ईरान में भड़का जनविरोध (तस्वीर क्रेडिट@AIRNewsHindi)

ईरान में भड़का जनविरोध: बिगड़ती अर्थव्यवस्था,कड़े प्रतिबंध और सख्त सरकारी रुख ने बढ़ाया असंतोष,सुरक्षा बलों की कार्रवाई में 27 की मौत

तेहरान,7 जनवरी (युआईटीवी)- ईरान इन दिनों गंभीर उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है। आर्थिक संकट,महँगाई और सरकारी नीतियों के खिलाफ बढ़ते गुस्से ने देश के कई हिस्सों में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों को जन्म दिया है। अलग-अलग शहरों में लगातार हो रहे प्रदर्शनों ने न सिर्फ प्रशासन की चुनौती बढ़ा दी है,बल्कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का ध्यान भी ईरान के भीतर पनप रहे असंतोष की ओर खींच लिया है। हालात इतने तनावपूर्ण हो चुके हैं कि सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पों में अब तक कम-से-कम 27 लोगों के मारे जाने की खबर है,जिनमें पाँच नाबालिग भी शामिल बताए गए हैं।

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में देखा जा सकता है कि इलम प्रांत के अबदानान शहर में मंगलवार की रात बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतर आए। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक,पूरा का पूरा परिवार मार्च करता दिखा। कई लोग सरकार विरोधी नारे लगा रहे थे,जबकि शहर के ऊपर हेलीकॉप्टर चक्कर लगाते दिखाई दिए। सुरक्षा बलों की मौजूदगी के बावजूद भीड़ का उत्साह कम नहीं हुआ और प्रदर्शन का दायरा शहर के कई इलाकों में फैल गया। बीते एक सप्ताह के अंदर अबदानान में कई बड़े प्रदर्शन हो चुके हैं,जो यह संकेत देते हैं कि गुस्सा धीरे-धीरे पूरे क्षेत्र में गहराता जा रहा है।

नॉर्वे स्थित एक मानवाधिकार संगठन के अनुसार,इन टकरावों में अब तक कम-से-कम 27 प्रदर्शनकारियों ने अपनी जान गंवाई है। रिपोर्ट में दावा किया गया कि मरने वालों में 18 वर्ष से कम उम्र के पाँच बच्चे भी शामिल हैं। दूसरी ओर,ईरानी सरकार ने यह स्वीकार किया है कि हिंसा में सुरक्षा बलों को भी नुकसान हुआ है। सरकारी मीडिया के अनुसार,अशांति के दौरान कम-से-कम तीन लोगों की मौत हुई,जबकि मंगलवार को एक पुलिसकर्मी के मारे जाने की भी पुष्टि की गई। बताया गया कि पहले मारे गए प्रदर्शनकारियों के अंतिम संस्कार के दौरान फिर से झड़पें भड़क उठीं और उसी दौरान पुलिसकर्मी को गोली मार दी गई।

इन घटनाओं पर ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई ने इस सप्ताह पहली बार सार्वजनिक प्रतिक्रिया दी। उन्होंने सख्त शब्दों में कहा कि “उपद्रवियों” को किसी भी कीमत पर रोका जाना चाहिए और कानून-व्यवस्था से समझौता नहीं किया जाएगा। खामेनेई का यह बयान स्पष्ट संकेत देता है कि सरकार फिलहाल किसी तरह की ढील देने के मूड में नहीं है और प्रदर्शनों को सख्ती से नियंत्रित करने की रणनीति पर काम कर रही है।

28 दिसंबर को जिन इलाकों में सबसे पहले विरोध शुरू हुआ था,वहाँ अब भी तनाव बना हुआ है। उस दिन कई दुकानदारों ने अपने कारोबार बंद कर सरकार के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध दर्ज कराया था। धीरे-धीरे यह विरोध देश के अन्य हिस्सों तक फैल गया। मंगलवार को राजधानी तेहरान के कई प्रमुख व्यापारिक इलाकों में भी इसी तरह के प्रदर्शन देखे गए। व्यापारियों और आम नागरिकों का कहना है कि लगातार बढ़ती महँगाई,गिरती आय और सीमित रोजगार अवसरों ने आम लोगों का जीवन बेहद कठिन बना दिया है।

ईरान की अर्थव्यवस्था लंबे समय से अमेरिकी प्रतिबंधों और आंतरिक नीतिगत चुनौतियों के दबाव में है। मुद्रा की कीमत में गिरावट,जरूरी सामानों की बढ़ी कीमतें और ईंधन सब्सिडी में कटौती जैसी नीतियों ने जनजीवन पर गहरा असर डाला है। कई विश्लेषकों का मानना है कि सरकार द्वारा सुधारों की बजाय नियंत्रण और दमन के रास्ते को चुनना,जनता के असंतोष को और ज्यादा भड़काने का काम कर रहा है। मौजूदा विरोध को हाल के वर्षों के सबसे बड़े आंदोलनों में से एक माना जा रहा है। इससे पहले 2022 और 2023 में उस समय देशभर में बड़े प्रदर्शन हुए थे,जब एक युवती की हिरासत में मौत हो गई थी। उस युवती को महिलाओं के लिए लागू सख्त ड्रेस कोड का उल्लंघन करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था और उसकी मौत ने पूरे ईरान को झकझोर दिया था।

नए दौर के प्रदर्शनों में आर्थिक मुद्दों के साथ नागरिक स्वतंत्रता और राजनीतिक अधिकारों की माँग भी प्रमुख रूप से उभर रही है। कई वीडियो में युवा प्रदर्शनकारियों को खुले तौर पर सरकार की नीतियों की आलोचना करते और परिवर्तन की माँग करते देखा जा सकता है। कुछ स्थानों पर महिलाएँ भी बड़ी संख्या में सड़कों पर दिखाई दीं,जो पहले के आंदोलनों से उपजे आत्मविश्वास को दर्शाता है।

मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने इन झड़पों और सुरक्षा बलों द्वारा की जा रही कार्रवाई को लेकर गंभीर चिंता जताई है। संगठन का कहना है कि प्रदर्शनकारियों पर अत्यधिक बल प्रयोग और गोलीबारी जैसी घटनाएँ अंतर्राष्ट्रीय कानून के उल्लंघन के दायरे में आती हैं। एमनेस्टी ने ईरानी सरकार से अपील की है कि वह शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार को स्वीकार करे और हिंसा का सहारा लेने के बजाय बातचीत का रास्ता अपनाए।

इसी बीच,ईरान के निर्वासित क्राउन प्रिंस रजा पहलवी ने भी पहली बार जनता से सीधे अपील की है। अपने संदेश में उन्होंने लोगों से आग्रह किया कि 8 और 9 जनवरी की शाम,जहाँ भी हों,रात आठ बजे से नारे लगाने शुरू करें। उनका कहना था कि जनता की प्रतिक्रिया के आधार पर आगे की रणनीति तय की जाएगी। पहलवी की इस अपील को विपक्षी समूहों में नया उत्साह देने वाला कदम माना जा रहा है, हालाँकि,सरकार इसे “विदेश समर्थित साजिश” बताकर खारिज करती रही है।

स्थानीय विश्लेषकों के अनुसार,हालात की गंभीरता इस बात से समझी जा सकती है कि प्रदर्शन अब केवल छोटे शहरों तक सीमित नहीं रह गए,बल्कि राजधानी और बड़े औद्योगिक केंद्रों तक फैल चुके हैं। कई जगहों पर व्यापारिक प्रतिष्ठानों के बंद रहने से आर्थिक गतिविधियों पर भी असर पड़ा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सरकार समय रहते आर्थिक राहत और राजनीतिक संवाद के उपाय नहीं करती,तो यह असंतोष लंबी अवधि के संकट में बदल सकता है।

हालाँकि,सरकारी तंत्र फिलहाल प्रदर्शनकारियों पर सख्त कार्रवाई की रणनीति अपना रहा है। कई वीडियो में सुरक्षा बलों को आँसू गैस के गोले दागते,लाठियाँ चलाते और कुछ मामलों में सीधे गोलियाँ चलाते भी देखा गया। इसके बावजूद भीड़ का हौसला कम नहीं हुआ और रात होते-होते कई शहरों में सड़कों पर लोगों की संख्या और बढ़ती चली गई।

ईरान के सामने चुनौती दोहरी है। एक ओर,उसे आर्थिक सुधारों के जरिए आम जनता का भरोसा जीतना होगा,जबकि दूसरी ओर,उसे कानून-व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा से भी समझौता नहीं करना है,लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल सख्ती के सहारे इस संकट का समाधान संभव है? राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि मौजूदा हालात में संवाद,पारदर्शिता और जवाबदेही ही स्थायी समाधान की कुंजी हो सकते हैं।

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी इन घटनाओं के असर पर नजर रखी जा रही है। कई पश्चिमी देशों ने मानवाधिकार उल्लंघन पर चिंता जताई है और ईरान से संयम बरतने की अपील की है। वहीं,ईरान का आरोप है कि बाहरी ताकतें उसके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप कर रही हैं और विरोध प्रदर्शनों को बढ़ावा दे रही हैं।

ईरान इस समय एक नाजुक मोड़ पर खड़ा है। सड़कों पर उतर आई जनता परिवर्तन की माँग कर रही है,जबकि सरकार अपनी पकड़ ढीली नहीं करना चाहती। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि देश किस दिशा में आगे बढ़ता है—क्या सरकार रियायतें देकर संवाद का रास्ता चुनती है या फिर सख्ती और नियंत्रण के जरिए हालात काबू करने की कोशिश जारी रखती है। फिलहाल इतना तय है कि मौजूदा विरोध ने ईरानी समाज और शासन के बीच मौजूद गहरी खाई को उजागर कर दिया है और इस खाई को पाटे बिना स्थिरता की उम्मीद करना मुश्किल लगता है।