जम्मू-कश्मीर विधानसभा में हंगामा (तस्वीर क्रेडिट@RiCkY_847)

जम्मू-कश्मीर विधानसभा में हंगामा,ईरान-इजरायल मुद्दे पर नारेबाजी के बीच बजट सत्र स्थगित

जम्मू, 27 मार्च (युआईटीवी)- जम्मू-कश्मीर विधानसभा का बजट सत्र शुक्रवार को भारी हंगामे के कारण अचानक स्थगित कर दिया गया। पाँच सप्ताह के अवकाश के बाद जैसे ही सदन की कार्यवाही दोबारा शुरू हुई,सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के विधायकों ने अंतर्राष्ट्रीय मुद्दे को लेकर जोरदार विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया। इस दौरान सदन में ऐसी स्थिति बन गई कि स्पीकर अब्दुल रहीम राथर को कार्यवाही आधे घंटे के लिए स्थगित करनी पड़ी।

दरअसल,यह पूरा हंगामा ईरान पर इजरायल के हमले और उससे जुड़े घटनाक्रम को लेकर हुआ। सत्ता पक्ष और विपक्ष के कई विधायक एकजुट होकर ईरान के समर्थन में और इजरायल के खिलाफ नारे लगाने लगे। इस दौरान प्रश्नकाल पूरी तरह बाधित हो गया और स्पीकर की बार-बार अपील के बावजूद स्थिति नियंत्रित नहीं हो सकी।

सदन में सत्ताधारी जम्मू और कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस,भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) और निर्दलीय विधायकों ने विपक्ष की पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के साथ मिलकर इजरायल की कार्रवाई की निंदा की। कई विधायकों ने ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या की खबरों पर भी चिंता जताते हुए विरोध दर्ज कराया और इसे अंतर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया।

हालाँकि,सदन में मौजूद भारतीय जनता पार्टी के विधायकों ने इस मुद्दे से अलग अपना विरोध दर्ज कराया। भाजपा सदस्य जम्मू में एक राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय की स्थापना की माँग को लेकर तख्तियाँ लेकर खड़े रहे और अपनी माँगों को लेकर नारेबाजी करते रहे। इस कारण सदन में दो अलग-अलग मुद्दों पर एक साथ विरोध प्रदर्शन होता रहा,जिससे स्थिति और अधिक जटिल हो गई।

सदन की कार्यवाही शुरू होते ही दोनों पक्षों के विधायक अपनी-अपनी सीटों से खड़े हो गए और नारे लगाने लगे। इससे प्रश्नकाल,जो आमतौर पर सबसे महत्वपूर्ण सत्र माना जाता है, पूरी तरह प्रभावित हुआ। स्पीकर ने बार-बार सदस्यों से शांत रहने और कार्यवाही चलने देने की अपील की,लेकिन किसी ने उनकी बात नहीं मानी। अंततः स्थिति को देखते हुए उन्हें कार्यवाही स्थगित करने का निर्णय लेना पड़ा।

गौरतलब है कि यह बजट सत्र पाँच सप्ताह के अवकाश के बाद फिर से शुरू हुआ था। इसका पहला चरण 2 फरवरी से 20 फरवरी तक चला था,जिसमें मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने 6 फरवरी को बजट पेश किया था। उस दौरान सदन में विभिन्न विभागों के लिए अनुदान पर विस्तृत चर्चा हुई थी और उन्हें पारित भी किया गया था।

वर्तमान सत्र 4 अप्रैल तक चलने वाला है,जिसमें कई महत्वपूर्ण विधायी कार्य निर्धारित किए गए हैं। अधिसूचित कार्य-सूची के अनुसार, 30 मार्च और 1 अप्रैल को निजी सदस्यों के विधेयकों पर चर्चा होनी है,जबकि 31 मार्च और 2 अप्रैल को निजी सदस्यों के प्रस्तावों पर विचार किया जाएगा। ऐसे में सत्र की शुरुआत में ही हुए इस हंगामे ने आगे की कार्यवाही को लेकर अनिश्चितता पैदा कर दी है।

जम्मू-कश्मीर विधानसभा की संरचना पर नजर डालें तो इसमें कुल 90 सदस्य हैं,जिनमें 47 सदस्य कश्मीर घाटी से और 43 सदस्य जम्मू क्षेत्र से आते हैं। इसके अलावा,उपराज्यपाल को पाँच सदस्यों को मनोनीत करने का अधिकार है। वहीं 24 सीटें पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के लिए आरक्षित रखी गई हैं,जो फिलहाल खाली हैं।

राजनीतिक स्थिति की बात करें तो सत्ताधारी नेशनल कॉन्फ्रेंस के पास 46 सीटें हैं,जो उसे स्पष्ट बहुमत देती हैं। भाजपा 29 सीटों के साथ मुख्य विपक्षी दल है,जबकि कांग्रेस के पास 6 सीटें हैं। पीडीपी के 4 विधायक हैं और अन्य छोटे दलों तथा निर्दलीय सदस्यों की संख्या सीमित है।

इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या राज्य की विधानसभा में अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर इस तरह का विरोध उचित है,खासकर तब जब राज्य के अपने कई अहम मुद्दे लंबित हों। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के हंगामे से न केवल सदन का समय बर्बाद होता है,बल्कि जनता के मुद्दों पर चर्चा भी प्रभावित होती है।

जम्मू-कश्मीर विधानसभा का यह घटनाक्रम दर्शाता है कि वैश्विक मुद्दों का प्रभाव अब स्थानीय राजनीति पर भी पड़ रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या सदन में सामान्य कामकाज बहाल हो पाता है या फिर इस तरह के विरोध प्रदर्शन आगे भी जारी रहते हैं।