नई दिल्ली,18 मार्च (युआईटीवी)- संसद के उच्च सदन राज्यसभा में आयोजित विदाई सत्र के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सेवानिवृत्त हो रहे सांसदों को संबोधित करते हुए भावुक और प्रेरणादायक संदेश दिया। उन्होंने कहा कि राजनीति एक सतत यात्रा है,जिसमें कभी पूर्ण विराम नहीं होता,बल्कि हर अंत एक नई शुरुआत का संकेत होता है। अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने न केवल निवर्तमान सदस्यों के योगदान की सराहना की,बल्कि संसद की परंपराओं,अनुभवों और लोकतांत्रिक मूल्यों पर भी विस्तार से चर्चा की।
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि यह अवसर हर दो वर्ष में आता है,लेकिन हर बार यह भावनात्मक रूप से उतना ही महत्वपूर्ण होता है। उन्होंने कहा, “यह एक ऐसा क्षण है जब हम अपने उन साथियों के प्रति सम्मान व्यक्त करते हैं,जिन्होंने इस सदन में अपनी भूमिका निभाई और अब एक नए उद्देश्य की ओर अग्रसर हो रहे हैं।” उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि राज्यसभा केवल एक विधायी संस्था नहीं,बल्कि अनुभवों और विचारों का संगम है,जहाँ हर सदस्य अपने दृष्टिकोण से राष्ट्र निर्माण में योगदान देता है।
प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में यह भी कहा कि सदन के भीतर होने वाली चर्चाएँ और बहसें लोकतंत्र की आत्मा हैं। यहाँ विभिन्न विचारधाराओं और दृष्टिकोणों का आदान-प्रदान होता है,जिससे नीतियों को अधिक व्यापक और प्रभावी बनाया जा सकता है। उन्होंने स्वीकार किया कि सदन में कभी-कभी मतभेद भी होते हैं और खट्टे-मीठे अनुभव भी सामने आते हैं,लेकिन अंततः सभी का उद्देश्य राष्ट्रहित ही होता है।
उन्होंने कहा, “आज जो साथी यहाँ से विदा ले रहे हैं,उनमें से कुछ पुनः लौटने के लिए जा रहे हैं,जबकि कुछ अपने अनुभव को लेकर समाज के अन्य क्षेत्रों में योगदान देंगे। जो साथी अब वापस नहीं आएँगे,उनसे मैं कहना चाहता हूँ कि राजनीति में कोई फुल स्टॉप नहीं होता है। भविष्य आपका इंतजार कर रहा है और आपका अनुभव राष्ट्र जीवन में हमेशा महत्वपूर्ण बना रहेगा।”
प्रधानमंत्री मोदी ने इस अवसर पर सदन के उपसभापति हरिवंश के योगदान की विशेष सराहना की। उन्होंने कहा कि हरिवंश ने अपने मृदुभाषी स्वभाव और संतुलित नेतृत्व के माध्यम से सदन को सुचारू रूप से चलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने कहा कि उपसभापति के रूप में हरिवंश ने सभी दलों का विश्वास जीतने का निरंतर प्रयास किया और अपनी जिम्मेदारियों को पूरी निष्ठा से निभाया।
अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने संसद की उस परंपरा का भी उल्लेख किया,जिसमें हर दो वर्ष में एक बड़ा समूह सदन से विदा लेता है और नया समूह उसकी जगह लेता है। उन्होंने इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया की एक अनूठी विशेषता बताते हुए कहा कि इससे अनुभव और ऊर्जा का संतुलन बना रहता है। उन्होंने कहा कि नए सदस्य पुराने सदस्यों से सीखते हैं और इस तरह सदन की विरासत लगातार आगे बढ़ती रहती है।
प्रधानमंत्री ने कहा कि राज्यसभा में छह वर्षों का कार्यकाल केवल नीतिगत योगदान तक सीमित नहीं होता,बल्कि यह एक ऐसा अनुभव है,जो व्यक्ति के जीवन को समृद्ध बनाता है। उन्होंने कहा कि जब कोई सांसद अपने विचारों और क्षमताओं के साथ इस सदन में प्रवेश करता है,तो यहाँ के अनुभवों से वह और अधिक परिपक्व और प्रभावशाली बन जाता है।
इस दौरान प्रधानमंत्री ने वरिष्ठ नेताओं के योगदान का भी विशेष रूप से उल्लेख किया। उन्होंने एच.डी. देवगौड़ा,मल्लिकार्जुन खड़गे और शरद पवार जैसे नेताओं की सराहना करते हुए कहा कि इनका अधिकांश जीवन संसदीय कार्यप्रणाली में बीता है और इनके अनुभव से नए सांसदों को बहुत कुछ सीखने को मिल सकता है। उन्होंने कहा कि इन नेताओं ने सदन में हमेशा समर्पण,अनुशासन और जिम्मेदारी का परिचय दिया है।
प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में हल्के-फुल्के अंदाज में रामदास अठावले का भी जिक्र किया और कहा कि वे अपने हास्य और बुद्धिमत्ता के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने विश्वास जताया कि अठावले भविष्य में भी अपने इसी अंदाज से लोगों का मनोरंजन करते रहेंगे और समाज में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करेंगे।
प्रधानमंत्री मोदी ने यह भी कहा कि संसद केवल कानून बनाने का मंच नहीं है,बल्कि यह देश के विविध विचारों,संस्कृतियों और अनुभवों का प्रतिनिधित्व करता है। उन्होंने कहा कि यहां आने वाले हर सदस्य को यह समझना चाहिए कि वह केवल अपने क्षेत्र या दल का प्रतिनिधि नहीं,बल्कि पूरे राष्ट्र का प्रतिनिधि है। इस दृष्टिकोण से काम करने पर ही संसद की गरिमा और प्रभावशीलता बनी रह सकती है।
उन्होंने कहा कि विदाई का यह क्षण केवल एक औपचारिकता नहीं है,बल्कि यह आत्ममंथन का अवसर भी है। यह समय होता है,जब हम अपने अनुभवों को याद करते हैं,उनसे सीखते हैं और भविष्य के लिए नई दिशा तय करते हैं। उन्होंने सभी निवर्तमान सांसदों को शुभकामनायें देते हुए कहा कि वे जहाँ भी जाएँ,अपने अनुभव और ज्ञान का उपयोग समाज के हित में करें।
प्रधानमंत्री ने यह भी रेखांकित किया कि लोकतंत्र की मजबूती केवल संस्थाओं से नहीं, बल्कि उन लोगों से होती है जो इन संस्थाओं में काम करते हैं। उन्होंने कहा कि संसद की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसके सदस्य कितनी ईमानदारी,समर्पण और जिम्मेदारी के साथ अपनी भूमिका निभाते हैं।
अपने संबोधन के अंत में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि राजनीति एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है,जिसमें हर व्यक्ति का योगदान महत्वपूर्ण होता है। उन्होंने कहा कि चाहे कोई सांसद सदन में हो या बाहर,उसका अनुभव और दृष्टिकोण राष्ट्र निर्माण में हमेशा उपयोगी रहेगा। उन्होंने सभी निवर्तमान सांसदों को उनके भविष्य के प्रयासों के लिए शुभकामनाएँ दीं और आशा जताई कि वे देश और समाज के लिए आगे भी इसी तरह काम करते रहेंगे।
राज्यसभा का यह विदाई सत्र न केवल एक औपचारिक कार्यक्रम रहा,बल्कि यह उन मूल्यों और परंपराओं की याद दिलाने वाला अवसर भी बना,जो भारतीय लोकतंत्र की नींव हैं। प्रधानमंत्री के संबोधन ने इस बात को स्पष्ट किया कि राजनीति केवल सत्ता का माध्यम नहीं,बल्कि सेवा और समर्पण का मार्ग है,जिसमें हर अनुभव और हर प्रयास राष्ट्र के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
