टोक्यो,23 जनवरी (युआईटीवी)- जापान में राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं। 8 फरवरी को होने वाले मध्यावधि चुनाव से पहले प्रधानमंत्री साने ताकाइची ने शुक्रवार को हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स यानी निचले सदन को भंग कर दिया। इस फैसले के साथ ही देश औपचारिक रूप से चुनावी मोड में प्रवेश कर गया है। जापान की प्रमुख समाचार एजेंसी क्योडो न्यूज के अनुसार,आम संसदीय सत्र की शुरुआत में संसद भंग किए जाने के बाद अब सभी राजनीतिक दलों के पास अपने चुनावी अभियान को तेज करने का समय है। यह फैसला न केवल समय के लिहाज से अहम है,बल्कि राजनीतिक दृष्टि से भी ऐतिहासिक माना जा रहा है।
जापान की राजनीति में यह एक असाधारण कदम माना जा रहा है क्योंकि बीते छह दशकों में ऐसा पहली बार हुआ है जब किसी नियमित संसदीय सत्र की शुरुआत में ही निचले सदन को भंग किया गया है। आम तौर पर प्रधानमंत्री के पास लोअर हाउस भंग करने का संवैधानिक अधिकार होता है,लेकिन इसका इस्तेमाल अधिकतर सत्र के बीच या किसी बड़े राजनीतिक संकट के दौरान किया जाता रहा है। इस बार साने ताकाइची ने इस अधिकार का प्रयोग एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश के साथ किया है।
प्रधानमंत्री ताकाइची ने संसद भंग करने के फैसले को जनता से सीधे समर्थन लेने की जरूरत से जोड़ा है। उन्होंने कहा कि अक्टूबर 2025 में प्रधानमंत्री बनने के बाद से उन्हें अब तक अपने प्रीमियरशिप के लिए स्पष्ट जनादेश नहीं मिला है। ऐसे में वह चाहती हैं कि जनता सीधे तौर पर उनकी सरकार और नीतियों पर अपनी राय दे। ताकाइची के अनुसार,मौजूदा हालात में चुनाव कराना लोकतांत्रिक रूप से जरूरी है ताकि सरकार को जनता का स्पष्ट समर्थन मिल सके।
इस चुनाव में महँगाई सबसे बड़ा और केंद्रीय मुद्दा बनकर उभरी है। जापान में बढ़ती कीमतों से आम परिवारों पर दबाव बढ़ा है,खासकर खाने-पीने की जरूरी वस्तुओं के दामों को लेकर। सत्ता पक्ष और विपक्ष,दोनों ने ही महँगाई को चुनावी एजेंडे के केंद्र में रखा है। प्रधानमंत्री ताकाइची के नेतृत्व वाले सत्तारूढ़ गठबंधन ने खाने की चीजों पर लगाए जाने वाले कंजम्प्शन टैक्स को अस्थायी रूप से निलंबित करने का प्रस्ताव रखा है। सरकार का तर्क है कि इससे आम परिवारों को तत्काल राहत मिलेगी और उपभोक्ता खर्च को बढ़ावा मिलेगा।
वहीं विपक्षी दलों के गठबंधन ने इससे एक कदम आगे बढ़ते हुए प्रस्ताव दिया है कि खाने-पीने से जुड़े सभी उत्पादों पर कंजम्प्शन टैक्स को पूरी तरह खत्म कर दिया जाए। विपक्ष का कहना है कि आधे-अधूरे कदम उठाने से जनता को सीमित राहत मिलेगी,जबकि टैक्स को पूरी तरह हटाने से महँगाई के असर को प्रभावी ढंग से कम किया जा सकेगा। इस मुद्दे पर दोनों पक्षों के बीच तीखी राजनीतिक बहस होने की संभावना है।
शुक्रवार को प्रधानमंत्री ताकाइची की कैबिनेट ने 465 सदस्यीय संसद को भंग करने के प्रस्ताव को औपचारिक रूप से मंजूरी दे दी। इसके बाद चुनाव आयोग और प्रशासनिक मशीनरी ने चुनाव की तैयारियाँ तेज कर दी हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह चुनाव ताकाइची के नेतृत्व के लिए एक तरह का जनमत संग्रह साबित हो सकता है,जिसमें जनता यह तय करेगी कि वह उनके नेतृत्व को आगे बढ़ते देखना चाहती है या नहीं।
महँगाई के अलावा,इस चुनाव में राजनीति और पैसों का मुद्दा भी प्रमुख रहने वाला है। हाल के वर्षों में सत्तारूढ़ लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी (एलडीपी) पर लगे स्लश फंड स्कैंडल ने जापान की राजनीति में पारदर्शिता और राजनीतिक वित्तपोषण को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। विपक्ष इन मामलों को चुनाव में जोर-शोर से उठाने की तैयारी में है और एलडीपी को जवाबदेही के कटघरे में खड़ा करना चाहता है। ऐसे में चुनावी बहस सिर्फ आर्थिक मुद्दों तक सीमित नहीं रहेगी,बल्कि नैतिकता और सुशासन जैसे सवाल भी सामने आएंगे।
इसके अलावा,विदेशी निवासियों और पर्यटकों से जुड़े मुद्दे भी इस बार के चुनाव में चर्चा का विषय बन सकते हैं। जापान में विदेशी श्रमिकों की संख्या बढ़ रही है और पर्यटन उद्योग भी महामारी के बाद तेजी से उभर रहा है। ऐसे में आव्रजन नीति,सामाजिक समावेशन और पर्यटकों से जुड़े नियमों को लेकर राजनीतिक दलों के रुख पर मतदाताओं की नजर रहेगी।
दिलचस्प बात यह है कि प्रधानमंत्री ताकाइची की कैबिनेट की सपोर्ट रेटिंग काफी मजबूत बताई जा रही है। जनमत सर्वेक्षणों में उनकी लोकप्रियता अच्छी बनी हुई है,लेकिन इसके बावजूद संसद में सत्तारूढ़ गठबंधन की स्थिति पूरी तरह सहज नहीं है। निचले सदन में सत्तापक्ष के पास बहुमत बहुत पतला है,जबकि हाउस ऑफ काउंसिलर्स यानी ऊपरी सदन में वह अल्पमत में है। इसका सीधा मतलब यह है कि किसी भी महत्वपूर्ण विधेयक को पारित कराने के लिए सरकार को विपक्षी दलों के समर्थन की जरूरत पड़ती है।
यही वजह है कि विपक्ष प्रधानमंत्री ताकाइची के इस फैसले पर सवाल उठा रहा है। विपक्षी दलों ने आरोप लगाया है कि सरकार अप्रैल से शुरू होने वाले वित्तीय वर्ष 2026 के लिए शुरुआती बजट को पारित कराने से पहले ही चुनाव करवा रही है। उनका कहना है कि यह कदम प्रशासनिक स्थिरता के बजाय राजनीतिक लाभ को प्राथमिकता देने का संकेत देता है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार कठिन फैसलों से बचने और राजनीतिक बढ़त हासिल करने के लिए समय से पहले चुनाव का सहारा ले रही है।
प्रधानमंत्री साने ताकाइची का राजनीतिक सफर भी इस चुनावी माहौल में चर्चा में है। उन्होंने 1993 में एक निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर निचले सदन में सीट जीतकर जापान की राजनीति में कदम रखा था। इसके बाद 1996 में वह लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी में शामिल हुईं। पूर्व प्रधानमंत्री शिंजो आबे के नेतृत्व में उन्हें पहली बार कैबिनेट में जगह मिली,जहाँ उन्होंने ओकिनावा और उत्तरी क्षेत्र के मामलों के लिए मिनिस्टर ऑफ स्टेट की जिम्मेदारी सँभाली।
ताकाइची ने पार्टी संगठन और सरकार दोनों स्तरों पर कई अहम भूमिकाएँ निभाई हैं। वह एलडीपी की पॉलिसी रिसर्च काउंसिल की चेयरपर्सन बनने वाली पहली महिला रहीं,जो अपने आप में एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। 2022 से 2024 तक उन्होंने जापान की आर्थिक सुरक्षा मंत्री के रूप में कार्य किया और देश की रणनीतिक आर्थिक नीतियों को आकार देने में अहम भूमिका निभाई। इसके अलावा,वह जापान की सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाली इंटरनल अफेयर्स मिनिस्टर भी रही हैं,जिसने उनके प्रशासनिक अनुभव को और मजबूत किया है।
एलडीपी के भीतर नेतृत्व की दौड़ में भी ताकाइची ने अपनी मजबूत पकड़ दिखाई। 185 वोट हासिल कर उन्होंने पार्टी अध्यक्ष का चुनाव जीता और शिंजिरो कोइज़ुमी जैसे चर्चित नेता को हराया। 2024 में हुए एलडीपी नेतृत्व चुनाव में कोइज़ुमी को एक प्रमुख दावेदार माना जा रहा था,लेकिन ताकाइची ने पार्टी के भीतर अपने समर्थन का दायरा साबित किया।
अब 8 फरवरी को होने वाला मध्यावधि चुनाव यह तय करेगा कि प्रधानमंत्री साने ताकाइची को जनता से वह स्पष्ट समर्थन मिलता है या नहीं,जिसकी उन्हें तलाश है। यह चुनाव न केवल उनकी राजनीतिक भविष्य की दिशा तय करेगा,बल्कि जापान की आर्थिक नीतियों,महँगाई से निपटने की रणनीति और राजनीतिक स्थिरता पर भी गहरा असर डालेगा। पूरे देश की निगाहें अब इस चुनाव पर टिकी हैं,जो जापान की राजनीति में एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है।
