अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप

ईरान में बढ़ती महँगाई और बेरोज़गारी पर फूटा गुस्सा,पाँचवें दिन भी उग्र विरोध—सरकार और अमेरिका आमने-सामने

नई दिल्ली,3 जनवरी (युआईटीवी)- ईरान इन दिनों गंभीर आंतरिक उथल-पुथल से गुजर रहा है। बढ़ती महँगाई,गिरती मुद्रा और रोजगार के संकट ने जनता के धैर्य को तोड़ दिया है। पिछले चार दिनों से चले आ रहे प्रदर्शनों ने शुक्रवार को लगातार पाँचवें दिन भी रफ्तार नहीं खोई। राजधानी तेहरान से लेकर प्रांतों के छोटे शहरों तक हजारों लोग सड़कों पर उतर आए। इन प्रदर्शनों में अब तक कम-से-कम छह लोगों की मौत हो चुकी है,जबकि कई प्रदर्शनकारी और सुरक्षाकर्मी घायल हुए हैं। स्थिति ने न केवल सरकार की आर्थिक नीतियों को कटघरे में खड़ा कर दिया है,बल्कि इसे लेकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी राजनीतिक बयानबाज़ी तेज हो गई है।

ईरान के कई शहरों में बुधवार को प्रदर्शन अचानक उग्र हो गए। स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार,पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच कई जगह झड़पें हुईं। फार्स जैसी सेमी-ऑफिशियल न्यूज एजेंसियों ने दावा किया कि कुछ समूहों ने पुलिस पर पत्थर फेंके,वाहनों में आग लगा दी और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाया। वहीं,सुरक्षा बलों ने कुछ ‘हथियारबंद’ लोगों को हिरासत में लेने का भी दावा किया है। सरकार का आरोप है कि “अराजक तत्व” शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के बहाने अस्थिरता फैलाने की कोशिश कर रहे हैं,जबकि प्रदर्शनकारियों का कहना है कि वे केवल रोटी-रोज़गार और बेहतर जीवन की माँग कर रहे हैं।

आर्थिक मोर्चे पर ईरान का संकट गहराता जा रहा है। देश में महँगाई की दर 42 प्रतिशत से ऊपर पहुँच चुकी है और खाद्य पदार्थों की कीमतों में लगभग 72 प्रतिशत तक उछाल दर्ज किया गया है। घरेलू करेंसी रियाल की कीमत लगातार गिर रही है,जिससे आम लोगों की क्रय-शक्ति बुरी तरह प्रभावित हुई है। छोटी-मोटी नौकरियों पर निर्भर मध्यम वर्ग और युवा सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। बड़ी संख्या में युवा बेरोजगार हैं और जिन्हें नौकरी मिली भी है,उनकी तनख्वाह रोज-मर्रा के खर्च पूरे करने के लिए नाकाफी साबित हो रही है। यही कारण है कि इन प्रदर्शनों को 2022 के बाद की सबसे बड़ी सामाजिक-आर्थिक चुनौती बताया जा रहा है।

पिछले वर्षों में ईरान में कई बार धार्मिक और सामाजिक मुद्दों को लेकर विरोध देखने को मिला,लेकिन इस बार की नाराज़गी का केंद्र अर्थव्यवस्था है। लोगों में यह धारणा गहरी हो गई है कि आर्थिक प्रबंधन में लगातार विफलताएँ सरकार के भीतर नीतिगत जड़ता और भ्रष्टाचार का परिणाम हैं। कई जगहों पर प्रदर्शनकारियों ने सुप्रीम लीडर के खिलाफ नारे भी लगाए। यह संकेत है कि जनता की शिकायतें अब केवल कीमतों तक सीमित नहीं रहीं,बल्कि शासन-प्रणाली के प्रति अविश्वास का रंग ले चुकी हैं।

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी इस संकट की प्रतिध्वनि सुनाई दी। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर टिप्पणी की कि यदि ईरानी सरकार “शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाती है और उन्हें मारती है,जैसा कि उसका स्वभाव बन गया है,तो अमेरिका उनकी मदद के लिए तैयार है।” ट्रंप के इस बयान ने राजनीतिक माहौल को और तीखा कर दिया। ईरान ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए इसे अपने आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करार दिया। राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े शीर्ष अधिकारी अली लारीजानी ने चेतावनी दी कि अमेरिकी दखल से क्षेत्र अस्थिर हो सकता है और इससे अंततः अमेरिकी हितों को भी नुकसान पहुँचेगा। वहीं,सुप्रीम लीडर के करीबी सलाहकार अली शमखानी ने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा ईरान की “रेड लाइन” है और इसके साथ किसी तरह का खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

सरकार की ओर से संकेत दिए गए हैं कि वह एक ओर व्यवस्था बनाए रखने के लिए सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ाएगी,तो दूसरी ओर जनता को शांत करने के लिए कुछ राहत उपायों पर विचार कर सकती है। हालाँकि,आलोचकों का मानना है कि केवल अल्पकालिक राहत से समस्या हल नहीं होगी। वे कहते हैं कि जब तक ईरान निवेश,उत्पादन और रोजगार सृजन के लिए ठोस और पारदर्शी आर्थिक सुधार नहीं करता,तब तक इस तरह के विस्फोट होते रहेंगे। अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों ने पहले ही देश की अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव डाला है,ऊपर से घरेलू राजनीतिक असुरक्षा ने निवेशकों का विश्वास कमजोर कर दिया है।

विरोध प्रदर्शनों का फैलाव चिंताजनक है। इस सप्ताह लगभग 21 राज्यों में लोग सड़कों पर उतर आए। कई जगहों पर महिलाओं और युवाओं की सक्रिय भागीदारी दिखाई दी। विश्वविद्यालय परिसरों से लेकर बाज़ारों तक,हर जगह आर्थिक असंतोष की चर्चा है। कुछ परिवारों ने बताया कि उन्हें रोजाना की जरूरत का सामान खरीदने के लिए कर्ज लेना पड़ रहा है। कई दुकानदारों ने बिक्री घटने की शिकायत की,क्योंकि महँगाई ने उपभोक्ताओं की जेबें पहले ही खाली कर दी हैं। इन परिस्थितियों में जनता के आक्रोश का उफान स्वाभाविक लगता है।

फिर भी,हिंसा का खतरा स्थिति को और जटिल बना रहा है। सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि अगर पुलिस का रवैया सख्त रहा और भीड़ नियंत्रण में बल का ज्यादा इस्तेमाल हुआ,तो मौतों और गिरफ्तारियों की संख्या बढ़ सकती है। इससे अंतर्राष्ट्रीय मंच पर ईरान की छवि पर और धब्बा लगेगा और पश्चिमी देशों को दबाव बढ़ाने का मौका मिलेगा। दूसरी ओर,सरकार के समर्थक तर्क देते हैं कि राज्य का पहला कर्तव्य कानून-व्यवस्था बनाए रखना है और किसी भी कीमत पर “अराजकता” को सिर नहीं उठाने देना चाहिए।

इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि यह संकट किस दिशा में जाएगा। क्या सरकार संवाद और सुधार के रास्ते पर चलेगी या फिर कठोर कदमों से प्रदर्शन को दबाने की कोशिश करेगी? इतिहास बताता है कि गहरी आर्थिक तकलीफों को केवल बल प्रयोग से लंबे समय तक नहीं रोका जा सकता। लोगों की उम्मीदें तभी बहाल होंगी,जब उन्हें रोज़गार,स्थिर कीमतें और भरोसेमंद शासन का अहसास होगा।

ईरान आज जिस चौराहे पर खड़ा है,वहाँ से लौटना आसान नहीं। एक ओर जनता का धैर्य टूट रहा है,दूसरी ओर सत्ता प्रतिष्ठान अपनी “रेड लाइन” खींच कर बैठा है। अगर दोनों के बीच संवाद का पुल नहीं बना,तो यह आग और भड़क सकती है। फिलहाल, पाँचवें दिन भी जारी विरोध यह संदेश दे रहा है कि आर्थिक संकट किसी सियासी नारे से शांत होने वाला नहीं—इसके लिए ठोस,पारदर्शी और मानवीय समाधान की जरूरत है।