वाशिंगटन,1 जनवरी (युआईटीवी)- अमेरिका में कानून-व्यवस्था और संघीय शक्तियों के मुद्दे पर चल रही बहस एक नए मोड़ पर पहुँच गई है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा की है कि उनकी सरकार शिकागो,लॉस एंजिल्स और पोर्टलैंड जैसे बड़े शहरों से नेशनल गार्ड को वापस बुला रही है। यह फैसला ऐसे समय में सामने आया है,जब कुछ ही दिन पहले अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप प्रशासन की उस योजना को रोक दिया था,जिसके तहत शिकागो में संघीय एजेंसियों की सुरक्षा के लिए नेशनल गार्ड की तैनाती बढ़ाने का प्रस्ताव था। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर पोस्ट कर कहा कि इन शहरों में गार्ड की मौजूदगी के कारण अपराध में गिरावट आई और यदि संघीय सरकार ने हस्तक्षेप नहीं किया होता,तो स्थिति पूरी तरह नियंत्रण से बाहर हो जाती।
ट्रंप का दावा है कि इन इलाकों में नेशनल गार्ड की तैनाती ने अपराध पर काबू पाने में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने चेतावनी भी दी कि यदि आने वाले दिनों में अपराध फिर से बढ़ता है,तो सरकार “और ज्यादा मजबूत तरीके” से वापसी करेगी। इस बयान के साथ ही उन्होंने संबंधित राज्यों के डेमोक्रेट मेयरों और गवर्नरों की आलोचना करते हुए उन्हें “अक्षम” करार दिया। राष्ट्रपति के इन आरोपों को लेकर डेमोक्रेट नेताओं ने तीखी प्रतिक्रिया दी है और कहा है कि कानून-व्यवस्था के नाम पर संघीय हस्तक्षेप की कोशिशों के पीछे राजनीतिक मंशा छिपी है।
सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश ने इस पूरे विवाद को और अधिक गहरा कर दिया है। अदालत ने 6-3 के बहुमत से ट्रंप प्रशासन के उस तर्क को खारिज कर दिया,जिसमें इलिनोइस में संघीय कानून लागू कराने के लिए सेना के उपयोग का औचित्य पेश किया गया था। कोर्ट ने अपने आदेश में लिखा कि इस शुरुआती चरण में सरकार यह स्पष्ट करने में असफल रही कि उसे इलिनोइस में सैन्य बलों को कानून लागू करने के लिए उपयोग करने का वैधानिक अधिकार कहाँ से प्राप्त होता है। अदालत के इस टिप्पणी ने संघीय शक्तियों की सीमाओं और राज्यों के अधिकारों पर फिर से बहस को जन्म दे दिया है।
इस विवाद की जड़ें अक्टूबर माह की शुरुआत में देखी जा सकती हैं। 4 अक्टूबर को राष्ट्रपति ट्रंप ने इलिनोइस नेशनल गार्ड के 300 सदस्यों को सक्रिय संघीय सेवा में बुलाने का फैसला लिया। यह कदम खासकर शिकागो और उसके आसपास के क्षेत्रों पर केंद्रित था,जहाँ अपराध और हिंसा के मामले लगातार सुर्खियों में रहे। अगले ही दिन टेक्सास नेशनल गार्ड के कुछ जवानों को भी संघीय नियंत्रण में लेते हुए शिकागो भेजा गया। इस कदम को ट्रंप प्रशासन ने कानून-व्यवस्था को मजबूत करने का उपाय बताया,जबकि राज्यों की सरकारों और कई नागरिक संगठनों ने इसे राज्यों के अधिकारों में हस्तक्षेप करार दिया।
9 अक्टूबर को इलिनोइस के उत्तरी जिला न्यायालय ने इस तैनाती पर अस्थायी रोक लगा दी। अदालत ने माना कि इस तरह की तैनाती के लिए स्पष्ट कानूनी आधार और ठोस परिस्थितियों का होना आवश्यक है। इसके बाद 16 अक्टूबर को सेवेंथ सर्किट की अपीलीय अदालत ने भी निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा। दिलचस्प बात यह रही कि अपीलीय अदालत ने संघीय सरकार को नेशनल गार्ड को नियंत्रण में लेने की अनुमति तो दी,लेकिन उन्हें तैनात करने की इजाजत नहीं दी। इस आंशिक रोक के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा,जहाँ सरकार को फिर झटका लगा और योजना पर अंतिम रूप से रोक कायम रही।
इस पृष्ठभूमि में ट्रंप की नवीनतम घोषणा राजनीतिक संकेत भी देती है। राष्ट्रपति का कहना है कि जिन राज्यों और शहरों में डेमोक्रेट्स की सरकार है,वहाँ अपराध नियंत्रण के प्रयास कमजोर हैं,इसलिए संघीय दखल जरूरी था। दूसरी ओर,डेमोक्रेट नेता इसे चुनावी साल की राजनीति से जोड़कर देख रहे हैं। उनका तर्क है कि संघीय हस्तक्षेप का आख्यान खड़ा कर ट्रंप अपने सख्त प्रशासक की छवि को मजबूत करना चाहते हैं,जबकि वास्तविकता में स्थानीय प्रशासन और समुदाय-आधारित पहलों के जरिए शांति स्थापित करने की कोशिशें जारी हैं।
नेशनल गार्ड की तैनाती पर विवाद नया नहीं है। अमेरिकी इतिहास में कई बार घरेलू अशांति,प्राकृतिक आपदाओं और आपात स्थितियों में सेना या नेशनल गार्ड की मदद ली गई है,लेकिन हर बार यह सवाल भी उठता रहा है कि कहीं यह सेना के राजनीतिक उपयोग की शुरुआत तो नहीं। मौजूदा मामले में अदालतों की लगातार सख्ती इस बात की ओर इशारा करती है कि न्यायपालिका संघीय शक्तियों के विस्तार पर सतर्क निगाह बनाए हुए है। खासकर तब,जब तैनाती का उद्देश्य स्पष्ट युद्धकालीन या आपदा-प्रबंधन से अलग होकर आंतरिक कानून-व्यवस्था की सामान्य चुनौतियों से जुड़ा हो।
ट्रंप के समर्थकों का मानना है कि बड़े शहरों में बढ़ते अपराध,गिरोहों की गतिविधियों और अवैध हथियारों के प्रसार को देखते हुए कड़े कदम उठाना समय की माँग है। उनका तर्क है कि नेशनल गार्ड की मौजूदगी से डर का माहौल बनता है और अपराधी सक्रिय नहीं हो पाते। जबकि आलोचकों का कहना है कि पुलिस सुधार, समुदाय के साथ संवाद,रोजगार के अवसर और सामाजिक कार्यक्रमों के बिना केवल सैन्य उपस्थिति से स्थायी समाधान नहीं निकल सकता।
यह मामला आगे चलकर अमेरिकी संघीय ढाँचे और सत्ता के संतुलन के दृष्टिकोण से एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह कानूनी सीमाओं पर जोर दिया,उससे भविष्य में भी ऐसे फैसलों पर न्यायिक जाँच की संभावना मजबूत हुई है। वहीं,ट्रंप के बयान से यह स्पष्ट है कि वे इस मुद्दे को चुनावी विमर्श का हिस्सा बनने देंगे और अपराध-नियंत्रण के एजेंडे को अपनी नीतियों का केंद्रीय बिंदु बनाए रखेंगे।
नेशनल गार्ड की वापसी के बाद अब नजर इस बात पर रहेगी कि इन शहरों में अपराध के आँकड़ें किस दिशा में जाते हैं और स्थानीय प्रशासन किस तरह की रणनीति अपनाता है। यदि अपराध में कमी कायम रहती है,तो डेमोक्रेट नेताओं के तर्क मजबूत होंगे कि स्थानीय समाधान अधिक कारगर हैं,लेकिन यदि हालात बिगड़ते हैं,तो ट्रंप को अपने “मजबूत वापसी” वाले तर्क को आगे बढ़ाने का मौका मिल सकता है।
फिलहाल इतना तय है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले और ट्रंप की घोषणा ने अमेरिकी राजनीति में कानून-व्यवस्था की बहस को फिर से केंद्र में ला खड़ा किया है। आने वाले महीनों में यह मुद्दा न केवल अदालतों में,बल्कि चुनावी मंचों और सार्वजनिक विमर्श में भी गूँजता रहेगा।
