वाशिंगटन,13 मार्च (युआईटीवी)- मध्य-पूर्व में तेजी से बदलते सुरक्षा हालात के बीच दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक माने जाने वाले होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर अंतर्राष्ट्रीय चिंता लगातार बढ़ रही है। इस जलडमरूमध्य से गुजरने वाले वाणिज्यिक जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका ने बड़ा संकेत दिया है। व्हाइट हाउस ने स्पष्ट किया है कि यदि हालात इसकी माँग करते हैं,तो अमेरिकी नौसेना इस मार्ग से गुजरने वाले कमर्शियल जहाजों को एस्कॉर्ट देने के लिए पूरी तरह तैयार है। इस घोषणा को वैश्विक ऊर्जा बाजार और समुद्री व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है,क्योंकि दुनिया के तेल और गैस का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है।
व्हाइट हाउस की डिप्टी प्रेस सेक्रेटरी अन्ना केली ने कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जरूरत पड़ने पर इस जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों की सुरक्षा के लिए अमेरिकी नौसेना को एस्कॉर्ट मिशन पर भेजने के लिए तैयार हैं। उन्होंने कहा कि अमेरिकी सेना पहले ही क्षेत्र में सक्रिय है और संभावित खतरों को खत्म करने की दिशा में कार्रवाई कर रही है। उनके अनुसार अमेरिकी सैन्य बलों ने 20 से अधिक निष्क्रिय माइन-बिछाने वाली नावों को नष्ट कर दिया है और आवश्यकता पड़ने पर ऐसी और नावों को भी नष्ट किया जाएगा।
व्हाइट हाउस की यह टिप्पणी ऐसे समय में सामने आई है,जब वाशिंगटन इस रणनीतिक समुद्री मार्ग से जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए कई विकल्पों पर विचार कर रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य एक संकरा,लेकिन बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है,जिसके जरिए खाड़ी क्षेत्र से दुनिया के विभिन्न हिस्सों में बड़ी मात्रा में तेल और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति होती है। यदि इस मार्ग में किसी तरह की बाधा आती है,तो इसका सीधा असर वैश्विक ऊर्जा बाजार और तेल की कीमतों पर पड़ सकता है।
अमेरिकी प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी इस मुद्दे पर अपनी चिंता व्यक्त की है। अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने कहा कि जैसे ही परिस्थितियां सुरक्षित मार्ग की अनुमति देंगी,अमेरिकी नौसेना संभवतः एक अंतर्राष्ट्रीय गठबंधन के साथ इस जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों को एस्कॉर्ट करना शुरू कर सकती है। उनके अनुसार अमेरिका पहले से ही ऐसी संभावित आपात स्थितियों के लिए तैयारी कर रहा था।
बेसेंट ने कहा कि अमेरिकी प्रशासन ने पिछले कई महीनों से इस क्षेत्र की स्थिति का विश्लेषण किया है और अलग-अलग संभावित परिदृश्यों पर काम किया है। उन्होंने संकेत दिया कि समुद्री सुरक्षा अभियानों की योजना पहले से तैयार की जा रही थी,ताकि यदि जरूरत पड़े तो तुरंत कार्रवाई की जा सके। उनके अनुसार अमेरिका अपने सहयोगी देशों के साथ मिलकर इस क्षेत्र में समुद्री व्यापार को सुरक्षित बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है।
खाड़ी क्षेत्र में हाल के दिनों में जहाजों पर हमलों और बढ़ती सैन्य गतिविधियों के कारण इस जलडमरूमध्य से गुजरने वाली शिपिंग गतिविधियों पर असर पड़ा है। कई जहाज कंपनियों ने सुरक्षा कारणों से अपनी गतिविधियाँ धीमी कर दी हैं या वैकल्पिक मार्गों पर विचार करना शुरू कर दिया है। इससे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और ऊर्जा व्यापार पर दबाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
दरअसल ईरान और ओमान के बीच स्थित यह जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है। अनुमान के अनुसार वैश्विक तेल व्यापार का लगभग एक तिहाई हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है। यही कारण है कि इस क्षेत्र में किसी भी तरह का सैन्य तनाव या अस्थिरता पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकती है।
हाल ही में इस क्षेत्र में एक और घटना ने चिंताओं को और बढ़ा दिया। अंतर्राष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार दुबई से लगभग 50 समुद्री मील उत्तर-पश्चिम में एक मालवाहक जहाज पर अज्ञात मिसाइल से हमला हुआ। इस हमले के बाद जहाज में आग लग गई और चालक दल को जहाज खाली करना पड़ा। इस घटना ने समुद्री सुरक्षा को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
इस मामले पर निगरानी रखने वाली संस्था यूनाइटेड किंगडम समुद्री व्यापार संचालन ने बताया कि जहाज के सभी चालक दल के सदस्य सुरक्षित हैं और उन्हें बचा लिया गया है। हालाँकि,घटना की जाँच जारी है और अभी यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि इस हमले के पीछे कौन जिम्मेदार है। अधिकारियों ने इस क्षेत्र में काम कर रहे जहाजों को अतिरिक्त सावधानी बरतने और किसी भी संदिग्ध गतिविधि की तुरंत सूचना देने की सलाह दी है।
इन घटनाओं का असर केवल क्षेत्रीय देशों तक सीमित नहीं है,बल्कि वैश्विक स्तर पर भी चिंता का विषय बन गया है। खासकर भारत जैसे देशों के लिए यह स्थिति बेहद संवेदनशील मानी जा रही है,क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से आयात करता है। ऐसे में यदि इस जलडमरूमध्य में किसी तरह की बाधा आती है,तो इसका सीधा असर भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आपूर्ति श्रृंखला पर पड़ सकता है।
इसी पृष्ठभूमि में नरेंद्र मोदी ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियन से बातचीत की और क्षेत्र में बिगड़ते हालात पर चर्चा की। प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट साझा करते हुए बताया कि उन्होंने ईरानी राष्ट्रपति से मौजूदा स्थिति पर विस्तार से बात की है।
प्रधानमंत्री ने कहा कि उन्होंने क्षेत्र में बढ़ते तनाव,नागरिकों की जान जाने और नागरिक बुनियादी ढाँचे को नुकसान पहुँचने को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भारतीय नागरिकों की सुरक्षा के साथ-साथ ऊर्जा और व्यापारिक सामान की निर्बाध आवाजाही भारत की सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में से एक है। मोदी ने इस बातचीत के दौरान शांति और स्थिरता के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दोहराया और सभी पक्षों से बातचीत और कूटनीति के जरिए समाधान खोजने का आग्रह किया।
भारतीय अधिकारियों के अनुसार हालिया संघर्ष शुरू होने के बाद यह दोनों नेताओं के बीच पहला सीधा संपर्क था। इससे यह भी संकेत मिलता है कि भारत पश्चिम एशिया की स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है और कूटनीतिक स्तर पर सक्रिय भूमिका निभा रहा है।
दरअसल पिछले कुछ समय से नई दिल्ली ने पश्चिम एशिया में अपनी कूटनीतिक गतिविधियों को तेज किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस क्षेत्र के कई प्रमुख नेताओं से बातचीत कर स्थिति पर चर्चा की है। इनमें ओमान,कुवैत,बहरीन,सऊदी अरब,संयुक्त अरब अमीरात,जॉर्डन,इज़राइल और कतर जैसे देशों के नेता शामिल हैं।
इसी क्रम में भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भी ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची के साथ समुद्री सुरक्षा और ऊर्जा आपूर्ति से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की है। भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जयसवाल ने एक प्रेस ब्रीफिंग में बताया कि पिछले कुछ दिनों में दोनों विदेश मंत्रियों के बीच तीन बार बातचीत हो चुकी है।
जायसवाल ने कहा कि आखिरी बातचीत के दौरान विशेष रूप से शिपिंग सुरक्षा और भारत की ऊर्जा सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की गई। उन्होंने कहा कि भारत इस बात को सुनिश्चित करना चाहता है कि इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग से गुजरने वाले व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति में किसी तरह की बाधा न आए।
विशेषज्ञों का मानना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा केवल क्षेत्रीय देशों के लिए ही नहीं,बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है। यदि इस मार्ग में लंबे समय तक कोई व्यवधान आता है,तो तेल और गैस की कीमतों में भारी उछाल देखने को मिल सकता है,जिससे दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं पर असर पड़ सकता है।
ऐसे में अमेरिका की ओर से जहाजों को नौसैनिक एस्कॉर्ट देने की संभावना को एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। हालाँकि,यह भी स्पष्ट है कि इस तरह के सैन्य कदम से क्षेत्रीय तनाव और बढ़ सकता है,इसलिए कई विशेषज्ञ कूटनीतिक समाधान पर भी जोर दे रहे हैं।
फिलहाल स्थिति बेहद संवेदनशील बनी हुई है और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की नजर इस क्षेत्र पर टिकी हुई है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या कूटनीतिक प्रयासों के जरिए तनाव कम किया जा सकेगा या फिर समुद्री सुरक्षा के लिए बड़े सैन्य कदम उठाने पड़ेंगे। इतना जरूर है कि होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ी घटनाएँ केवल क्षेत्रीय मुद्दा नहीं रह गई हैं,बल्कि यह वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए एक बड़ा रणनीतिक सवाल बन चुकी हैं।
