अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप

पाक-अफगान सीमा पर बढ़ते संघर्ष के बीच ट्रंप का दखल से इनकार,पाकिस्तान नेतृत्व की खुलकर सराहना

काबुल,28 फरवरी (युआईटीवी)- पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच सीमा पर जारी हिंसक तनाव ने क्षेत्रीय स्थिरता को लेकर गंभीर चिंताएँ पैदा कर दी हैं। हालिया झड़पों में कई लोगों की मौत की खबरें सामने आई हैं,जिससे दोनों देशों के बीच संबंध और अधिक तनावपूर्ण हो गए हैं। इस बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस मामले में हस्तक्षेप करने से साफ इनकार कर दिया है। उनका यह रुख ऐसे समय में सामने आया है,जब पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने अफगानिस्तान के खिलाफ खुले संघर्ष की घोषणा की है और क्षेत्र में सैन्य गतिविधियाँ तेज हो गई हैं।

मीडिया से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा कि वह इस विवाद में दखल दे सकते थे,लेकिन पाकिस्तान के पास सक्षम नेतृत्व है। उन्होंने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख असीम मुनीर की खुलकर तारीफ की। ट्रंप ने कहा कि पाकिस्तान के पास एक महान प्रधानमंत्री और एक महान जनरल हैं,जिनकी वह बहुत इज्जत करते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें लगता है कि पाकिस्तान इस समय बहुत अच्छा कर रहा है। ट्रंप के इस बयान को दक्षिण एशिया की बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों के संदर्भ में देखा जा रहा है।

यह बयान ऐसे समय आया है,जब पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने अफगानिस्तान के साथ बढ़ते तनाव के बाद खुली जंग की घोषणा की है। सीमा पार से हमलों और जवाबी कार्रवाई की खबरों ने दोनों देशों के बीच अविश्वास को और गहरा कर दिया है। पाकिस्तान का आरोप है कि अफगानिस्तान की धरती से सक्रिय आतंकवादी समूह उसके सीमावर्ती इलाकों में हमले कर रहे हैं,जबकि अफगानिस्तान इन आरोपों से इनकार करता रहा है।

अमेरिका की ओर से इस पूरे घटनाक्रम पर सीमित प्रतिक्रिया देखने को मिली है। अमेरिकी विदेश विभाग की प्रवक्ता एलिसन एम. हूकर ने कहा कि वॉशिंगटन तालिबान से जुड़े हमलों के खिलाफ पाकिस्तान के आत्मरक्षा के अधिकार का समर्थन करता है। उन्होंने कहा कि तालिबान अपने काउंटरटेररिज्म वादों को निभाने में विफल रहा है और इससे क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ रही है। हूकर ने यह भी कहा कि आतंकवादी समूह अफगानिस्तान की जमीन को अपने हमलों के लिए लॉन्चिंग पैड के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं,जो अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चिंता का विषय है।

अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी के बाद से ही क्षेत्र में सुरक्षा स्थिति नाजुक बनी हुई है। लगभग दो दशकों तक अमेरिकी सैनिकों की उपस्थिति के बाद 2021 में अमेरिका ने अपने सैनिक वापस बुला लिए थे। इसके बाद तालिबान ने तेजी से देश पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। अमेरिका की वापसी ने न केवल अफगानिस्तान की आंतरिक राजनीति को प्रभावित किया,बल्कि पड़ोसी देशों के साथ उसके संबंधों पर भी असर डाला।

इस पूरे परिदृश्य को समझने के लिए इतिहास पर नजर डालना जरूरी है। 11 सितंबर 2001 को हुए आतंकी हमलों ने विश्व राजनीति की दिशा बदल दी थी। उस दिन 19 आतंकवादियों ने चार यात्री विमानों का अपहरण कर अमेरिका में आत्मघाती हमले किए थे,जिनमें लगभग तीन हजार लोगों की जान गई थी। इन हमलों की जिम्मेदारी अल-कायदा ने ली थी और इसके सरगना ओसामा बिन लादेन को अफगानिस्तान में पनाह मिलने की बात सामने आई थी।

इन हमलों के कुछ ही सप्ताह बाद तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने अफगानिस्तान पर सैन्य कार्रवाई की घोषणा की। उस समय अफगानिस्तान में तालिबान का शासन था। बुश प्रशासन ने तालिबान से ओसामा बिन लादेन और अन्य अल-कायदा आतंकियों को सौंपने की माँग की थी,लेकिन तालिबान ने इसे ठुकरा दिया। इसके बाद अमेरिका ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर अफगानिस्तान में सैन्य अभियान शुरू किया और तालिबान शासन को हटा दिया। हालाँकि,दो दशक लंबे इस युद्ध के बावजूद स्थायी शांति स्थापित नहीं हो सकी।

2021 में अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद तालिबान ने दोबारा सत्ता सँभाल ली। इसके बाद से पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच संबंधों में उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। पाकिस्तान लंबे समय से यह आरोप लगाता रहा है कि अफगानिस्तान की जमीन से संचालित आतंकी संगठन उसके खिलाफ हमले कर रहे हैं। वहीं अफगान तालिबान का कहना है कि वह किसी भी देश के खिलाफ अपनी जमीन के इस्तेमाल की अनुमति नहीं देता।

ट्रंप द्वारा मौजूदा संकट में दखल से इनकार और पाकिस्तान नेतृत्व की प्रशंसा को कई विश्लेषक अमेरिका की रणनीतिक प्राथमिकताओं से जोड़कर देख रहे हैं। अफगानिस्तान से वापसी के बाद अमेरिका क्षेत्रीय मामलों में प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप से बचता दिखाई दे रहा है। इसके बजाय वह कूटनीतिक समर्थन और बयानबाजी के माध्यम से अपनी स्थिति स्पष्ट कर रहा है।

पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच जारी यह तनाव यदि लंबा खिंचता है,तो इसका असर पूरे दक्षिण एशिया की सुरक्षा और स्थिरता पर पड़ सकता है। सीमा पार हिंसा,आतंकी गतिविधियों और राजनीतिक बयानबाजी ने स्थिति को जटिल बना दिया है। ऐसे में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की भूमिका,विशेषकर अमेरिका की,महत्वपूर्ण मानी जा रही है। फिलहाल ट्रंप का रुख स्पष्ट है कि वह सीधे हस्तक्षेप के पक्ष में नहीं हैं और पाकिस्तान के नेतृत्व पर भरोसा जता रहे हैं। आने वाले दिनों में यह देखना होगा कि यह संकट किस दिशा में आगे बढ़ता है और क्या दोनों देश कूटनीतिक रास्ते से समाधान निकाल पाते हैं।