सुनील गावस्कर

‘द हंड्रेड’ नीलामी विवाद: सुनील गावस्कर ने पाकिस्तानी खिलाड़ी अबरार अहमद को साइन करने पर उठाए सवाल,भारतीय फ्रेंचाइजी को दी चेतावनी

नई दिल्ली,17 मार्च (युआईटीवी)- इंग्लैंड की टी20 प्रतियोगिता ‘द हंड्रेड’ की 2026 नीलामी के बाद एक नया विवाद खड़ा हो गया है। इस विवाद के केंद्र में पाकिस्तान के स्पिनर अबरार अहमद को सनराइजर्स लीड्स द्वारा खरीदा जाना है। भारतीय क्रिकेट के दिग्गज और पूर्व कप्तान सुनील गावस्कर ने इस फैसले की कड़ी आलोचना करते हुए इसे न केवल खेल के लिहाज से,बल्कि राष्ट्रीय दृष्टिकोण से भी गंभीर मुद्दा बताया है।

लंदन में आयोजित नीलामी के दौरान सनराइजर्स लीड्स ने अबरार अहमद को 1.90 लाख पाउंड (करीब 2.34 करोड़ रुपये) में अपनी टीम में शामिल किया। यह फ्रेंचाइजी सन ग्रुप के स्वामित्व में है,जिसका नेतृत्व उद्योगपति कलानिधि मारन करते हैं। नीलामी के दौरान उनकी बेटी काव्या मारन टीम का प्रतिनिधित्व कर रही थीं,जबकि हेड कोच के रूप में न्यूजीलैंड के पूर्व क्रिकेटर डेनियल विटोरी भी मौजूद थे। इस खरीद के बाद से भारत में इस फैसले को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएँ सामने आ रही हैं।

सुनील गावस्कर ने ‘मिड-डे’ में अपने कॉलम के जरिए इस मुद्दे पर विस्तार से अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि भारत और पाकिस्तान के बीच मौजूदा संवेदनशील राजनीतिक संबंधों को देखते हुए भारतीय फ्रेंचाइजी मालिकों को ऐसे फैसले लेने से बचना चाहिए। गावस्कर के अनुसार,यह सिर्फ एक खिलाड़ी को साइन करने का मामला नहीं है,बल्कि इसके पीछे व्यापक राष्ट्रीय और नैतिक सवाल जुड़े हुए हैं।

उन्होंने अपने लेख में कहा कि नवंबर 2008 में हुए मुंबई हमला 2008 के बाद भारतीय क्रिकेट और विशेष रूप से इंडियन प्रीमियर लीग में पाकिस्तानी खिलाड़ियों को शामिल नहीं किया गया। यह परंपरा अब तक जारी रही है और इसके पीछे सुरक्षा और राष्ट्रीय भावना जैसे महत्वपूर्ण कारण रहे हैं। ऐसे में किसी भारतीय स्वामित्व वाली फ्रेंचाइजी द्वारा विदेशी लीग में पाकिस्तानी खिलाड़ी को शामिल करना कई सवाल खड़े करता है।

गावस्कर ने यह भी कहा कि यह मुद्दा केवल क्रिकेट प्रतिभा तक सीमित नहीं है। उन्होंने आर्थिक पहलू को उठाते हुए कहा कि जब किसी खिलाड़ी को भुगतान किया जाता है,तो वह अपने देश में टैक्स के रूप में जाता है और वह पैसा किस तरह उपयोग होता है,यह भी एक महत्वपूर्ण चिंता का विषय है। उनके अनुसार, “जो फीस खिलाड़ी को दी जाती है,वह अंततः उसकी सरकार तक पहुँचती है और वह सरकार उस धन का उपयोग किस उद्देश्य के लिए करती है, यह भी विचारणीय है।”

उन्होंने आगे कहा कि भले ही यह बात अब समझ में आ रही हो,लेकिन यह एक गंभीर नैतिक दुविधा है। उनके मुताबिक,अगर भारतीय स्वामित्व वाली संस्था किसी ऐसे खिलाड़ी को भुगतान करती है,तो अप्रत्यक्ष रूप से वह उस देश की आर्थिक व्यवस्था को मजबूत करती है, जिससे भारत के साथ उसके संबंध तनावपूर्ण हैं। गावस्कर ने इसे “सीधी और सरल” स्थिति बताते हुए कहा कि ऐसे मामलों में निर्णय लेते समय राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखना चाहिए।

सुनील गावस्कर ने यह भी स्वीकार किया कि टीम मैनेजमेंट अक्सर खिलाड़ियों का चयन पूरी तरह क्रिकेट के नजरिए से करता है। उन्होंने कहा कि कोच डेनियल विटोरी जैसे विदेशी विशेषज्ञ इस मुद्दे की संवेदनशीलता को शायद पूरी तरह न समझ पाएँ। लेकिन उन्होंने यह स्पष्ट किया कि फ्रेंचाइजी के मालिकों को इस तरह के फैसलों के व्यापक प्रभावों को समझना चाहिए और उसी के अनुसार निर्णय लेना चाहिए।

उन्होंने अपने लेख में एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया कि क्या किसी टूर्नामेंट को जीतना,खासकर ऐसा फॉर्मेट जिसे दुनिया के बहुत कम देश खेलते हैं,राष्ट्रीय चिंताओं से ज्यादा अहम हो सकता है। उन्होंने कहा कि खेल की सफलता महत्वपूर्ण है,लेकिन उसे देश की सुरक्षा और भावनाओं से ऊपर नहीं रखा जा सकता।

इस विवाद के बाद भारत में सनराइजर्स लीड्स और उससे जुड़े लोगों के खिलाफ सोशल मीडिया पर भी तीखी प्रतिक्रियाएँ देखने को मिली हैं। कई प्रशंसकों ने इस फैसले की आलोचना करते हुए इसे गलत बताया है। कुछ ने तो यहाँ तक कहा कि इसका असर आने वाले आईपीएल 2026 में भी देखने को मिल सकता है।

सुनील गावस्कर ने भी इस संभावना की ओर इशारा करते हुए चेतावनी दी कि प्रशंसक इस फैसले का विरोध कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि यह संभव है कि टीम के मैचों के दौरान विरोध प्रदर्शन हो या दर्शक बहिष्कार करें। उनके अनुसार, “इसमें कोई हैरानी की बात नहीं होगी कि जहाँ भी यह टीम खेलेगी, वहाँ भारतीय प्रशंसकों की ओर से कड़ा विरोध देखने को मिलेगा।”

इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर खेल और राजनीति के बीच के जटिल संबंधों को उजागर कर दिया है। जहाँ एक ओर खेल को सीमाओं से परे मानने की बात की जाती है,वहीं दूसरी ओर वास्तविकता यह है कि अंतर्राष्ट्रीय संबंधों और राजनीतिक परिस्थितियों का प्रभाव खेल जगत पर भी पड़ता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के विवाद भविष्य में और बढ़ सकते हैं,खासकर तब जब विभिन्न देशों के बीच राजनीतिक तनाव बना हुआ हो। ऐसे में फ्रेंचाइजी मालिकों और खेल प्रशासकों के सामने यह चुनौती होगी कि वे खेल के व्यावसायिक और प्रतिस्पर्धात्मक पहलुओं के साथ-साथ सामाजिक और राजनीतिक संवेदनशीलताओं का भी संतुलन बनाए रखें।

फिलहाल,‘द हंड्रेड’ की नीलामी में हुआ यह फैसला चर्चा और विवाद का विषय बना हुआ है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि सनराइजर्स लीड्स इस मुद्दे पर कोई प्रतिक्रिया देती है या नहीं और क्या इस विवाद का असर मैदान के भीतर और बाहर दोनों जगह देखने को मिलेगा।

कुल मिलाकर,यह मामला केवल एक खिलाड़ी की खरीद तक सीमित नहीं रह गया है,बल्कि यह राष्ट्रीय भावना,नैतिकता और खेल की भूमिका जैसे बड़े मुद्दों को सामने लेकर आया है। ऐसे में यह बहस आने वाले समय में और गहराने की संभावना है,जो खेल जगत के साथ-साथ व्यापक समाज को भी प्रभावित कर सकती है।