इस संकट से सीधे तौर पर प्रभावित देशों में से एक है।

प्रस्ताव में यह भी कहा गया कि सुरक्षा परिषद क्षेत्रीय विवादों को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाने के लिए जीसीसी देशों और अन्य क्षेत्रीय पक्षों के मध्यस्थता प्रयासों का समर्थन करती है। परिषद ने इस बात पर जोर दिया कि आगे तनाव बढ़ने से रोकने के लिए कूटनीतिक प्रयासों को तेज करना आवश्यक है।

सुरक्षा परिषद ने मध्य पूर्व में स्थिरता और शांति बनाए रखने की अपनी प्रतिबद्धता को भी दोहराया। परिषद ने खाड़ी देशों और जॉर्डन की संप्रभुता,क्षेत्रीय अखंडता और राजनीतिक स्वतंत्रता के प्रति अपने समर्थन को दोहराते हुए कहा कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को मिलकर इस क्षेत्र में शांति बनाए रखने के लिए प्रयास करने चाहिए।

हालाँकि,इस प्रस्ताव से पहले परिषद में एक अन्य मसौदा प्रस्ताव भी पेश किया गया था। यह मसौदा प्रस्ताव रूस की ओर से लाया गया था,जिसमें मध्य पूर्व में बढ़ते सैन्य तनाव को कम करने के लिए सभी पक्षों से तुरंत सैन्य गतिविधियाँ रोकने का आग्रह किया गया था,लेकिन इस प्रस्ताव को परिषद में समर्थन नहीं मिल पाया क्योंकि संयुक्त राज्य अमेरिका ने इसे वीटो कर दिया।

रूस के प्रस्ताव को केवल चार देशों का समर्थन मिला,जिनमें रूस,चीन,सोमालिया और पाकिस्तान शामिल थे। इसके विपरीत अमेरिका और लातविया ने इसके खिलाफ मतदान किया। वहीं यूनाइटेड किंगडम,फ्रांस,बहरीन,कोलंबिया,डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो,डेनमार्क,ग्रीस,लाइबेरिया और पनामा सहित नौ देशों ने मतदान से परहेज किया।

विश्लेषकों का मानना है कि सुरक्षा परिषद में इस तरह के विभाजन से यह स्पष्ट होता है कि मध्य पूर्व संकट को लेकर वैश्विक शक्तियों के बीच मतभेद बने हुए हैं। एक ओर कुछ देश ईरान की सैन्य गतिविधियों की कड़ी निंदा कर रहे हैं,जबकि दूसरी ओर कुछ देश क्षेत्रीय तनाव को कम करने के लिए संतुलित कूटनीतिक दृष्टिकोण अपनाने की बात कर रहे हैं।

फिलहाल सुरक्षा परिषद का यह प्रस्ताव मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक कदम माना जा रहा है। हालाँकि,विशेषज्ञों का कहना है कि केवल प्रस्ताव पारित होने से स्थिति तुरंत सामान्य नहीं होगी। इसके लिए क्षेत्रीय और वैश्विक शक्तियों के बीच व्यापक संवाद और भरोसे की बहाली जरूरी होगी।

आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि ईरान इस प्रस्ताव पर किस प्रकार प्रतिक्रिया देता है और क्या क्षेत्रीय देशों के बीच कूटनीतिक बातचीत के लिए कोई नया रास्ता निकल पाता है। मध्य पूर्व लंबे समय से वैश्विक राजनीति का संवेदनशील केंद्र रहा है और यहाँ होने वाली हर बड़ी घटना का असर विश्व राजनीति,ऊर्जा बाजार और अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा पर पड़ता है।