पेरिस में जी7 बैठक में शामिल हुए एस. जयशंकर (तस्वीर क्रेडिट@AIRNewsHindi)

पेरिस में जी7 बैठक में शामिल हुए एस. जयशंकर,वैश्विक संकटों और द्विपक्षीय संबंधों पर हुई अहम चर्चा

पेरिस,27 मार्च (युआईटीवी)- भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर गुरुवार को फ्रांस की राजधानी पेरिस पहुँचे,जहाँ उन्होंने जी7 देशों के विदेश मंत्रियों की अहम बैठक में भाग लिया। यह दौरा कई मायनों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है,क्योंकि इस बैठक में यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में जारी तनाव और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की स्थिति जैसे वैश्विक मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की जानी है।

फ्रांस के विदेश मंत्री जीन-नोएल बैरोट के निमंत्रण पर जयशंकर दो दिवसीय दौरे पर पेरिस पहुँचे हैं। उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर जानकारी साझा करते हुए बताया कि वह जी7 विदेश मंत्रियों की बैठक में सहयोगी देशों के साथ महत्वपूर्ण मुद्दों पर विचार-विमर्श करेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि पेरिस पहुँचने पर उनका गर्मजोशी से स्वागत किया गया।

इस दौरान जयशंकर ने कई देशों के अपने समकक्षों के साथ द्विपक्षीय बैठकें भी कीं। सबसे पहले उन्होंने कनाडा की विदेश मंत्री अनीता आनंद से मुलाकात की। इस बैठक में दोनों नेताओं ने भारत-कनाडा संबंधों को आगे बढ़ाने के तरीकों पर चर्चा की। इसके साथ ही पश्चिम एशिया में बिगड़ते हालातों पर भी विचार-विमर्श किया गया। जयशंकर ने बैठक के बाद सोशल मीडिया पर लिखा कि उनकी बातचीत बेहद उपयोगी रही और दोनों देशों के बीच सहयोग को और मजबूत करने की दिशा में सकारात्मक पहल की जाएगी।

इसके अलावा,जयशंकर ने दक्षिण कोरिया के विदेश मंत्री चो ह्यून के साथ भी बैठक की। इस दौरान दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने पर जोर दिया गया। जयशंकर ने इस मुलाकात को सफल बताते हुए कहा कि भारत और दक्षिण कोरिया के संबंधों में और मजबूती आने की पूरी संभावना है।

जापान के विदेश मंत्री तोशिमित्सु मोटेगी के साथ भी उनकी मुलाकात हुई। जयशंकर ने इस बैठक को लेकर कहा कि मोटेगी से मिलना हमेशा सुखद होता है और इस बार जी7 बैठक के दौरान उनसे मुलाकात करके उन्हें बेहद खुशी हुई। भारत और जापान के बीच पहले से ही मजबूत रणनीतिक और आर्थिक संबंध हैं,जिन्हें आगे बढ़ाने पर भी चर्चा हुई।

जी7 विदेश मंत्रियों की इस बैठक में कई वैश्विक मुद्दे प्रमुख रूप से शामिल हैं। फ्रांस के यूरोप और विदेश मामलों के मंत्रालय ने अपने बयान में कहा है कि ईरान और मध्य पूर्व की स्थिति पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। सभी सहयोगी देश क्षेत्र में बढ़ते तनाव को कम करने के लिए कूटनीतिक समाधान तलाशने पर जोर देंगे। इसके अलावा,आम नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने,समुद्री और व्यापारिक मार्गों को फिर से खोलने और ईरान के परमाणु एवं बैलिस्टिक कार्यक्रमों पर नियंत्रण के उपायों पर भी चर्चा होगी।

यूक्रेन युद्ध भी इस बैठक का एक प्रमुख मुद्दा है। जी7 देश यूक्रेन को ऊर्जा और क्षमता क्षेत्र में समर्थन जारी रखने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराएँगे। साथ ही रूस पर दबाव बढ़ाने के उपायों पर भी विचार किया जाएगा,खासकर उसके “शैडो फ्लीट” के संदर्भ में,जिसका उपयोग प्रतिबंधों को दरकिनार करने के लिए किया जाता है।

इसके अलावा,इंडो-पैसिफिक क्षेत्र,सूडान,हैती,गाजा,वेनेजुएला और क्यूबा जैसे क्षेत्रों की स्थिति पर भी चर्चा हो रही है। ये सभी क्षेत्र वर्तमान समय में राजनीतिक और मानवीय संकटों का सामना कर रहे हैं,जिनके समाधान के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता है।

फ्रांस और उसके सहयोगी देशों ने चेर्नोबिल परमाणु संयंत्र के कंफाइनमेंट स्ट्रक्चर की मरम्मत के लिए अंतर्राष्ट्रीय फंड जुटाने का भी निर्णय लिया है। यह संरचना 2025 में हुए रूसी हमले में क्षतिग्रस्त हो गई थी,जिसके बाद इसकी मरम्मत और सुरक्षा सुनिश्चित करना बेहद जरूरी हो गया है।

इसके साथ ही,सीरिया में सिंथेटिक ड्रग ‘कैप्टागन’ की तस्करी को रोकने के लिए एक क्षेत्रीय सम्मेलन आयोजित करने का भी प्रस्ताव रखा गया है। यह ड्रग तस्करी न केवल क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है,बल्कि यह वैश्विक स्तर पर भी चिंता का विषय बन चुका है।

जयशंकर की इस यात्रा को भारत की सक्रिय कूटनीति का हिस्सा माना जा रहा है। भारत लगातार वैश्विक मंचों पर अपनी भूमिका को मजबूत कर रहा है और अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर संतुलित और प्रभावी रुख अपनाने की कोशिश कर रहा है। जी7 जैसे मंच पर भारत की भागीदारी यह दर्शाती है कि वैश्विक स्तर पर उसकी भूमिका और महत्व लगातार बढ़ रहा है।

इस बैठक में जयशंकर की मौजूदगी और विभिन्न देशों के साथ उनकी द्विपक्षीय बातचीत से यह स्पष्ट होता है कि भारत न केवल अपने हितों की रक्षा कर रहा है,बल्कि वैश्विक शांति और स्थिरता में भी सक्रिय योगदान देना चाहता है।

पेरिस में आयोजित जी7 विदेश मंत्रियों की यह बैठक कई अहम मुद्दों पर वैश्विक सहमति बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है। आने वाले दिनों में इस बैठक के नतीजों का असर अंतर्राष्ट्रीय राजनीति और कूटनीति पर स्पष्ट रूप से देखने को मिल सकता है।