नई दिल्ली,18 अक्टूबर (युआईटीवी)- पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच तनाव एक बार फिर से चरम पर पहुँच गया है। दोनों देशों के बीच 48 घंटे के युद्धविराम समझौते के कुछ ही घंटों बाद पाकिस्तान ने अफगानिस्तान की धरती पर भीषण एयरस्ट्राइक कर दी। इस हमले में अफगानिस्तान क्रिकेट टीम के तीन खिलाड़ियों समेत आठ लोगों की मौत हो गई है। यह हमला शुक्रवार की देर रात किया गया,जिसने पूरे दक्षिण एशिया को झकझोर दिया है।
स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार,पाकिस्तान ने यह हमला अफगानिस्तान के खोस्त और कुनार प्रांतों में किया,जहाँ तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के आतंकियों के ठिकाने होने का दावा किया गया था। पाकिस्तान ने कहा है कि अफगानिस्तान की जमीन से टीटीपी के आतंकी पाकिस्तान में घुसपैठ कर रहे हैं और कई आतंकी हमलों की योजना बना रहे हैं। इस हमले को पाकिस्तान ने “आत्मरक्षा की कार्रवाई” बताया है।
पाकिस्तान के रक्षा मंत्रालय की ओर से जारी बयान में कहा गया कि अफगानिस्तान को बार-बार चेतावनी दी गई थी कि उसकी धरती का इस्तेमाल पाकिस्तान के खिलाफ नहीं होना चाहिए,लेकिन इसके बावजूद टीटीपी के आतंकियों को न सिर्फ शरण दी जा रही है,बल्कि उन्हें प्रशिक्षण और हथियार भी मुहैया कराए जा रहे हैं। बयान में यह भी कहा गया कि पाकिस्तान अपनी सीमाओं की सुरक्षा के लिए किसी भी हद तक जा सकता है।
हालाँकि,अफगानिस्तान की तरफ से इस हमले पर तीखी प्रतिक्रिया आई है। तालिबान सरकार ने पाकिस्तान की कार्रवाई को अपनी संप्रभुता का उल्लंघन बताया है और इसे “युद्ध की घोषणा” करार दिया है। अफगान विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी करते हुए कहा कि पाकिस्तान ने युद्धविराम समझौते की खुली अवहेलना की है। तालिबान ने यह भी आरोप लगाया कि पाकिस्तान अपनी विफल सुरक्षा नीतियों का दोष अफगानिस्तान पर मढ़ रहा है।
अफगानिस्तान के रक्षा प्रवक्ता ने कहा कि पाकिस्तान को अपने भीतर झांकना चाहिए,क्योंकि आतंकवाद की जड़ें उसी की भूमि पर हैं। उन्होंने पलटवार करते हुए कहा कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई खुद कई आतंकवादी संगठनों को शरण देती है। यह आरोप भी लगाया गया कि पाकिस्तान आईएसआई से जुड़े आतंकियों को सीमा पार भेजकर क्षेत्र में अस्थिरता फैलाने की कोशिश कर रहा है।
विश्लेषकों का कहना है कि यह घटना दोनों देशों के रिश्तों में अब तक की सबसे गंभीर दरार डाल सकती है। साल 2021 में जब तालिबान ने अफगानिस्तान की सत्ता पर कब्जा किया था,तब पाकिस्तान सबसे ज्यादा खुश था। इस्लामाबाद को उम्मीद थी कि तालिबान उसकी नीतियों के अनुरूप काम करेगा और भारत के प्रभाव को अफगानिस्तान से खत्म करेगा। पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने तालिबान को सत्ता में लाने में बड़ी भूमिका निभाई थी।
तालिबान के कब्जे के बाद पाकिस्तान ने 100 से अधिक तालिबानी कैदियों को रिहा कर दिया था। इस कदम को दोनों देशों के बीच बढ़ते “भाईचारे” का प्रतीक माना गया था। मगर समय के साथ तालिबान ने पाकिस्तान के इरादों को समझ लिया और साफ संदेश दे दिया कि वह किसी के इशारों पर नहीं चलेगा। अब तालिबान की प्राथमिकता अफगानिस्तान की स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता है,न कि किसी विदेशी एजेंडे को आगे बढ़ाना।
तालिबान के रुख ने पाकिस्तान के रणनीतिक सपनों को तोड़ दिया। अब तालिबान और पाकिस्तान के बीच वह भरोसा नहीं रहा जो कभी हुआ करता था। पाकिस्तान लगातार आरोप लगाता रहा है कि टीटीपी के आतंकियों को अफगानिस्तान में शरण दी जा रही है,जबकि अफगानिस्तान का कहना है कि टीटीपी के कई गुट पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी के नियंत्रण में हैं।
दरअसल,अफगानिस्तान और भारत के बीच हमेशा से अच्छे संबंध रहे हैं। भारत ने अफगानिस्तान के बुनियादी ढाँचे के विकास में बड़ा योगदान दिया है — चाहे वह सड़कों का निर्माण हो,संसद भवन का पुनर्निर्माण या मानवीय सहायता। यही कारण है कि तालिबान सरकार के सत्ता में आने के बाद भी भारत ने कूटनीतिक संवाद बनाए रखा। हाल ही में तालिबान के विदेश मंत्री ने भारत का दौरा किया था,जिसने पाकिस्तान की बेचैनी और बढ़ा दी है।
विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान की यह एयरस्ट्राइक सिर्फ आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई नहीं,बल्कि अफगानिस्तान और भारत के बीच बढ़ते रिश्तों से उपजे डर का नतीजा भी है। पाकिस्तान यह नहीं चाहता कि अफगानिस्तान फिर से भारत के करीब जाए।
वर्तमान हालात में यह हमला दक्षिण एशिया की स्थिरता के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकता है। अफगानिस्तान ने अपने जवाबी बयान में कहा है कि वह अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए हर जरूरी कदम उठाएगा। वहीं संयुक्त राष्ट्र और कई अंतर्राष्ट्रीय संगठन दोनों देशों से संयम बरतने की अपील कर रहे हैं।
फिलहाल, इस हवाई हमले ने पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच पहले से चल रहे तनाव को युद्ध के कगार पर ला खड़ा किया है। दोनों देशों के बीच संवाद की संभावनाएँ अब लगभग खत्म होती दिख रही हैं। क्षेत्र में शांति की उम्मीदें धुंधली पड़ गई हैं और आने वाले दिनों में यह संघर्ष पूरे दक्षिण एशियाई क्षेत्र को अस्थिर कर सकता है।
