Azadpur Mandi

मंडी की बोली से किसानों को मिलता है संतोष : कारोबारी

नई दिल्ली, 13 दिसंबर (युआईटीवी/आईएएनएस)- नये कृषि कानूनों को रद्द करने की मांग को लेकर सड़कों पर उतरे किसानों के विभिन्न मसलों में एपीएमसी मंडियों पर खतरा एक अहम मुद्दा है। आंदोलनरत किसानों का मानना है कि नये कानून के आने से राज्यों में कृषि उपज विपणन समितियों (एपीएमसी) द्वारा संचालित मंडियां टूट जाएंगी। कारोबारियों की मानें तो मंडी में लगने वाली बोली से किसानों को संतोष मिलता है इसलिए वे मंडियों पर भरोसा करते हैं। हालांकि मंडी के कारोबारियों का यह भी कहना है कि सरकार द्वारा नये कानून में प्रस्तावित संशोधनों से एपीएमसी की मंडियां प्रभावित नहीं होंगी और एक लेवल प्लेइंग फील्ड बन जाएगा। कारोबारियों का कहना है कि एपीएमसी मंडियों के भीतर और बाहर होने वाले कारोबार पर अगर मंडी शुल्क या उपकर एक समान होगा तो फिर उन्हें कोई परेशानी नहीं होगी और एपीएमसी मंडियों के टूटने का कोई खतरा नहीं रहेगा। प्राइवेट मंडियां खुलने और बहुराष्ट्रीय कंपनियों से एपीएमसी मंडियों के कारोबारियों और आढ़तियों की सीधी प्रतिस्पर्धा होने को लेकर पूछे गए एक सवाल पर उज्जैन के कारोबारी संदीप सारडा कहते हैं कि देश में जिस फसल का उत्पादन ज्यादा है, उसमें बहुराष्ट्रीय कंपनियों से कोई प्रतिस्पर्धा नहीं होगी और मंडी के कारोबार पर कोई असर नहीं होगा, लेकिन जिन फसलों का उत्पादन कम है उनमें वे कुछ भाव को उपर-नीचे कर सकती हैं। हालांकि वह कहते हैं कि किसानों और मंडी के कारोबारियों के बीच आपस में विश्वास का गहरा रिश्ता होता है, इसलिए मंडी पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। उन्होंने कहा कि मंडी में किसानों के सामने बोलियां लगती हैं और सबसे उंची बोली पर उनका उत्पाद बिकता है जिससे उनको संतोष मिलता है, इस तरह का संतोष उनको बहुराष्ट्रीय कंपनियां नहीं दिला पाएंगी।

किसान आंदोलन को उत्तर प्रदेश की मंडियों के कारोबारियों और आढ़तियों ने अब तक कोई समर्थन नहीं दिया है, लेकिन उनका भी मानना है कि सरकार अगर नये कानून मे संशोधन करती है तो यह उनके लिए काफी अच्छा रहेगा।

शाहजहांपुर मंडी के आढ़ती अशोक अग्रवाल ने कहा कि सराकर ने मंडी के बाहर के खरीदारों के लिए पंजीकरण और मंडी के बाहर होने वाले कारोबार पर भी मंडी में लगने वाले शुल्क के समान ही शुल्क लगाने का संशोधन करने का प्रस्ताव दिया है जिससे एक लेवल प्लेइंग फील्ड बन जाएगा।

देश की राजधानी दिल्ली की सीमाओं पर 26 नवंबर से किसान डेरा डाले हुए हैं और वे तीनों कानूनों को वापस लेने की मांग पर अड़े हुए हैं जबकि सरकार ने उन्हें संशोधन के प्रस्ताव दिए हैं। किसानों के इस आंदोलन के दौरान आठ दिसंबर को जब भारत बंद का आह्वान किया गया तो राजस्थान और मध्यप्रदेश समेत देश के कुछ अन्य प्रांतों की मंडियों के कारोबारियों और आढ़तियों ने बंद का समर्थन किया था।

हालांकि राजस्थान की 247 मंडियों के संगठन राजस्थान खाद्य पदार्थ व्यापार संघ के अध्यक्ष बाबुलाल गुप्ता भी मानते हैं कि मंडी-शुल्क को लेकर प्रस्तावित संशोधन से मंडी के बाहर और भीतर के कारोबार में समानता बनी रहेगी और लेवल प्लेइंग फील्ड बनेगा।

केंद्र सरकार द्वारा लागू तीन नये कृषि कानूनों में कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) कानून 2020 एक अहम कानून है। इस कानून के तहत किए गए प्रावधानों से किसानों को उनके उत्पाद बेचने के लिए एपीएमसी मंडियों के अतिरिक्त विकल्प दिए गए हैं। मसलन, किसान अपने उत्पाद राज्यों की एपीएमसी मंडी के बाहर ट्रेड एरिया में अपने उत्पाद बेच सकते हैं, जिसमें निजी मंडियां, गोदाम, फार्मगेट आदि शामिल हैं।

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