सोनिया गांधी

सोनिया गांधी की नागरिकता और वोटर लिस्ट विवाद पर अदालत में सुनवाई आज,पुराने आरोपों पर फिर गरमाई सियासत

नई दिल्ली,21 फरवरी (युआईटीवी)- राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की एक अदालत शनिवार को कांग्रेस पार्लियामेंट्री पार्टी की चेयरपर्सन सोनिया गांधी के खिलाफ दायर एक याचिका पर सुनवाई करेगी,जिसमें आरोप लगाया गया है कि भारतीय नागरिकता प्राप्त करने से पहले उनका नाम कथित रूप से फर्जी तरीके से मतदाता सूची में शामिल किया गया था। इस मामले ने एक बार फिर राजनीतिक और कानूनी हलकों में हलचल पैदा कर दी है।

यह याचिका वकील विकास त्रिपाठी की ओर से दायर की गई है,जिसमें अतिरिक्त मुख्य महानगर मजिस्ट्रेट वैभव चौरसिया के 11 सितंबर 2025 के आदेश को चुनौती दी गई है। मजिस्ट्रेट ने उस शिकायत को खारिज कर दिया था,जिसमें मतदाता सूची में सोनिया गांधी का नाम गलत तरीके से शामिल करने के आरोप में पुलिस जाँच की माँग की गई थी। मजिस्ट्रेट अदालत ने अपने आदेश में कहा था कि न्यायपालिका इस प्रकार की जाँच शुरू नहीं कर सकती,जिससे संवैधानिक अधिकारियों के अधिकार क्षेत्र में अनावश्यक हस्तक्षेप हो।

याचिकाकर्ता का दावा है कि अप्रैल 1983 में आधिकारिक रूप से भारतीय नागरिकता मिलने से लगभग तीन वर्ष पहले,यानी 1980 में,नई दिल्ली विधानसभा क्षेत्र की मतदाता सूची में पहली बार सोनिया गांधी का नाम दर्ज किया गया था। याचिका में कहा गया है कि बिना वैध नागरिकता के मतदाता सूची में नाम दर्ज होना संभव नहीं है और ऐसा तभी हो सकता है,जब जाली या बनावटी दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया हो। इसे संज्ञेय अपराध बताते हुए पुलिस जाँच की माँग की गई है।

याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि वर्ष 1982 में उनका नाम मतदाता सूची से हटा दिया गया था और 1983 में भारतीय नागरिक बनने के बाद फिर से जोड़ा गया। याचिकाकर्ता का तर्क है कि इस क्रम से पहले की प्रविष्टि की वैधता पर गंभीर सवाल उठते हैं। उनके अनुसार,यदि 1980 में नाम शामिल हुआ था,तो उस समय नागरिकता का आधार क्या था और किन दस्तावेजों के आधार पर यह प्रक्रिया पूरी की गई।

इस मामले में 9 दिसंबर 2025 को राऊज एवेन्यू कोर्ट के स्पेशल जज विशाल गोगने ने याचिका पर विचार करने की सहमति जताई थी। उन्होंने सोनिया गांधी और दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी करते हुए मामले को आगे की सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया था। इससे पहले मजिस्ट्रेट अदालत ने एफआईआर दर्ज करने की माँग को अस्वीकार कर दिया था और कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 329 के तहत चुनावी मामलों में अदालत का हस्तक्षेप सीमित है।

मजिस्ट्रेट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया था कि चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची से जुड़े विवादों का समाधान चुनाव याचिका के माध्यम से किया जाना चाहिए,न कि आपराधिक जाँच के जरिए। अदालत ने कहा कि न्यायपालिका को ऐसे मामलों में सावधानी बरतनी चाहिए,ताकि संवैधानिक संस्थाओं के कार्यक्षेत्र में टकराव की स्थिति उत्पन्न न हो।

दूसरी ओर,सोनिया गांधी की ओर से इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया गया है। उन्होंने अदालत में दायर अपने जवाब में कहा कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोप राजनीति से प्रेरित हैं और तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया है। उनके अनुसार, नागरिकता से संबंधित प्रश्न केवल केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में आते हैं,जबकि मतदाता सूची से जुड़े मुद्दे चुनाव आयोग के दायरे में आते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि जालसाजी या धोखाधड़ी के आरोपों को सिद्ध करने के लिए कोई विश्वसनीय दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला कानूनी से अधिक राजनीतिक रंग लिए हुए है। सोनिया गांधी लंबे समय तक कांग्रेस पार्टी का नेतृत्व कर चुकी हैं और भारतीय राजनीति की प्रमुख हस्तियों में से एक रही हैं। ऐसे में उनके खिलाफ इस तरह के आरोपों का राजनीतिक असर भी पड़ सकता है। हालाँकि,अदालत में मामला अभी प्रारंभिक स्तर पर है और अंतिम निर्णय न्यायिक प्रक्रिया के तहत ही होगा।

इस प्रकरण ने एक बार फिर नागरिकता,मतदाता सूची और संवैधानिक प्रावधानों से जुड़े कानूनी पहलुओं को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। यदि अदालत इस मामले में विस्तृत सुनवाई का निर्णय लेती है,तो यह चुनावी प्रक्रिया और नागरिकता संबंधी कानूनों की व्याख्या को लेकर महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है।

फिलहाल सभी की नजरें अदालत की आगामी सुनवाई पर टिकी हैं। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या अदालत पुलिस जाँच के आदेश देती है या पूर्व आदेश को बरकरार रखती है। आने वाले दिनों में इस मामले की दिशा न केवल कानूनी बल्कि राजनीतिक रूप से भी अहम साबित हो सकती है।