वाशिंगटन,2 अप्रैल (युआईटीवी)- अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है,जहाँ डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका को नाटो से बाहर निकालने पर गंभीरता से विचार करने के संकेत दिए हैं। यह बयान ऐसे समय में आया है,जब अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगियों के बीच ईरान को लेकर चल रहे सैन्य और रणनीतिक मतभेद खुलकर सामने आ रहे हैं। ट्रंप के इस रुख ने ट्रांस-अटलांटिक रिश्तों में बढ़ती दरार को और गहरा कर दिया है।
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भी इस दिशा में संकेत देते हुए कहा है कि ईरान के साथ चल रहे संघर्ष के बाद अमेरिका नाटो की उपयोगिता पर पुनर्विचार कर सकता है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि यदि सहयोगी देश अमेरिकी सैन्य अभियानों में सहयोग नहीं करते या बाधा उत्पन्न करते हैं,तो इस गठबंधन का महत्व कम हो जाता है। फॉक्स न्यूज को दिए एक साक्षात्कार में रुबियो ने कहा, “अगर नाटो सिर्फ यूरोप की रक्षा के लिए है, लेकिन जब हमें जरूरत हो तब हमें सैन्य अड्डों का उपयोग नहीं करने देता,तो यह एकतरफा व्यवस्था बन जाती है।”
ट्रंप ने इस मुद्दे पर और अधिक सख्त रुख अपनाते हुए ब्रिटिश अखबार द टेलिग्राफ को दिए इंटरव्यू में नाटो को “पेपर टाइगर” करार दिया। उन्होंने कहा कि अमेरिका के लिए इस गठबंधन से बाहर निकलना अब केवल एक विकल्प नहीं,बल्कि गंभीर विचार का विषय बन चुका है। ट्रंप ने यूरोपीय देशों पर आरोप लगाया कि उन्होंने ईरान के खिलाफ अमेरिका के सैन्य अभियान में अपेक्षित सहयोग नहीं दिया,जिससे वॉशिंगटन में असंतोष बढ़ा है।
इस पूरे विवाद का एक बड़ा कारण होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा को लेकर अमेरिका की नाराजगी भी है। यह जलमार्ग वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है,जहाँ से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल दुनिया के विभिन्न हिस्सों में पहुँचता है। अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि इस क्षेत्र की सुरक्षा में सहयोगी देशों को सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए थी,लेकिन उन्होंने नौसैनिक बल तैनात करने में हिचक दिखाई।
रूबियो ने ईरान के खिलाफ चल रहे अमेरिकी अभियान का जिक्र करते हुए कहा कि अमेरिकी सेना अपने उद्देश्यों को हासिल करने के बेहद करीब है। उनके अनुसार,ईरान की वायुसेना,नौसेना,मिसाइल प्रणाली और रक्षा ढांचे को काफी हद तक कमजोर कर दिया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि यह अभियान ईरान को निकट भविष्य में परमाणु हथियार विकसित करने से लगभग रोक देगा। रुबियो ने कहा कि, “हम अपने उद्देश्यों को हासिल करने के बहुत करीब हैं।”
हालाँकि,अमेरिका के इस रुख का यूरोपीय देशों ने विरोध किया है। कीर स्टार्मर ने नाटो का समर्थन करते हुए इसे “दुनिया का सबसे प्रभावी सैन्य गठबंधन” बताया। उन्होंने स्पष्ट किया कि ब्रिटेन इस गठबंधन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता बनाए रखेगा और ईरान के साथ चल रहे सैन्य संघर्ष में शामिल नहीं होगा। यह बयान अमेरिका और यूरोप के बीच रणनीतिक मतभेद को और उजागर करता है।
1949 में स्थापित नाटो लंबे समय से अमेरिका और यूरोप के बीच सुरक्षा सहयोग का मुख्य आधार रहा है। यह संगठन सामूहिक रक्षा के सिद्धांत पर काम करता है,जिसके तहत किसी एक सदस्य देश पर हमला होने की स्थिति में सभी सदस्य देश उसकी रक्षा के लिए आगे आते हैं,लेकिन वर्तमान स्थिति में यह सिद्धांत केवल सदस्य देशों तक सीमित है और ईरान जैसे बाहरी संघर्षों पर लागू नहीं होता।
विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप के बयान केवल तत्कालीन राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं हैं,बल्कि यह अमेरिका की बदलती वैश्विक रणनीति का संकेत भी हो सकते हैं। अमेरिका अब अपने सहयोगियों से अधिक जिम्मेदारी और सक्रिय भागीदारी की उम्मीद कर रहा है, खासकर उन क्षेत्रों में जहाँ उसके रणनीतिक हित जुड़े हुए हैं।
इस घटनाक्रम का वैश्विक प्रभाव भी पड़ सकता है। यदि अमेरिका वास्तव में नाटो से अलग होने का फैसला करता है,तो इससे न केवल यूरोप की सुरक्षा व्यवस्था प्रभावित होगी, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन में भी बड़ा बदलाव आ सकता है। रूस और चीन जैसे देश इस स्थिति का लाभ उठा सकते हैं,जिससे अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में नए समीकरण बन सकते हैं।
ट्रंप और रुबियो के बयानों ने नाटो के भविष्य को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जहाँ एक ओर अमेरिका अपने हितों को प्राथमिकता दे रहा है,वहीं यूरोपीय देश पारंपरिक गठबंधन को बनाए रखने पर जोर दे रहे हैं। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या यह मतभेद केवल बयानबाजी तक सीमित रहते हैं या वास्तव में वैश्विक सुरक्षा ढाँचे में कोई बड़ा बदलाव देखने को मिलता है।
