पारामारिबो, 31 मार्च (युआईटीवी)- दक्षिण अमेरिका के देश सूरीनाम से एक दुखद खबर सामने आई है। सूरीनाम के पूर्व राष्ट्रपति चंद्रिकाप्रसाद संतोखी का 67 वर्ष की आयु में निधन हो गया। स्थानीय मीडिया के अनुसार उनका निधन सोमवार को अचानक हुआ,हालाँकि उनकी मृत्यु के कारणों का अब तक खुलासा नहीं किया गया है। मंगलवार (भारतीय समयानुसार) को इस खबर की पुष्टि सूरीनाम की वर्तमान राष्ट्रपति जेनिफर सिमंस ने की। संतोखी के निधन से न केवल सूरीनाम,बल्कि विश्वभर में बसे भारतीय मूल के समुदाय में भी शोक की लहर दौड़ गई है।
चंद्रिकाप्रसाद संतोखी ने वर्ष 2020 से 2025 तक सूरीनाम के राष्ट्रपति के रूप में अपनी सेवाएँ दीं। वे प्रोग्रेसिव रिफॉर्म पार्टी के प्रमुख नेता थे और इससे पहले देश के न्याय मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पदों पर भी रह चुके थे। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने देश के प्रशासनिक ढाँचे को मजबूत करने और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सूरीनाम की पहचान को नई ऊँचाई देने का प्रयास किया।
उनके निधन पर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गहरा शोक व्यक्त किया है। प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर एक भावुक संदेश साझा करते हुए कहा कि संतोखी न केवल उनके मित्र थे,बल्कि भारत और सूरीनाम के संबंधों को मजबूत करने वाले एक महत्वपूर्ण सेतु भी थे। उन्होंने कहा कि संतोखी का जाना दुनिया भर में फैले भारतीय समुदाय के लिए अपूरणीय क्षति है।
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संदेश में उनके साथ हुई मुलाकातों को याद करते हुए कहा कि संतोखी हमेशा भारत के साथ संबंधों को और प्रगाढ़ बनाने के लिए प्रतिबद्ध रहते थे। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि संतोखी को भारतीय संस्कृति और परंपराओं से विशेष लगाव था। यह लगाव उस समय भी देखने को मिला,जब उन्होंने राष्ट्रपति पद की शपथ संस्कृत भाषा में ली थी। यह एक ऐतिहासिक क्षण था,क्योंकि सूरीनाम के किसी भी राष्ट्रपति ने पहली बार संस्कृत में शपथ ग्रहण किया था।
Deeply shocked and saddened by the sudden demise of my friend and the former President of Suriname, Mr. Chandrikapersad Santokhi Ji. This is not only an irreparable loss to Suriname but also to the global Indian diaspora.
I fondly recall my many meetings with him. His tireless… pic.twitter.com/2Yy7sppwDy
— Narendra Modi (@narendramodi) March 31, 2026
चंद्रिकाप्रसाद संतोखी का जीवन संघर्ष और उपलब्धियों की प्रेरणादायक कहानी रहा है। उनका जन्म सूरीनाम के वानिका जिले के लेलीडॉर्प में एक इंडो-सूरीनाम हिंदू परिवार में हुआ था। वे नौ भाई-बहनों में सबसे छोटे थे। उनके परिवार की जड़ें भारत के बिहार राज्य से जुड़ी थीं। उनके दादा-दादी 19वीं सदी में बंधुआ मजदूर के रूप में सूरीनाम पहुँचे थे। यह वह दौर था,जब बड़ी संख्या में भारतीयों को काम के लिए कैरेबियन और दक्षिण अमेरिकी देशों में भेजा गया था।
उनके पिता पारामारिबो के बंदरगाह पर काम करते थे,जबकि उनकी माँ एक दुकान में सहायक थीं। साधारण परिवार में जन्म लेने के बावजूद संतोखी ने अपनी मेहनत और लगन के दम पर देश के सर्वोच्च पद तक का सफर तय किया। अपने करियर की शुरुआत उन्होंने कानून प्रवर्तन क्षेत्र से की,जहाँ उनकी सख्त और निष्पक्ष छवि के कारण उन्हें ‘शेरिफ’ के नाम से भी जाना जाता था।
राजनीति में आने के बाद उन्होंने सूरीनाम और भारत के बीच संबंधों को नई दिशा दी। व्यापार,ऊर्जा,संस्कृति और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच सहयोग को बढ़ाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। उनके प्रयासों से दोनों देशों के बीच न केवल आर्थिक संबंध मजबूत हुए,बल्कि सांस्कृतिक जुड़ाव भी और गहरा हुआ।
सूरीनाम की लगभग 27 प्रतिशत आबादी भारतीय मूल की है,जिनकी जड़ें 19वीं सदी में भारत से गए बंधुआ मजदूरों से जुड़ी हैं। ऐसे में संतोखी का भारतीय मूल का होना और भारत के प्रति उनका लगाव,दोनों देशों के बीच एक प्राकृतिक सेतु का काम करता था। उन्हें भारत सरकार द्वारा ‘प्रवासी भारतीय सम्मान’ से भी सम्मानित किया गया था,जो उनकी उपलब्धियों और योगदान का प्रमाण है।
संतोखी ने प्रवासी भारतीय दिवस जैसे महत्वपूर्ण आयोजनों में भी भाग लिया और भारतीय समुदाय के साथ अपने संबंधों को हमेशा बनाए रखा। उनके कार्यकाल में भारत और सूरीनाम के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान और सहयोग में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई।
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ में भी संतोखी का उल्लेख किया था और उनके भारतीय भाषाओं और संस्कृति के प्रति प्रेम को सराहा था। यह दर्शाता है कि संतोखी केवल एक राजनीतिक नेता ही नहीं,बल्कि सांस्कृतिक मूल्यों को समझने और उन्हें सम्मान देने वाले व्यक्तित्व भी थे।
उनके निधन से सूरीनाम ने एक दूरदर्शी नेता खो दिया है,जबकि भारत ने एक ऐसा मित्र खोया है,जिसने दोनों देशों के बीच रिश्तों को मजबूती देने में अहम भूमिका निभाई। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में याद किया जाएगा,जिन्होंने अपने देश के विकास के साथ-साथ वैश्विक सहयोग को भी प्राथमिकता दी।
इस कठिन समय में पूरी दुनिया उनकी सेवाओं और योगदान को याद कर रही है। चंद्रिकाप्रसाद संतोखी का जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बना रहेगा। उनका निधन एक युग के अंत के रूप में देखा जा रहा है,लेकिन उनके द्वारा स्थापित संबंध और मूल्य हमेशा जीवित रहेंगे।
