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आरबीआई के सख्त कदम से मजबूत हुआ रुपया,डॉलर के मुकाबले 1.3% की उछाल; तेल कीमतों का खतरा बरकरार

नई दिल्ली,30 मार्च (युआईटीवी)- भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक अहम घटनाक्रम सामने आया है,जहाँ भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की नई पहल के बाद सोमवार को भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले मजबूत होकर खुला। शुरुआती कारोबार में रुपया करीब 1.3 प्रतिशत की मजबूती के साथ 93.59 के स्तर पर पहुँच गया,जिससे बाजार में सकारात्मक संकेत देखने को मिले। यह मजबूती ऐसे समय में आई है,जब पिछले कुछ हफ्तों से रुपया लगातार दबाव में था और वैश्विक परिस्थितियों के कारण इसमें गिरावट दर्ज की जा रही थी।

दरअसल,आरबीआई ने विदेशी मुद्रा बाजार में बढ़ती सट्टेबाजी को नियंत्रित करने के लिए एक अहम कदम उठाया है। केंद्रीय बैंक ने बैंकों को निर्देश दिया है कि वे रुपए में अपनी ओपन पोजिशन को 100 मिलियन डॉलर तक सीमित रखें। इस फैसले का मुख्य उद्देश्य रुपये में हो रही अत्यधिक गिरावट को रोकना और बाजार में स्थिरता लाना है। आरबीआई ने अधिकृत डीलर बैंकों से स्पष्ट रूप से कहा है कि वे दिन के अंत तक अपनी ऑनशोर पोजिशन इस निर्धारित सीमा के भीतर रखें।

इस निर्देश के तहत सभी वाणिज्यिक बैंकों को 10 अप्रैल तक इस नियम को पूरी तरह लागू करने के लिए कहा गया है। साथ ही केंद्रीय बैंक ने यह भी संकेत दिया है कि बाजार की परिस्थितियों के अनुसार आगे चलकर अलग-अलग सीमाएँ भी निर्धारित की जा सकती हैं। यह कदम इस बात का संकेत है कि आरबीआई विदेशी मुद्रा बाजार में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के लिए सक्रिय भूमिका निभा रहा है।

विश्लेषकों का अनुमान है कि बैंकों द्वारा रखी जाने वाली ओपन पोजिशन का आकार 25 अरब डॉलर से लेकर 50 अरब डॉलर से अधिक तक हो सकता है। ऐसे में इस सीमा को तय करने से बाजार में डॉलर की माँग पर असर पड़ेगा और इससे रुपये को मजबूती मिलने की संभावना है। यही वजह है कि आरबीआई के इस फैसले के तुरंत बाद रुपये में उछाल देखने को मिला।

पिछले कुछ समय में रुपया कई चुनौतियों का सामना कर रहा था। मार्च महीने में वैश्विक तनाव और आर्थिक अनिश्चितताओं के चलते रुपया 4 प्रतिशत से अधिक कमजोर हो गया था। पिछले शुक्रवार को यह करीब 1 प्रतिशत गिरकर 94.8125 के स्तर पर पहुँच गया था और 94.84 तक फिसल गया था। इस गिरावट ने बाजार में चिंता बढ़ा दी थी और निवेशकों के बीच अस्थिरता का माहौल बन गया था।

विशेषज्ञों का मानना है कि रुपया कमजोर होने के पीछे सबसे बड़ा कारण कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें हैं। भारत जैसे देश,जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर हैं,उनके लिए तेल की कीमतों में वृद्धि सीधे आर्थिक दबाव का कारण बनती है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव ने इस स्थिति को और जटिल बना दिया है।

मध्य पूर्व में चल रहे संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को झकझोर दिया है। इस तनाव के कारण ब्रेंट क्रूड की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं और यह करीब 116 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच गई हैं। वहीं अमेरिकी डब्ल्यूटीआई क्रूड भी बढ़कर लगभग 103.38 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार करता नजर आया। तेल की इन ऊँची कीमतों ने न केवल रुपये पर दबाव बढ़ाया है,बल्कि महँगाई और चालू खाते के घाटे को लेकर भी चिंताएँ बढ़ा दी हैं।

विश्लेषकों का कहना है कि पहले भारतीय अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में थी, जहां तेज आर्थिक वृद्धि,नियंत्रित महँगाई और स्थिर वित्तीय घाटा देखने को मिल रहा था,लेकिन वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों के चलते अब यह संतुलन बिगड़ता नजर आ रहा है। आने वाले समय में जीडीपी ग्रोथ में कमी,महँगाई में वृद्धि और राजकोषीय तथा चालू खाते के घाटे में बढ़ोतरी की आशंका जताई जा रही है।

हालाँकि,कुछ विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि बाजार ने इन संभावित जोखिमों को पहले ही काफी हद तक अपने भीतर समाहित कर लिया है। उदाहरण के तौर पर शेयर बाजार में निफ्टी 50 का पी/ई रेशियो करीब 19.9 गुना पर आ गया है,जो मौजूदा परिस्थितियों में संतुलित माना जा रहा है। हालाँकि,इसे अभी पूरी तरह सस्ता नहीं कहा जा सकता,लेकिन यह संकेत देता है कि निवेशकों ने जोखिमों को ध्यान में रखते हुए अपने फैसले लिए हैं।

आरबीआई के इस कदम को अल्पकालिक रूप से रुपये के लिए सहायक माना जा रहा है। डॉलर की बड़ी पोजिशन को सीमित करने से विदेशी मुद्रा बाजार में संतुलन आएगा और रुपये को मजबूती मिल सकती है,लेकिन दीर्घकालिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो रुपये की स्थिरता काफी हद तक वैश्विक कारकों,विशेष रूप से तेल की कीमतों और भू-राजनीतिक स्थिति पर निर्भर करेगी।

फिलहाल स्थिति यह है कि डॉलर की माँग और तेल से जुड़ी महँगाई का खतरा रुपये पर दबाव बनाए हुए है। जब तक कच्चे तेल की कीमतों में उल्लेखनीय गिरावट नहीं आती,तब तक रुपये में स्थायी मजबूती की उम्मीद करना मुश्किल हो सकता है। इसके बावजूद, आरबीआई के हस्तक्षेप ने यह साफ कर दिया है कि वह बाजार में अस्थिरता को नियंत्रित करने के लिए पूरी तरह तैयार है।

रुपये की हालिया मजबूती एक सकारात्मक संकेत जरूर है,लेकिन इसके पीछे मौजूद चुनौतियाँ अभी भी बनी हुई हैं। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि वैश्विक परिस्थितियाँ किस दिशा में जाती हैं और आरबीआई अपने कदमों से बाजार को किस हद तक स्थिर बनाए रख पाता है।