सुप्रीम कोर्ट

सबरीमाला पुनर्विचार याचिकाओं पर 7 अप्रैल से सुनवाई,नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ करेगी विचार

नई दिल्ली,17 फरवरी (युआईटीवी)- सुप्रीम कोर्ट की नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ सबरीमाला मामले में दायर पुनर्विचार याचिकाओं पर 7 अप्रैल से सुनवाई शुरू करेगी। यह मामला केरल स्थित प्रसिद्ध सबरीमाला श्री अय्यप्पा मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश से जुड़ा है,जिस पर सितंबर 2018 में शीर्ष अदालत ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। उस फैसले के खिलाफ दायर पुनर्विचार याचिकाओं पर अब विस्तृत सुनवाई का कार्यक्रम तय कर दिया गया है।

भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकान्त की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट किया कि संविधान पीठ की कार्यवाही अत्यंत महत्वपूर्ण है और इसे सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी। अदालत ने सभी पक्षों को निर्देश दिया है कि वे 14 मार्च या उससे पहले अपनी लिखित दलीलें दाखिल करें,ताकि सुनवाई निर्धारित समय-सीमा में पूरी की जा सके। अदालत ने 22 अप्रैल तक बहस समाप्त करने का विस्तृत कार्यक्रम भी निर्धारित किया है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में 10 फरवरी 2020 के आदेश का हवाला देते हुए कहा कि नौ न्यायाधीशों की पीठ द्वारा विचार के लिए कानून के सात प्रश्न पहले ही तैयार किए जा चुके हैं। इन प्रश्नों का संबंध धार्मिक स्वतंत्रता,समानता के अधिकार,परंपराओं की संवैधानिक वैधता और न्यायिक समीक्षा की सीमाओं से है। अदालत ने कहा कि लंबित कानूनी प्रश्नों का अंतिम निपटारा करने के उद्देश्य से यह आवश्यक है कि सभी पक्ष निर्धारित समय के भीतर अपनी दलीलें प्रस्तुत करें।

निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार,पुनर्विचार याचिकाओं का समर्थन करने वाले पक्षों को 7 से 9 अप्रैल के बीच सुना जाएगा। इसके बाद पुनर्विचार का विरोध करने वाले पक्ष 14 से 16 अप्रैल तक अपने तर्क रखेंगे। यदि किसी पक्ष को पुनः सहमति या प्रत्युत्तर संबंधी दलीलें प्रस्तुत करनी होंगी तो उन पर 21 अप्रैल को सुनवाई होगी। इसके बाद एमिकस क्यूरी द्वारा अंतिम दलीलें दी जाएँगी और 22 अप्रैल तक बहस समाप्त होने की उम्मीद है।

पीठ ने यह भी निर्देश दिया कि नोडल वकील,सभी पक्षों के अधिवक्ताओं से परामर्श कर आंतरिक व्यवस्था तैयार करें ताकि मौखिक दलीलें तय समय-सीमा के भीतर पूरी की जा सकें। अदालत ने सुनवाई के दौरान टिप्पणी की कि संविधान पीठ की कार्यवाही “किसी भी अन्य चीज से अधिक महत्वपूर्ण” है और सभी पक्षों को इन तिथियों के लिए अपने कार्यक्रम खाली रखने चाहिए।

गौरतलब है कि सितंबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट की पाँच न्यायाधीशों की पीठ ने बहुमत से फैसला सुनाते हुए सबरीमाला मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दी थी। इससे पहले 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के प्रवेश पर परंपरागत प्रतिबंध लागू था,जिसे चुनौती देते हुए कई याचिकाएं दायर की गई थीं। अदालत के फैसले के बाद देशभर में व्यापक बहस छिड़ गई थी और केरल में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए थे।

पुनर्विचार याचिकाओं में तर्क दिया गया है कि मंदिर की परंपराएँ और धार्मिक मान्यताएँ संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत संरक्षित हैं,जबकि विरोध करने वाले पक्षों का कहना है कि किसी भी धार्मिक परंपरा को समानता और गरिमा के संवैधानिक मूल्यों से ऊपर नहीं रखा जा सकता। यही कारण है कि मामला व्यापक संवैधानिक महत्व का बन गया है और इसे नौ न्यायाधीशों की बड़ी पीठ को सौंपा गया।

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को सूचित किया कि केंद्र पुनर्विचार याचिकाओं का समर्थन कर रहा है। उन्होंने कहा कि यह मामला केवल एक मंदिर तक सीमित नहीं है,बल्कि इससे जुड़े संवैधानिक प्रश्न देश के अन्य धार्मिक स्थलों और परंपराओं को भी प्रभावित कर सकते हैं। केंद्र का रुख इस बहस को और अधिक महत्वपूर्ण बना देता है।

अब जब सुनवाई की तिथि तय हो चुकी है,सभी पक्षों की निगाहें संविधान पीठ पर टिकी हैं। अदालत का अंतिम निर्णय न केवल सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के मुद्दे को स्पष्ट करेगा,बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता और लैंगिक समानता के बीच संतुलन को लेकर एक महत्वपूर्ण संवैधानिक दृष्टांत भी स्थापित करेगा। अप्रैल में होने वाली यह सुनवाई देश की न्यायिक और सामाजिक बहस में एक नया अध्याय जोड़ने वाली मानी जा रही है।