चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन (तस्वीर क्रेडिट@NealMarcusMKT)

रूस ने किया ताइवान पर चीन के दावे का समर्थन,बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच कठोर रुख स्पष्ट

मॉस्को,31 दिसंबर (युआईटीवी)- एशिया-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और ताइवान को लेकर अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के नए समीकरणों के बीच रूस ने एक बार फिर अपना स्पष्ट और कड़ा रुख सामने रखा है। रूसी विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा कि ताइवान चीन का “अटूट और अविभाज्य हिस्सा” है और रूस ताइवान की स्वतंत्रता के किसी भी रूप या प्रयास का स्पष्ट विरोध करता है।

रूस का यह रुख ऐसे समय आया है,जब ताइवान मुद्दा केवल द्विपक्षीय विवाद नहीं रहा,बल्कि वैश्विक शक्ति-संतुलन का संवेदनशील केंद्र बन चुका है। बयान में कहा गया कि कुछ देश सार्वजनिक रूप से “एक-चीन नीति” का समर्थन करने की बात करते हैं,लेकिन व्यवहार में वे ताइवान को लेकर यथास्थिति बनाए रखने का तर्क देते हैं,जो चीन के राष्ट्रीय एकीकरण के मूल सिद्धांत के बिल्कुल विपरीत है।

समाचार एजेंसी सिन्हुआ के अनुसार,रूस ने इशारों-इशारों में अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की नीति पर सवाल उठाया। मंत्रालय ने कहा कि ताइवान को आज अंतर्राष्ट्रीय मंच पर चीन के खिलाफ “रणनीतिक और सैन्य घेराबंदी के उपकरण” की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। रूस के मुताबिक यह न केवल चीन की संप्रभुता को चुनौती देता है,बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता के लिए भी खतरा पैदा करता है।

क्रेमलिन का कहना है कि ताइवान मुद्दे पर रूस का रुख नया नहीं है,बल्कि यह “दीर्घकालिक,सिद्धांत-आधारित और कई बार उच्चतम स्तर पर दोहराया गया” दृष्टिकोण है। रूस के अनुसार,यह मामला पूरी तरह चीन का आंतरिक मसला है और बीजिंग को अपनी क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता की रक्षा के लिए सभी वैध कदम उठाने का अधिकार है।

रूस का यह बयान ऐसे समय सामने आया है,जब अमेरिका की ओर से जारी एक महत्वपूर्ण रक्षा रिपोर्ट ने एशिया-प्रशांत क्षेत्र में चिंता और तेज कर दी है। अमेरिकी रक्षा विभाग द्वारा कांग्रेस को सौंपी गई रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन ताइवान पर संभावित कब्जे के लिए अपनी सैन्य क्षमता लगातार बढ़ा रहा है और 2027 तक “युद्ध के लिए तैयार” होने का लक्ष्य रखता है।

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) ने 2027 के रणनीतिक लक्ष्यों की ओर उल्लेखनीय प्रगति की है,जिनमें से एक ताइवान पर “रणनीतिक निर्णायक जीत” हासिल करने की क्षमता विकसित करना है। दस्तावेज़ में यह भी कहा गया है कि चीन अपनी सैन्य योजनाओं को व्यापक रूप से अमेरिकी क्षमताओं और रणनीतियों को ध्यान में रखते हुए तैयार कर रहा है,क्योंकि बीजिंग वाशिंगटन को अपने लिए सबसे “मजबूत प्रतिद्वंद्वी” के रूप में देखता है।

अमेरिकी विश्लेषकों के अनुसार,चीन की रणनीति अब केवल ताइवान की स्वतंत्रता रोकने तक सीमित नहीं है। इसके बजाय,वह ऐसे हालात पैदा करना चाहता है,जहाँ ताइपे बीजिंग की शर्तों पर “एकीकरण” के लिए मजबूर हो जाए। रिपोर्ट बताती है कि यह दबाव केवल सैन्य गतिविधियों तक सीमित नहीं है,बल्कि इसमें कूटनीति,आर्थिक उपाय,साइबर और सूचना अभियानों का संयुक्त उपयोग शामिल है। इन सभी कदमों का उद्देश्य ताइवान की राजनीतिक इच्छाशक्ति और रक्षा मनोबल को धीरे-धीरे कमजोर करना है।

इस पृष्ठभूमि में रूस का बयान चीन के लिए एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक समर्थन के रूप में देखा जा रहा है। मॉस्को और बीजिंग हाल के वर्षों में रणनीतिक साझेदारी को लगातार मजबूत कर रहे हैं,विशेषकर ऐसे समय में जब दोनों देशों के संबंध पश्चिमी शक्तियों के साथ तनावपूर्ण बने हुए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ताइवान पर रूस का खुला समर्थन,चीन के साथ इसके बढ़ते सामरिक समीकरण को और सुदृढ़ करता है।

दूसरी ओर,ताइवान बार-बार कहता रहा है कि वह “यथास्थिति” को बनाए रखना चाहता है और चीन के दबाव के आगे झुकने के लिए तैयार नहीं। ताइपे का तर्क है कि लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई उसकी सरकार को अपने भविष्य का फैसला खुद करने का अधिकार है। हालाँकि,बीजिंग इसे “अलगाववाद” मानता है और कहता है कि ताइवान सदियों से चीन का हिस्सा रहा है तथा अंततः पुन:एकीकरण अनिवार्य है—चाहे शांतिपूर्ण रास्ते से या फिर आवश्यकता पड़ने पर शक्ति के इस्तेमाल से।

अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के लिए चुनौती यह है कि ताइवान जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे व्यस्त व्यापारिक मार्गों में से एक है। यहाँ किसी भी तरह का सैन्य टकराव वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं,खासकर सेमीकंडक्टर उद्योग पर गहरा प्रभाव डाल सकता है। यही कारण है कि कई देश सार्वजनिक रूप से शांति और संवाद की अपील करते दिखते हैं,पर पर्दे के पीछे रणनीतिक तैयारियाँ भी जारी रखते हैं।

रूस के ताजा बयान ने स्पष्ट कर दिया है कि भविष्य में ताइवान से जुड़े किसी भी अंतर्राष्ट्रीय समीकरण में वह खुलकर चीन के साथ खड़ा रहेगा। वहीं अमेरिका की रिपोर्ट यह संकेत दे रही है कि आने वाले वर्षों में ताइवान को लेकर सैन्य और कूटनीतिक तनाव और बढ़ सकता है।

फिलहाल,क्षेत्र में सभी पक्ष इस संवेदनशील मुद्दे पर अपनी-अपनी रणनीति को धार दे रहे हैं,लेकिन सवाल वही है कि क्या ताइवान विवाद संवाद से सुलझेगा या यह प्रतिस्पर्धा किसी बड़े संकट का रूप लेगी? जवाब तलाशने की कोशिशें जारी हैं,जबकि दुनिया की नज़रें ताइवान जलडमरूमध्य पर टिकी हुई हैं।