मॉस्को/वॉशिंगटन,7 फरवरी (युआईटीवी)- दुनिया की दो सबसे बड़ी परमाणु शक्तियों रूस और अमेरिका ने नई सामरिक हथियार कटौती संधि यानी न्यू स्टार्ट, पर जल्द-से-जल्द बातचीत शुरू करने की जरूरत को स्वीकार कर लिया है। यह संकेत ऐसे समय में सामने आया है,जब वैश्विक परमाणु हथियार नियंत्रण व्यवस्था गंभीर अनिश्चितता के दौर से गुजर रही है। क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने शुक्रवार को बताया कि इस विषय पर हाल ही में संयुक्त अरब अमीरात की राजधानी अबू धाबी में हुई बातचीत के दौरान चर्चा की गई थी, जहाँ दोनों पक्षों ने जिम्मेदार और व्यावहारिक रुख अपनाने की आवश्यकता पर सहमति जताई।
पेस्कोव के मुताबिक,अबू धाबी में हुई वार्ता का माहौल रचनात्मक जरूर था,लेकिन यह प्रक्रिया आसान नहीं रही। उन्होंने स्पष्ट किया कि हथियार नियंत्रण जैसे संवेदनशील और जटिल मुद्दों पर बातचीत हमेशा कठिन होती है,फिर भी दोनों देशों ने संवाद का रास्ता खुला रखने पर सहमति जताई है। पेस्कोव ने यह भी संकेत दिया कि आने वाले समय में इस विषय पर और बैठकें हो सकती हैं,हालाँकि अभी किसी ठोस समय-सीमा या ढाँचे की घोषणा नहीं की गई है। समाचार एजेंसी शिन्हुआ ने इस पूरे घटनाक्रम की जानकारी दी है।
दरअसल,बुधवार और गुरुवार को अबू धाबी में यूक्रेन संकट को लेकर त्रिपक्षीय वार्ता का दूसरा दौर आयोजित किया गया था,जिसमें रूस,अमेरिका और यूक्रेन के प्रतिनिधिमंडलों ने हिस्सा लिया। इस बातचीत में कुछ मानवीय मुद्दों पर प्रगति जरूर हुई। रूस और यूक्रेन बड़े पैमाने पर कैदियों की अदला-बदली पर सहमत हुए, जिसे एक सकारात्मक कदम माना जा रहा है। हालाँकि,युद्धविराम,क्षेत्रीय व्यवस्था और दीर्घकालिक राजनीतिक समाधान जैसे अहम मसलों पर कोई ठोस नतीजा नहीं निकल सका। इसी वार्ता के दौरान रूस और अमेरिका के बीच सामरिक हथियार नियंत्रण और न्यू स्टार्ट संधि के भविष्य पर भी विचार-विमर्श हुआ।
अमेरिका और रूस के पास मिलकर दुनिया के लगभग 87 प्रतिशत परमाणु हथियार मौजूद हैं। ऐसे में इन दोनों देशों के बीच किसी भी तरह की हथियार नियंत्रण व्यवस्था का वैश्विक सुरक्षा संतुलन पर सीधा असर पड़ता है। न्यू स्टार्ट संधि को लंबे समय से द्विपक्षीय सामरिक स्थिरता की आधारशिला माना जाता रहा है। यह संधि पहली बार 2011 में लागू हुई थी और इसके तहत दोनों देशों को अपने तैनात रणनीतिक परमाणु वारहेड्स की संख्या अधिकतम 1,550 तक सीमित रखने की बाध्यता थी। इसके अलावा,अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलों,पनडुब्बी से प्रक्षेपित बैलिस्टिक मिसाइलों और भारी बमवर्षकों जैसी प्रमुख हथियार प्रणालियों पर भी सख्त सीमाएँ तय की गई थीं।
2021 में,जब संधि की प्रारंभिक अवधि समाप्त होने वाली थी,तब दोनों देशों ने इसे पाँच वर्षों के लिए बढ़ाने पर सहमति जताई थी। उस समय इसे अमेरिका और रूस के बीच तनावपूर्ण रिश्तों के बावजूद एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक उपलब्धि माना गया था। हालाँकि,इसके बाद यूक्रेन युद्ध और पश्चिमी देशों के साथ रूस के संबंधों में आई भारी गिरावट ने इस संधि के भविष्य को भी अनिश्चित बना दिया। हाल के महीनों में दोनों पक्ष एक-दूसरे पर संधि के प्रावधानों के उल्लंघन के आरोप लगाते रहे हैं।
इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने न्यू स्टार्ट को लेकर बेहद सख्त और आलोचनात्मक रुख अपनाया है। गुरुवार को उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर एक पोस्ट में इस संधि को “खराब तरीके से तय किया गया समझौता” करार दिया। ट्रंप का दावा है कि न्यू स्टार्ट का “घोर उल्लंघन” हो रहा है और मौजूदा परिस्थितियों में इसे आगे बढ़ाना अमेरिका के हित में नहीं है। उनके इस बयान ने हथियार नियंत्रण के भविष्य को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
ट्रंप ने संकेत दिया कि अमेरिका मौजूदा संधि को बनाए रखने के बजाय एक “नई, बेहतर और आधुनिक संधि” चाहता है,जो बदलते वैश्विक हालात और उभरती तकनीकों को ध्यान में रखकर तैयार की जाए। उनके मुताबिक,ऐसी संधि न सिर्फ लंबे समय तक प्रभावी होनी चाहिए,बल्कि उसमें अमेरिका के रणनीतिक हितों की बेहतर सुरक्षा भी सुनिश्चित की जानी चाहिए। इस रुख से साफ है कि वाशिंगटन न्यू स्टार्ट के पारंपरिक ढाँचे से आगे बढ़ने की सोच रहा है।
रूस की ओर से भी स्थिति में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। रूस के विदेश मंत्रालय ने बुधवार को यह स्पष्ट किया कि न्यू स्टार्ट की अवधि समाप्त होने के बाद मॉस्को यह मानता है कि दोनों पक्ष अब इस संधि के तहत किसी भी कानूनी दायित्व से बंधे नहीं हैं। इस बयान को हथियार नियंत्रण व्यवस्था के लिए एक गंभीर चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर नई संधि या किसी वैकल्पिक व्यवस्था पर सहमति नहीं बनती,तो अमेरिका और रूस के बीच हथियार नियंत्रण से जुड़ा आखिरी औपचारिक सुरक्षा कवच भी खत्म हो जाएगा।
हथियार नियंत्रण समझौतों को लेकर ट्रंप का संदेह कोई नई बात नहीं है। अपने पहले कार्यकाल के दौरान भी उन्होंने कई पुराने समझौतों पर सवाल उठाए थे। 2019 में अमेरिका ने इंटरमीडिएट-रेंज न्यूक्लियर फोर्सेज यानी आईएनएफ संधि से बाहर निकलने का फैसला किया था। उस समय भी ट्रंप प्रशासन ने तर्क दिया था कि यह समझौता मौजूदा रणनीतिक वास्तविकताओं को नहीं दर्शाता और अमेरिका के प्रतिद्वंद्वियों पर प्रभावी रोक लगाने में विफल रहा है। आईएनएफ संधि से अमेरिका के हटने के बाद यूरोप और एशिया में मिसाइल तैनाती को लेकर नए सिरे से चिंताएं पैदा हो गई थीं।
अब न्यू स्टार्ट के खत्म होने के साथ ही स्थिति और भी गंभीर हो गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे न केवल अमेरिका और रूस के रिश्तों में तनाव बढ़ेगा,बल्कि वैश्विक स्तर पर भी एक रणनीतिक शून्य पैदा हो सकता है। बिना किसी औपचारिक सीमा या निगरानी तंत्र के,दोनों देश अपने परमाणु शस्त्रागार का विस्तार करने की होड़ में शामिल हो सकते हैं। इससे हथियारों की दौड़ तेज होने और परमाणु जोखिम बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा विश्लेषकों के अनुसार,मौजूदा भू-राजनीतिक माहौल पहले से कहीं अधिक नाजुक और अस्थिर है। यूक्रेन युद्ध,एशिया-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ता तनाव और मध्य पूर्व की अनिश्चित स्थिति ने वैश्विक सुरक्षा परिदृश्य को जटिल बना दिया है। ऐसे में अमेरिका और रूस के बीच किसी भी तरह की हथियार नियंत्रण व्यवस्था का अभाव दुनिया को एक खतरनाक दिशा में ले जा सकता है।
हालाँकि,अबू धाबी में हुई बातचीत से यह संकेत जरूर मिलता है कि दोनों देश पूरी तरह से संवाद के दरवाजे बंद करने के पक्ष में नहीं हैं। न्यू स्टार्ट या किसी नई संधि पर संभावित बातचीत से उम्मीद जगी है कि अमेरिका और रूस कम से कम परमाणु हथियारों के मुद्दे पर जिम्मेदारी भरा रवैया अपनाने की कोशिश करेंगे। आने वाले हफ्तों और महीनों में यह साफ होगा कि यह पहल केवल कूटनीतिक बयानबाजी तक सीमित रहती है या वास्तव में एक नई और प्रभावी हथियार नियंत्रण व्यवस्था की ओर बढ़ती है। फिलहाल,पूरी दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि परमाणु हथियार नियंत्रण का भविष्य किस दिशा में जाता है।
