वाशिंगटन,27 मार्च (युआईटीवी)- पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और वैश्विक भू-राजनीतिक उथल-पुथल के बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर उत्तर अटलांटिक संधि संगठन यानी नाटो पर तीखा हमला बोला है। ट्रंप ने नाटो सदस्य देशों को सीधे-सीधे चेतावनी देते हुए कहा कि वे मौजूदा हालात में उनके रुख को “कभी न भूलें।” उनके इस बयान ने ट्रांस-अटलांटिक संबंधों में नई दरार की आशंका पैदा कर दी है।
ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर एक पोस्ट में नाटो देशों पर नाराजगी जताते हुए कहा कि जब अमेरिका ईरान जैसे “अस्थिर” देश के खिलाफ कार्रवाई कर रहा है,तब उसके सहयोगी देश कोई मदद नहीं कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि अमेरिका को नाटो से किसी प्रकार की सहायता की आवश्यकता नहीं है,लेकिन सहयोगियों का यह रवैया भविष्य के लिए याद रखा जाएगा।
अपने बयान में ट्रंप ने नाटो को “कागजी शेर” तक कह दिया और सदस्य देशों को “कायर” बताते हुए आरोप लगाया कि वे केवल तेल की कीमतों पर चिंता जताते हैं,लेकिन वास्तविक संकट के समय कोई ठोस कदम उठाने से बचते हैं। उनका कहना था कि अमेरिका के बिना नाटो का कोई अस्तित्व नहीं है और यह गठबंधन पूरी तरह से वाशिंगटन की ताकत पर निर्भर करता है।
यह पहली बार नहीं है,जब ट्रंप ने नाटो पर सवाल उठाए हैं। इससे पहले भी उन्होंने 20 मार्च को इसी तरह का बयान दिया था,जिसमें उन्होंने ईरान-इजरायल तनाव के दौरान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को सुरक्षित करने में नाटो देशों की निष्क्रियता पर नाराजगी जाहिर की थी। ट्रंप का कहना था कि यह एक सामान्य सैन्य ऑपरेशन है,जिसे आसानी से अंजाम दिया जा सकता है,लेकिन इसके बावजूद नाटो देश इसमें सहयोग करने से बच रहे हैं।
दरअसल, होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है,जहाँ से वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। इस जलडमरूमध्य में किसी भी तरह की अस्थिरता का सीधा असर अंतर्राष्ट्रीय तेल कीमतों पर पड़ता है। ट्रंप का आरोप है कि नाटो देशों की निष्क्रियता के कारण ही तेल की कीमतें बढ़ रही हैं और वैश्विक बाजार प्रभावित हो रहा है।
ट्रंप ने यह भी दावा किया कि ईरान के खिलाफ सैन्य संघर्ष में अमेरिका पहले ही जीत हासिल कर चुका है और अब उसे किसी अन्य देश की मदद की जरूरत नहीं है। हालाँकि,उन्होंने यह भी जोड़ा कि सहयोगियों का यह रवैया अमेरिका के लिए निराशाजनक है और भविष्य में इसके परिणाम देखने को मिल सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप के इस तरह के बयान न केवल नाटो के भीतर असंतोष को बढ़ा सकते हैं,बल्कि वैश्विक स्तर पर अमेरिका की कूटनीतिक स्थिति को भी प्रभावित कर सकते हैं। नाटो एक ऐसा सैन्य गठबंधन है,जो सामूहिक सुरक्षा के सिद्धांत पर आधारित है और इसमें किसी एक सदस्य पर हमला पूरे गठबंधन पर हमला माना जाता है। ऐसे में अमेरिका के राष्ट्रपति द्वारा अपने ही सहयोगियों की आलोचना करना एक गंभीर कूटनीतिक संकेत माना जा रहा है।
वहीं,यूरोपीय देशों की ओर से अभी तक ट्रंप के इस बयान पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है,लेकिन माना जा रहा है कि इस मुद्दे पर अंदरूनी स्तर पर चर्चा जरूर हो रही होगी। कई विश्लेषकों का कहना है कि यूरोपीय देश ईरान के साथ सीधे टकराव से बचना चाहते हैं और कूटनीतिक समाधान को प्राथमिकता दे रहे हैं,जबकि अमेरिका का रुख अधिक आक्रामक है।
पश्चिम एशिया में जारी तनाव, विशेष रूप से ईरान और इजरायल के बीच टकराव,ने पहले ही वैश्विक सुरक्षा को चुनौती दी हुई है। ऐसे में अमेरिका और उसके सहयोगियों के बीच मतभेद स्थिति को और जटिल बना सकते हैं। ट्रंप के बयान से यह साफ है कि अमेरिका अपने हितों को प्राथमिकता देते हुए किसी भी हद तक जाने को तैयार है,भले ही इससे उसके पारंपरिक सहयोगियों के साथ संबंध प्रभावित हों।
ट्रंप का यह बयान न केवल नाटो के भीतर बढ़ती खाई को उजागर करता है,बल्कि यह भी संकेत देता है कि आने वाले समय में वैश्विक राजनीति और अधिक अस्थिर हो सकती है। अब यह देखना अहम होगा कि क्या अमेरिका और उसके सहयोगी देश इस मतभेद को सुलझाने के लिए कोई साझा रास्ता निकाल पाते हैं या फिर यह विवाद और गहराता जाएगा।
