अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (तस्वीर क्रेडिट@garrywalia_)

ईरान के तेल पर नजर या कूटनीतिक दबाव? डोनाल्ड ट्रंप के बयान से बढ़ी मध्य पूर्व में हलचल

वाशिंगटन,30 मार्च (युआईटीवी)- मध्य पूर्व में जारी तनाव और संघर्ष के बीच डोनाल्ड ट्रंप का ताजा बयान अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में नई बहस छेड़ रहा है। पिछले एक महीने से अधिक समय से जारी ईरान से जुड़ी जंग के बीच ट्रंप ने खुलकर कहा है कि वह ईरान का तेल अपने नियंत्रण में लेना चाहते हैं और इसके लिए देश के सबसे अहम तेल निर्यात केंद्र खार्ग द्वीप पर कब्जा करने का विकल्प भी उनके सामने मौजूद है। उनके इस बयान ने न केवल कूटनीतिक हलकों में चिंता बढ़ाई है,बल्कि इससे युद्ध के और लंबा खिंचने की आशंका भी गहरा गई है।

ब्रिटिश अखबार फाइनेंशियल टाइम्स को दिए इंटरव्यू में ट्रंप ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “सच कहूँ,तो मेरी पसंदीदा चीज ईरान का तेल लेना है।” यह बयान अपने आप में बेहद असाधारण माना जा रहा है,क्योंकि किसी भी देश के प्राकृतिक संसाधनों पर इस तरह की खुली टिप्पणी अंतर्राष्ट्रीय नियमों और संप्रभुता के सिद्धांतों पर सवाल खड़े करती है। ट्रंप ने अपनी बात को और स्पष्ट करते हुए इसकी तुलना वेनेजुएला से की,जहाँ अमेरिका कथित तौर पर राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को हटाने के बाद तेल उद्योग पर नियंत्रण बनाए रखने की रणनीति पर विचार करता रहा है।

खार्ग द्वीप,जिसे ईरान के तेल निर्यात की जीवनरेखा माना जाता है,इस पूरे विवाद का केंद्र बन गया है। रिपोर्ट्स के अनुसार,ईरान के कुल तेल निर्यात का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा इसी द्वीप के जरिए वैश्विक बाजार तक पहुँचता है। ऐसे में यदि इस द्वीप पर किसी प्रकार की सैन्य कार्रवाई होती है,तो इसका असर केवल ईरान तक सीमित नहीं रहेगा,बल्कि पूरी दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव पड़ेगा।

ट्रंप ने इंटरव्यू में यह भी कहा कि “हो सकता है हम खार्ग द्वीप पर कब्जा कर लें,हो सकता है न करें। हमारे पास बहुत सारे विकल्प हैं।” इस बयान से यह साफ संकेत मिलता है कि अमेरिका सैन्य और कूटनीतिक दोनों रास्तों को खुला रखे हुए है। हालाँकि,उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि यदि ऐसा कदम उठाया जाता है,तो अमेरिका को वहाँ कुछ समय तक अपनी मौजूदगी बनाए रखनी होगी,जो इस क्षेत्र में लंबे समय तक सैन्य तनाव को जन्म दे सकता है।

ट्रंप का यह दावा कि खार्ग द्वीप पर ईरान की सुरक्षा व्यवस्था कमजोर है,भी काफी चर्चा का विषय बना हुआ है। उन्होंने कहा कि “हम बहुत आसानी से इस पर कब्जा कर सकते हैं।” हालाँकि,सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह का कोई भी अभियान बेहद जोखिम भरा होगा और इससे बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान हो सकता है। साथ ही,यह कदम क्षेत्रीय शक्तियों को भी सीधे संघर्ष में खींच सकता है।

इस बीच द वॉल स्ट्रीट जर्नल की एक रिपोर्ट ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। रिपोर्ट के अनुसार,ट्रंप अपने सलाहकारों पर इस बात के लिए दबाव डाल रहे हैं कि ईरान को युद्ध समाप्त करने की शर्त के रूप में लगभग 1,000 पाउंड यूरेनियम सौंपने के लिए मजबूर किया जाए। यह माँग ईरान के परमाणु कार्यक्रम को सीधे निशाना बनाती है और इससे दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ सकता है।

अमेरिका की सैन्य गतिविधियों में भी तेजी देखी जा रही है। पेंटागन ने मध्य पूर्व में अपनी मौजूदगी बढ़ाने का फैसला किया है और रिपोर्ट्स के मुताबिक करीब 10,000 अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती की जा रही है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने हाल ही में घोषणा की कि 3,500 से अधिक सैनिक,जिनमें 2,500 मरीन शामिल हैं,पहले ही इस क्षेत्र में पहुँच चुके हैं। यह सैन्य जमावड़ा इस बात का संकेत है कि अमेरिका किसी भी संभावित कार्रवाई के लिए खुद को तैयार कर रहा है।

हालाँकि, इन सबके बीच ट्रंप ने एक सकारात्मक संकेत भी दिया है। उन्होंने कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच पाकिस्तान के जरिए चल रही अप्रत्यक्ष बातचीत में प्रगति हो रही है और “बहुत जल्द कोई समझौता हो सकता है।” यह बयान इस बात की ओर इशारा करता है कि दोनों पक्ष पूरी तरह से टकराव के रास्ते पर नहीं हैं और कूटनीतिक समाधान की संभावनाएँ अभी भी मौजूद हैं।

गौरतलब है कि यह संघर्ष 28 फरवरी को शुरू हुआ था और तब से लेकर अब तक स्थिति लगातार तनावपूर्ण बनी हुई है। इस जंग में इजरायल और अमेरिका की सक्रिय भूमिका रही है,जबकि ईरान भी लगातार जवाबी रणनीति अपनाता रहा है। इस पूरे घटनाक्रम ने मध्य पूर्व को एक बार फिर वैश्विक तनाव का केंद्र बना दिया है।

इस संघर्ष का सबसे बड़ा असर वैश्विक तेल बाजार पर पड़ा है। मार्च महीने में ब्रेंट क्रूड की कीमत बढ़कर 119.5 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच गई,जो जून 2022 के बाद का सबसे ऊँचा स्तर है। तेल की कीमतों में इस तेजी का असर दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ रहा है,खासकर उन देशों पर जो तेल आयात पर निर्भर हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि खार्ग द्वीप को लेकर कोई सैन्य कार्रवाई होती है,तो यह केवल एक क्षेत्रीय संघर्ष नहीं रहेगा,बल्कि यह वैश्विक संकट का रूप ले सकता है। इससे न केवल तेल की कीमतों में और उछाल आएगा,बल्कि वैश्विक व्यापार,आपूर्ति श्रृंखला और आर्थिक स्थिरता पर भी गहरा असर पड़ेगा।

ट्रंप के बयान ने यह साफ कर दिया है कि अमेरिका की रणनीति केवल सैन्य दबाव तक सीमित नहीं है,बल्कि वह आर्थिक और ऊर्जा संसाधनों के जरिए भी अपने हितों को साधने की कोशिश कर रहा है। हालाँकि,यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव किस दिशा में जाता है—क्या यह कूटनीतिक समाधान की ओर बढ़ेगा या फिर एक बड़े सैन्य टकराव में बदल जाएगा।

फिलहाल,दुनिया की नजरें इस पूरे घटनाक्रम पर टिकी हुई हैं,क्योंकि इसका असर केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं है,बल्कि यह वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था की दिशा तय कर सकता है।