पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ (तस्वीर क्रेडिट@ajaychauhan41)

इस्लामाबाद वार्ता से पहले बढ़ा तनाव: पाकिस्तान के बयान पर इजरायल की कड़ी चेतावनी,सीजफायर पर मंडराया संकट

नई दिल्ली,10 अप्रैल (युआईटीवी)- मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के बीच लागू दो सप्ताह के युद्धविराम के दौरान एक अहम कूटनीतिक पहल सामने आई है,जिसके तहत दोनों देशों के प्रतिनिधि पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में बातचीत के लिए जुटने वाले हैं,लेकिन इस महत्वपूर्ण वार्ता से ठीक पहले हालात अचानक तनावपूर्ण हो गए हैं। इजरायल ने पाकिस्तान के रक्षा मंत्री के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए न केवल कड़ी चेतावनी दी है,बल्कि इस पूरे वार्ता प्रक्रिया में पाकिस्तान की तटस्थता पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

दरअसल,पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ द्वारा सोशल मीडिया पर दिया गया बयान इस पूरे विवाद की जड़ बन गया है। अपने पोस्ट में उन्होंने इजरायल को “बुराई का प्रतीक” और “मानवता के लिए अभिशाप” बताया, साथ ही लेबनान में कथित नरसंहार के आरोप भी लगाए। उन्होंने यह भी कहा कि इजरायल निर्दोष नागरिकों को निशाना बना रहा है और गाजा से लेकर ईरान और अब लेबनान तक हिंसा फैला रहा है। उनके बयान में इस्तेमाल की गई तीखी भाषा और ऐतिहासिक संदर्भों ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विवाद को और भड़का दिया है।

इजरायल ने इस बयान पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए इसे “निंदनीय” और “अस्वीकार्य” करार दिया। इजरायली प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से जारी बयान में कहा गया कि किसी भी सरकार के प्रतिनिधि द्वारा इस तरह का बयान न केवल गैर-जिम्मेदाराना है,बल्कि यह उस देश की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाता है,जो खुद को शांति वार्ता का मध्यस्थ बता रहा हो। इजरायल ने साफ शब्दों में कहा कि पाकिस्तान की सरकार को अपने मंत्री के बयान पर स्पष्टीकरण देना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि भविष्य में इस तरह की भाषा का इस्तेमाल न हो।

इस पूरे घटनाक्रम ने इस्लामाबाद में होने वाली अमेरिका-ईरान वार्ता की संवेदनशीलता को और बढ़ा दिया है। अमेरिका और ईरान के बीच हाल ही में घोषित दो सप्ताह के युद्धविराम को एक सकारात्मक कदम माना जा रहा था,जिससे क्षेत्र में तनाव कम होने की उम्मीद जगी थी,लेकिन अब पाकिस्तान के इस विवादित बयान ने इस प्रक्रिया को प्रभावित करने का खतरा पैदा कर दिया है।

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ पहले ही यह दावा कर चुके थे कि इस युद्धविराम में लेबनान को भी शामिल किया गया है। हालाँकि,इस दावे को डोनाल्ड ट्रंप और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू दोनों ने सिरे से खारिज कर दिया था। उन्होंने स्पष्ट किया कि लेबनान इस समझौते का हिस्सा नहीं है और वहाँ इजरायल की सैन्य कार्रवाई जारी रहेगी।

इसी बीच,बेंजामिन नेतन्याहू ने एक बार फिर यह दोहराया है कि लेबनान में किसी भी तरह का युद्धविराम लागू नहीं है। उन्होंने कहा कि इजरायल हिज्बुल्लाह के खिलाफ अपनी सैन्य कार्रवाई पूरी ताकत के साथ जारी रखेगा और तब तक नहीं रुकेगा,जब तक अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर लेता। उनके इस बयान से यह स्पष्ट हो गया है कि क्षेत्र में तनाव फिलहाल कम होने के आसार नजर नहीं आ रहे हैं।

मध्य पूर्व में मौजूदा हालात की पृष्ठभूमि भी इस विवाद को और गंभीर बना रही है। 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के बाद क्षेत्र में हिंसा का एक नया दौर शुरू हो गया था। इसके जवाब में ईरान ने भी इजरायल पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए,जिससे हालात और बिगड़ गए। इसके अलावा,खाड़ी देशों में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों को भी निशाना बनाया गया,जिससे संघर्ष का दायरा और बढ़ गया।

लगातार 39 दिनों तक चले इस संघर्ष के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दो सप्ताह के लिए हमले रोकने की घोषणा की,जिसे एक अस्थायी युद्धविराम के रूप में देखा गया। इस घोषणा के बाद उम्मीद जताई जा रही थी कि बातचीत के जरिए हालात को सामान्य करने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएँगे। इसी कड़ी में इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता का आयोजन किया गया है।

हालाँकि,इस वार्ता से पहले पाकिस्तान के रक्षा मंत्री के बयान ने पूरे माहौल को तनावपूर्ण बना दिया है। कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी शांति वार्ता के लिए मध्यस्थ की भूमिका बेहद संवेदनशील होती है और उससे निष्पक्षता की उम्मीद की जाती है। ऐसे में पाकिस्तान के शीर्ष मंत्री द्वारा इस तरह का बयान देना उसकी तटस्थता पर सवाल खड़े करता है और वार्ता की सफलता को प्रभावित कर सकता है।

इजरायल की ओर से दी गई चेतावनी को भी इसी संदर्भ में देखा जा रहा है। इजरायल स्पष्ट कर चुका है कि वह अपने खिलाफ किसी भी तरह के उकसावे या बयानबाजी को बर्दाश्त नहीं करेगा। साथ ही,उसने यह संकेत भी दिया है कि अगर हालात बिगड़ते हैं,तो वह अपने सैन्य अभियान को और तेज कर सकता है।

दूसरी ओर,पाकिस्तान के लिए भी यह स्थिति काफी चुनौतीपूर्ण बन गई है। एक तरफ वह खुद को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर एक जिम्मेदार मध्यस्थ के रूप में पेश करना चाहता है,वहीं दूसरी तरफ उसके ही मंत्री के बयान ने उसकी कूटनीतिक स्थिति को कमजोर कर दिया है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पाकिस्तान इस विवाद को कैसे सँभालता है और क्या वह अपनी भूमिका को लेकर स्पष्टता प्रदान करता है।

इस्लामाबाद में होने वाली अमेरिका-ईरान वार्ता से पहले पैदा हुआ यह विवाद न केवल क्षेत्रीय बल्कि वैश्विक राजनीति के लिए भी अहम संकेत दे रहा है। जहाँ एक ओर युद्धविराम के जरिए शांति की उम्मीदें जगी थीं,वहीं दूसरी ओर बयानबाजी और आरोप-प्रत्यारोप ने इन उम्मीदों पर सवालिया निशान लगा दिया है। अब नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या कूटनीति इस तनाव को कम करने में सफल होगी या फिर यह विवाद एक बड़े टकराव का रूप ले लेगा।