पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ (तस्वीर क्रेडिट@Shashank_8880)

आर्थिक संकट के बीच पाकिस्तान को झटका: यूएई ने 3.5 अरब डॉलर कर्ज वापसी की तय की समयसीमा,बढ़ी चिंता

इस्लामाबाद,4 अप्रैल (युआईटीवी)- वैश्विक स्तर पर कूटनीतिक हल निकालने की कोशिशों के बीच पाकिस्तान को आर्थिक मोर्चे पर बड़ा झटका लगा है। जहाँ एक ओर पाकिस्तान ईरान और अमेरिका के बीच जारी संघर्ष में मध्यस्थता की कोशिश कर रहा है,वहीं दूसरी ओर उसकी अपनी आर्थिक स्थिति लगातार दबाव में आती जा रही है। इस बीच संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने पाकिस्तान से इस महीने के अंत तक 3.5 अरब डॉलर का कर्ज वापस करने के लिए कह दिया है,जिससे इस्लामाबाद की चिंताएँ और बढ़ गई हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार,यूएई द्वारा यह कर्ज 2019 में पाकिस्तान को उसके भुगतान संतुलन (बैलेंस ऑफ पेमेंट) को स्थिर करने के लिए दिया गया था। तब से लेकर अब तक इस कर्ज की अवधि कई बार बढ़ाई जाती रही,जिससे पाकिस्तान को राहत मिलती रही,लेकिन अब अबू धाबी ने साफ संकेत दे दिया है कि वह इस रकम को और अधिक समय तक लंबित नहीं रखना चाहता और जल्द से जल्द इसकी वापसी चाहता है।

पाकिस्तान के लिए यह फैसला ऐसे समय में आया है,जब उसकी अर्थव्यवस्था पहले से ही कई चुनौतियों से जूझ रही है। देश के पास फिलहाल विदेशी मुद्रा भंडार में लगभग 21 अरब डॉलर से अधिक की राशि मौजूद है। तकनीकी रूप से देखा जाए तो इस रकम से पाकिस्तान यूएई का कर्ज चुका सकता है,लेकिन ऐसा करने से उसके विदेशी मुद्रा भंडार पर भारी दबाव पड़ेगा और आने वाले महीनों में उसे फिर से बाहरी मदद की जरूरत पड़ सकती है।

पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति पहले ही कर्ज के बोझ तले दबी हुई है। 31 मार्च 2026 तक पाकिस्तान ने अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से करीब 7.29 अरब डॉलर का कर्ज ले रखा है। इसके अलावा,कुल विदेशी कर्ज दिसंबर 2025 तक लगभग 138 अरब डॉलर तक पहुँच चुका है। यह आँकड़ें यह दिखाने के लिए पर्याप्त हैं कि पाकिस्तान किस तरह लगातार बाहरी वित्तीय सहायता पर निर्भर होता जा रहा है।

आईएमएफ के साथ पाकिस्तान इस समय 7 अरब डॉलर के विस्तारित फंड सुविधा कार्यक्रम के तहत काम कर रहा है। मार्च 2026 के अंत में आईएमएफ ने पाकिस्तान के लिए करीब 1.2 अरब डॉलर की अगली किस्त जारी करने पर सहमति जताई थी,जो देश की अर्थव्यवस्था को कुछ समय के लिए राहत दे सकती है। हालाँकि,यह सहायता भी सीमित है और लंबे समय तक आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त नहीं मानी जा रही।

पाकिस्तान के सबसे बड़े कर्जदाताओं में चीन का नाम सबसे ऊपर आता है,जिसने उसे करीब 29 अरब डॉलर का कर्ज दिया है। इसके अलावा सऊदी अरब ने भी करीब 9.16 अरब डॉलर की वित्तीय सहायता और जमा राशि के रूप में मदद दी है। इन तीनों देशों—चीन, सऊदी अरब और यूएई से पाकिस्तान को कुल मिलाकर लगभग 12.5 अरब डॉलर के रोलओवर की जरूरत है,ताकि वह अपने विदेशी मुद्रा भंडार को स्थिर रख सके और बाहरी भुगतान की जरूरतों को पूरा कर सके।

यूएई का यह फैसला इसलिए भी अहम है क्योंकि यह उस व्यवस्था का हिस्सा था, जिसके तहत पाकिस्तान अपने विदेशी कर्ज को स्थिर बनाए रखने की कोशिश कर रहा था। डॉन की रिपोर्ट के अनुसार,यह फंड अबू धाबी फंड फॉर डेवलपमेंट के जरिए जमा किए गए थे और 2019 से इन्हें कई बार रोलओवर किया गया था। अब जब यूएई ने इस रकम को वापस माँग लिया है,तो इससे पाकिस्तान की आर्थिक रणनीति को झटका लग सकता है।

आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर पाकिस्तान को इस कर्ज की भरपाई के लिए नए विदेशी निवेश या सहायता नहीं मिलती,तो उसकी मुद्रा पर दबाव बढ़ सकता है। पाकिस्तानी रुपये की वैल्यू पहले ही कई बार गिर चुकी है और इस तरह के दबाव से इसमें और गिरावट आ सकती है। इसके अलावा,आईएमएफ के कार्यक्रम के तहत पाकिस्तान को अपने विदेशी मुद्रा भंडार के स्तर को बनाए रखना जरूरी है और इस कर्ज की वापसी से यह लक्ष्य हासिल करना मुश्किल हो सकता है।

एक और बड़ी चिंता यह है कि पाकिस्तान को अप्रैल 2026 में 1.3 अरब डॉलर के यूरोबॉन्ड का भुगतान भी करना है। ऐसे में यूएई को 3.5 अरब डॉलर लौटाने के साथ-साथ इस अतिरिक्त भुगतान का दबाव देश की वित्तीय स्थिति को और जटिल बना सकता है। यह स्थिति सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है।

पाकिस्तानी अधिकारियों ने हालाँकि,इस मुद्दे पर संयमित प्रतिक्रिया दी है। डॉन के अनुसार,एक अधिकारी ने कहा कि यह रकम जल्द से जल्द वापस कर दी जाएगी और वित्तीय कारणों से राष्ट्रीय गरिमा से समझौता नहीं किया जाएगा। यह बयान यह दर्शाता है कि सरकार इस मुद्दे को केवल आर्थिक नहीं,बल्कि प्रतिष्ठा के नजरिए से भी देख रही है।

वहीं,पाकिस्तान के वित्त मंत्रालय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट के जरिए कहा है कि वह देश के विदेशी मुद्रा भंडार और बाहरी फंड फ्लो पर लगातार नजर बनाए हुए है। मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार अपनी सभी बाहरी वित्तीय जिम्मेदारियों को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध है और स्थिति को नियंत्रित करने के लिए आवश्यक कदम उठा रही है।

हालाँकि,विशेषज्ञों का मानना है कि केवल बयानबाजी से समस्या का समाधान नहीं होगा। पाकिस्तान को अपनी अर्थव्यवस्था को स्थिर करने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे,जिसमें राजस्व बढ़ाना,खर्चों में कटौती करना और निवेश को आकर्षित करना शामिल है। साथ ही, उसे अपने कर्ज प्रबंधन को भी बेहतर बनाना होगा,ताकि भविष्य में इस तरह की स्थितियों से बचा जा सके।

इस पूरे घटनाक्रम का एक कूटनीतिक पहलू भी है। जिस समय पाकिस्तान क्षेत्रीय स्तर पर मध्यस्थता की भूमिका निभाने की कोशिश कर रहा है,उसी समय उसे आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा है। इससे उसकी अंतर्राष्ट्रीय छवि पर भी असर पड़ सकता है और उसकी कूटनीतिक क्षमता पर सवाल उठ सकते हैं।

यूएई द्वारा कर्ज की वापसी की समयसीमा तय करना पाकिस्तान के लिए एक बड़ा झटका साबित हो सकता है। आने वाले हफ्तों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पाकिस्तान इस चुनौती से कैसे निपटता है और क्या वह अपनी आर्थिक स्थिति को स्थिर बनाए रखने में सफल हो पाता है या नहीं। फिलहाल,यह स्पष्ट है कि देश को आर्थिक मोर्चे पर कड़े फैसले लेने होंगे,ताकि वह इस संकट से बाहर निकल सके और भविष्य के लिए एक मजबूत आधार तैयार कर सके।