फिल्म ‘इक्कीस’(तस्वीर क्रेडिट@mayamatchstick)

फिल्म ‘इक्कीस’—युद्ध के शोर से परे इंसानियत और यादों की गूँज सुनाती संवेदनशील फिल्म

नई दिल्ली,1 जनवरी (युआईटीवी)- भारतीय सिनेमा में युद्ध पर आधारित फिल्मों की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। अक्सर इन फिल्मों में देशभक्ति को उभारने के लिए तेज नारे,बड़ी-बड़ी भाषणबाज़ी और भावनाओं को उकसाने वाले दृश्यों का सहारा लिया जाता है,लेकिन निर्देशक श्रीराम राघवन की नई फिल्म ‘इक्कीस’ इस पूरी धारा से अलग खड़ी दिखाई देती है। यह फिल्म युद्ध की कहानी को न तो सिर्फ जीत-हार के चश्मे से देखती है और न ही दुश्मन-मित्र की सीमित परिभाषाओं में बाँधती है। इसके बजाय यह युद्ध के पीछे छूट जाने वाले रिश्तों,स्मृतियों और मानवीय भावनाओं के संसार में उतरती है। सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल के जीवन पर आधारित यह फिल्म दर्शकों को एक ऐसे अनुभव से जोड़ती है,जो पर्दे पर शोर नहीं मचाता,बल्कि भीतर लंबे समय तक ठहर जाता है।

फिल्म की कहानी दो अलग-अलग समयरेखाओं में आगे बढ़ती है और यही इसकी सबसे बड़ी खूबी बनकर उभरती है। पहली समयरेखा हमें दिसंबर 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान बसंतर की लड़ाई तक ले जाती है। यह वह समय है,जब 21 वर्ष के युवा अधिकारी अरुण खेत्रपाल अपने टैंक रेजिमेंट के साथ मोर्चे पर तैनात होते हैं। फिल्म इस युद्ध को किसी बड़े तमाशे के रूप में प्रस्तुत नहीं करती। इसके बजाय यह दिखाती है कि एक युवा अफसर किस तरह डर और दबाव के बीच फैसले लेता है,कैसे हर पल खतरे के साये में भी उसका संकल्प टूटता नहीं और कैसे कर्तव्य उसके लिए सबसे बड़ा धर्म बन जाता है। बारूदी सुरंगों से भरे मैदान,अचानक होने वाले हमले और चौकन्नी निगाहों के बीच बीतते पल युद्ध को बेहद वास्तविक बनाते हैं।

अरुण खेत्रपाल के किरदार में अगस्त्य नंदा का चयन फिल्म के लिए अत्यंत उपयुक्त साबित होता है। वह अरुण को किसी दैवी-शक्ति वाले नायक की तरह नहीं दिखाते,बल्कि एक सामान्य युवा के रूप में पेश करते हैं,जो अपनी उम्र से कहीं अधिक जिम्मेदारी निभा रहा है। उनके अभिनय में मासूमियत और दृढ़ता साथ-साथ दिखाई देती है। जब वह जलते हुए टैंक से पीछे हटने से इनकार करते हैं,तो वह दृश्य किसी अतिनाटकीय चमत्कार की तरह नहीं,बल्कि उस सैनिक की सच्ची सोच के रूप में सामने आता है,जिसने राष्ट्र-कर्तव्य को अपने जीवन से ऊपर रख दिया है।

दूसरी समयरेखा वर्ष 2001 में सेट है और यही हिस्सा फिल्म को भावनात्मक रूप से और भी गहरा बना देता है। यहाँ दर्शक अरुण खेत्रपाल के पिता,ब्रिगेडियर एम. एल. खेत्रपाल से रूबरू होते हैं। इस भूमिका में दिवंगत अभिनेता धर्मेंद्र एक ऐसे पिता का रूप लेते हैं,जिसके भीतर वर्षों बाद भी बेटे की शहादत और उससे जुड़ी यादों का दर्द धड़कता रहता है। इसी दौरान उनकी मुलाकात पाकिस्तान के ब्रिगेडियर ख्वाजा मोहम्मद नसीर से होती है,जिसका किरदार जयदीप अहलावत निभाते हैं। इस मुलाकात में न तो तीखी बहस है और न ही किसी तरह की राजनीतिक बयानबाज़ी। यहाँ दो सैनिक—दो इंसान—एक-दूसरे के सामने बैठकर युद्ध की कीमत पर बात करते हैं।

जयदीप अहलावत का अभिनय इस फिल्म का सबसे मजबूत स्तंभ कहा जा सकता है। उनका किरदार शांत,संतुलित और गहरे संवेदनशील व्यक्तित्व का प्रतीक है। जब वह धर्मेंद्र के साथ उन पुरानी जगहों पर लौटते हैं,जहाँ कभी युद्ध हुआ था,तो हर दृश्य एक अनकही पीड़ा को दर्शाता है। बसंतर के युद्ध-स्थल पर दोनों का साथ खड़ा होना दर्शकों को यह एहसास कराता है कि किसी भी युद्ध के अंत में न तो विजय के गीत रह जाते हैं और न पराजय के आँसू—बल्कि बचती हैं,केवल यादें,खालीपन और अनगिनत सवाल। धर्मेंद्र अपने चेहरे की खामोशी,हल्के काँपते भाव और नम आँखों से पूरे दर्द और गर्व को बखूबी व्यक्त करते हैं। चूँकि,यह उनकी आखिरी फिल्म साबित हुई,इसलिए उनके दृश्य और भी ज्यादा भावुक हो उठते हैं।

तकनीकी दृष्टि से ‘इक्कीस’ अत्यंत परिपक्व फिल्म है। वीएफएक्स का प्रयोग सीमित लेकिन सटीक रखा गया है। टैंकों के बीच होने वाली लड़ाइयाँ वास्तविक लगती हैं, जहाँ धमाकों के बीच कोई अनावश्यक चमक-दमक नहीं दिखाई देती। कैमरा बार-बार टैंक के भीतर जाता है,जिससे दर्शक सैनिकों की घुटन,बंद गर्मी और निरंतर तनाव को महसूस कर पाता है। हर विस्फोट दर्शकों को चौकाने के बजाय कथा की प्रगति का हिस्सा बन जाता है।

फिल्म का संगीत और बैकग्राउंड स्कोर भी इसी संयम को आगे बढ़ाते हैं। युद्ध के दृश्यों में गोलियों और टैंकों की आवाजें ही माहौल रचती हैं,जबकि 2001 की कहानी में संगीत धीमा,सादा और भावुक रखा गया है। संवाद कम हैं,पर जो भी हैं,वे सीधे दिल तक पहुँचते हैं। निर्देशक श्रीराम राघवन ने चुप्पी,ठहराव और खाली फ्रेमों को कहानी का अनिवार्य हिस्सा बनाया है। यह शैली दर्शक को सोचने और महसूस करने के लिए स्थान देती है।

लेखन की बात करें तो राघवन के साथ अरिजीत बिस्वास और पूजा लाधा सुरती की टीम ने दोनों समयरेखाओं को बहुत सहजता से जोड़ते हुए कहानी तैयार किया है। कहीं भी ऐसा नहीं लगता कि कहानी बिखर रही है। हर दृश्य अगले दृश्य से अर्थपूर्ण तरीके से जुड़ा है। सिमर भाटिया फिल्म में अरुण की प्रेमिका किरण के किरदार में दिखाई देती हैं। उनका रोल छोटा है,लेकिन बेहद अहम,क्योंकि उनके माध्यम से दर्शक अरुण की निजी दुनिया और उसके सपनों को समझ पाता है। उनकी सादगी भरी मौजूदगी कहानी के भावनात्मक प्रभाव को और गहरा कर देती है।
फिल्म का निर्माण मैडॉक फिल्म्स ने किया है और प्रोडक्शन डिजाइन युद्धकालीन माहौल को सजीव करने में अहम भूमिका निभाता है। टैंकों,वर्दियों,लोकेशनों और प्रॉप्स का चयन इस तरह किया गया है कि दर्शक खुद को उसी समय में महसूस करता है। सिनेमैटोग्राफी युद्ध के दृश्यों में धूल-धुआँ और भ्रम की स्थिति दिखाती है,जबकि 2001 के हिस्सों में सादगी,स्मृति और पश्चाताप का भाव उभरता है।

‘इक्कीस’ को देखने के बाद यह साफ समझ आता है कि यह केवल एक युद्ध फिल्म नहीं,बल्कि सैनिकों के जीवन,उनके परिवारों के दर्द और दुश्मन समझे जाने वाले लोगों के भीतर भी मौजूद इंसानियत की कहानी है। फिल्म यह नहीं कहती कि युद्ध गलत है या सही,बल्कि वह यह दिखाती है कि युद्ध चाहे किसी भी कारण से लड़ा जाए,उसकी सबसे बड़ी कीमत इंसान ही चुकाता है।

यही कारण है कि फिल्म के अंत तक आते-आते दर्शक किसी नारे या ऊँचे स्वर की तलाश नहीं करता। इसके बजाय वह उन चेहरों को याद करता है,जिन्होंने अपने साहस और कर्तव्य से इतिहास लिख दिया और उन परिवारों को,जिन्होंने अपनी निजी दुनिया खोकर राष्ट्र को मजबूत बनाया।

श्रीराम राघवन ने इस फिल्म के जरिए युद्ध के प्रति एक परिपक्व और मानवीय दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। उन्होंने दिखाया कि बहादुरी हमेशा ऊँची आवाज में नहीं बोलती,बल्कि कभी-कभी चुपचाप अपने कर्तव्य को निभाती है। ‘इक्कीस’ न तो केवल भावुक करने के लिए बनाई गई है और न ही मनोरंजन के लिए,यह एक ऐसी कथा है,जो दर्शक के भीतर प्रश्न,संवेदना और सम्मान का भाव छोड़ जाती है।

अगस्त्य नंदा के सधे अभिनय,धर्मेंद्र की भावपूर्ण उपस्थिति,जयदीप अहलावत की गहरी संवेदनशीलता और सिमर भाटिया की सरल सच्चाई—इन सभी ने मिलकर फिल्म को मजबूत बनाया है। तकनीकी परतों में सादगी,संगीत का संयम और लेखन की बुनावट इस फिल्म को खास बनाती है।

कुल मिलाकर ‘इक्कीस’ एक ऐसी फिल्म है,जो युद्ध के शोर से अलग खड़े होकर इंसानियत की धीमी,लेकिन सशक्त आवाज सुनाती है। यह सैनिकों की शहादत को सम्मान देती है,साथ ही दर्शकों को यह सोचने पर मजबूर करती है कि किसी भी जीत के पीछे कितनी अनकही कीमतें छिपी होती हैं। युद्ध को केवल वीरता की कहानी मान लेने के बजाय,अगर उसे इंसानी अनुभव के रूप में देखा जाए,तो शायद हम शांति के मूल्य को और गहराई से समझ पायेंगे।

‘इक्कीस’ इसी समझ का सिनेमाई दस्तावेज़ है—संवेदनशील,सधा हुआ और लंबे समय तक याद रहने वाला।