ढाका,31 दिसंबर (युआईटीवी)- बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। एक बार फिर ऐसी घटना सामने आई है,जिसने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि वहाँ रहने वाले हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों की सुरक्षा आखिर किस हद तक सुनिश्चित है। ताजा मामला मैमनसिंह जिले के भालुका उपजिला का है,जहाँ 40 वर्षीय बजेंद्र बिस्वास को उनके ही साथी ने गोली मार दी। बजेंद्र बांग्लादेश अंसार और विलेज डिफेंस फोर्स के सदस्य थे और ड्यूटी पर तैनात थे। गोली लगने के बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया,लेकिन डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। यह घटना ऐसे समय हुई है,जब देश में अल्पसंख्यकों के खिलाफ हमलों को लेकर पहले ही माहौल तनावपूर्ण है और लगातार उठ रहे सवालों ने सरकार के दावों की भी परीक्षा ले ली है।
स्थानीय मीडिया के अनुसार,वारदात सोमवार शाम को मेहरबाड़ी इलाके में स्थित सुल्ताना स्वेटर्स लिमिटेड फैक्ट्री परिसर में हुई। फैक्ट्री में कुल 20 अंसार सदस्य सुरक्षा व्यवस्था सँभाल रहे थे। इन्हीं में से एक थे बजेंद्र बिस्वास,जिनकी जान कथित तौर पर एक लापरवाह और घातक हरकत के कारण चली गई। आरोपी की पहचान नोमान मिया के रूप में हुई है,जो उसी बल में तैनात था और घटना के समय बजेंद्र के साथ कमरे में बैठा हुआ था। रिपोर्ट्स के मुताबिक,अचानक नोमान ने अपनी शॉटगन उठाई,उसे बजेंद्र की जांघ पर तान दिया और कथित तौर पर मजाकिया लहजे में पूछा कि क्या वह गोली चला दे। इससे पहले कि कोई प्रतिक्रिया देता,उसने ट्रिगर दबा दिया और गोली सीधे बजेंद्र की जांघ में जा लगी,जिससे अत्यधिक रक्तस्राव हुआ और उनकी मौत हो गई। गोली चलाने के बाद नोमान मौके से फरार हो गया।
विश्लेषकों का मानना है कि हाल की घटनाएँ केवल धार्मिक पहचान तक सीमित नहीं हैं,बल्कि कानून और संस्थागत तंत्र की कमजोरी को भी उजागर करती हैं। कई विशेषज्ञ इस बात पर जोर देते हैं कि जब भीड़ न्याय अपने हाथ में लेती है या सुरक्षा बलों के भीतर ही हथियारों का दुरुपयोग होता है,तो यह लोकतांत्रिक ढाँचे के लिए बेहद खतरनाक संकेत होते हैं। इससे न केवल अल्पसंख्यकों में भय बढ़ता है,बल्कि समाज में अविश्वास और अस्थिरता भी गहराती है।
बजेंद्र बिस्वास की मौत ने उनके परिवार और समुदाय को गहरे शोक में डुबो दिया है। स्थानीय लोग बताते हैं कि वह शांत स्वभाव के,अपने काम के प्रति समर्पित व्यक्ति थे और अक्सर फैक्ट्री परिसर में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सतर्क रहते थे। उनकी अचानक और संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत ने इस सवाल को और तीखा कर दिया है कि क्या अंसार बल के सदस्यों के लिए पर्याप्त प्रशिक्षण और मनोवैज्ञानिक परामर्श जैसे उपाय मौजूद हैं या नहीं।
फिलहाल पुलिस जाँच जारी है और अधिकारी यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि गोली चलने के पीछे क्या परिस्थितियाँ थीं। यदि यह लापरवाही का मामला साबित होता है,तो उससे जुड़े जिम्मेदार तंत्र पर कठोर कार्रवाई की माँग उठना तय है। वहीं यदि किसी अन्य साजिश या जानबूझकर हत्या के संकेत मिलते हैं,तो यह मामला और अधिक संवेदनशील हो जाएगा।
इन तमाम घटनाओं के बीच एक बड़ी चिंता यह है कि क्या बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर ठोस और दीर्घकालिक नीति बनाई जा सकेगी। हर कुछ दिनों में सामने आने वाली ऐसी खबरें न केवल मानवाधिकार की दृष्टि से पीड़ादायक हैं,बल्कि देश की अंतर्राष्ट्रीय छवि पर भी नकारात्मक असर डालती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि केवल बयान देने या औपचारिक जाँच शुरू करने से स्थितियाँ नहीं बदलेंगी। इसके लिए पुलिस सुधार,न्यायिक प्रक्रियाओं में तेजी,सामुदायिक संवाद और शिक्षा के स्तर पर बदलाव जैसे समग्र उपाय आवश्यक होंगे।
बांग्लादेश के लिए यह समय आत्ममंथन का है। बजेंद्र बिस्वास,अमृत मंडल और दीपू चंद्र दास जैसे मामलों ने यह संकेत दे दिया है कि हिंसा की जड़ें कितनी गहरी हैं। अगर इन घटनाओं से सबक लेकर ठोस कदम नहीं उठाए गए,तो भय और अविश्वास का यह सिलसिला आगे भी जारी रह सकता है। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि सरकार इन वारदातों पर कैसी कार्रवाई करती है और क्या वास्तव में अल्पसंख्यकों को न्याय और सुरक्षा दिलाने की दिशा में ठोस परिणाम सामने आ पाते हैं या नहीं।
लैबिब ग्रुप के इंचार्ज और अंसार सदस्य एपीसी अजहर अली,जो घटना के समय पास ही मौजूद थे,उन्होंने स्पष्ट किया कि दोनों के बीच किसी प्रकार का झगड़ा या बहस नहीं हुई थी। उनका कहना है कि सब कुछ कुछ ही पलों में हुआ और किसी को अंदाजा ही नहीं था कि बात इतनी गंभीर हो जाएगी। इस बयान ने मामले को और ज्यादा गंभीर बना दिया है क्योंकि यदि यह घटना बिना किसी रंजिश या बहस के हुई,तो हथियारों के साथ लापरवाही और नियमों की अनदेखी के सवाल स्वाभाविक रूप से उठ खड़े होते हैं।
मामले की सूचना मिलते ही पुलिस ने जाँच शुरू की और मंगलवार सुबह एक ऑपरेशन के दौरान आरोपी नोमान मिया को गिरफ्तार कर लिया। मैमनसिंह के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (वित्त एवं प्रशासन) अब्दुल्ला अल मामून ने बताया कि हमले के पीछे की वजह जानने के लिए व्यापक जाँच की जा रही है। मृतक के शव को पोस्टमार्टम के लिए मैमनसिंह मेडिकल कॉलेज अस्पताल भेज दिया गया है और कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है। फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि गोली चलाना वास्तव में महज लापरवाही थी या इसके पीछे कोई गहरी वजह छिपी है। परंतु घटना ने अंसार जैसे सुरक्षा बलों के भीतर अनुशासन,प्रशिक्षण और हथियारों की निगरानी पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं।
यह हत्या केवल एक अलग-थलग घटना नहीं है। एक सप्ताह से भी कम समय में यह तीसरी ऐसी वारदात है,जिसमें हिंदू समुदाय से जुड़े लोगों को निशाना बनाया गया। 24 दिसंबर को अमृत मंडल नाम के 29 वर्षीय युवक की भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्या कर दी गई थी। बताया जाता है कि कालीमोहर यूनियन के हुसैन डांगा इलाके में किसी विवाद के बाद भीड़ ने उन्हें घेर लिया और बेरहमी से मार डाला। इससे पहले 18 दिसंबर को दीपू चंद्र दास नाम के 25 वर्षीय युवक की भालुका उपजिला की ही एक फैक्ट्री में साथी कर्मियों द्वारा भीड़ के हवाले कर दिया गया था। उन पर झूठे ईशनिंदा के आरोप लगाए गए और बाद में भीड़ ने उनकी जान ले ली। इन घटनाओं ने समाज में धार्मिक कट्टरता,अफवाहों की भूमिका और कानून-व्यवस्था की विफलता को उजागर कर दिया है।
बांग्लादेश अंसार और विलेज डिफेंस फोर्स,जिसे आम तौर पर अंसार बाहिनी कहा जाता है,गृह मंत्रालय के अधीन एक अर्धसैनिक बल है। इसका काम कानून-व्यवस्था बनाए रखना और सरकारी प्रतिष्ठानों की सुरक्षा करना है। जब इसी बल का एक सदस्य हथियार का गलत इस्तेमाल कर अपने साथी की जान ले ले,तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आम नागरिकों की सुरक्षा कितनी सुरक्षित है। स्थानीय लोगों में भय का माहौल है और कई परिवार,विशेषकर अल्पसंख्यक समुदाय के,खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।
यूनुस की अंतरिम सरकार के कार्यकाल में अल्पसंख्यकों के खिलाफ बढ़ती घटनाएँ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चिंता का विषय बन चुकी हैं। विभिन्न मानवाधिकार संगठनों ने हाल के मामलों पर गंभीर प्रतिक्रिया दी है। उनका कहना है कि प्रशासनिक ढिलाई और दोषियों पर त्वरित व कठोर कार्रवाई न होने से अपराधियों का मनोबल बढ़ता है और घटनाएँ बार-बार दोहराई जाती हैं। इनमें से कई संगठनों ने सरकार से अपील की है कि वह ऐसे मामलों में पारदर्शी जाँच सुनिश्चित करे और कानून-व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए ठोस कदम उठाए।
भारत ने भी इन घटनाओं पर अपनी चिंता व्यक्त की है। पिछले सप्ताह भारतीय विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा कि बांग्लादेश में हिंदुओं,ईसाइयों और बौद्धों के खिलाफ लगातार होने वाले अत्याचारों से भारत निराश है। भारत ने यह भी संकेत दिया कि पड़ोसी देश में हो रही ऐसी घटनाओं का प्रभाव व्यापक संबंधों और क्षेत्रीय स्थिरता पर पड़ सकता है। हालाँकि,बांग्लादेश सरकार का दावा है कि वह सभी नागरिकों की बराबरी से सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है,मगर जमीन पर बदलते हालात इस दावे की परीक्षा बार-बार लेते दिखाई दे रहे हैं।
