एच-2बी वीजा

ट्रंप सरकार का नया आदेश: डायबिटीज,कैंसर और मानसिक बीमारियों से पीड़ित लोगों को अमेरिकी वीजा मिलने में हो सकती है मुश्किल

नई दिल्ली,8 नवंबर (युआईटीवी)- अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सरकार ने वीजा नीति में बड़े बदलाव की घोषणा की है,जिसके बाद डायबिटीज,कैंसर,हृदय रोग,मोटापा और मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे लोगों के लिए अमेरिकी वीजा प्राप्त करना अब और कठिन हो सकता है। गुरुवार को जारी इस नए निर्देश ने दुनियाभर के लाखों वीजा आवेदकों,खासकर भारत जैसे देशों के नागरिकों में चिंता बढ़ा दी है।

ट्रंप प्रशासन ने अपने ताजा आदेश में स्पष्ट किया है कि अमेरिकी वीजा के लिए आवेदन करने वाले विदेशी नागरिकों की स्वास्थ्य स्थिति अब वीजा पात्रता के निर्धारण में एक अहम भूमिका निभाएगी। इस नीति के अनुसार,जिन व्यक्तियों को गंभीर बीमारियाँ हैं — जैसे हृदय रोग,श्वसन संबंधी दिक्कतें,कैंसर,डायबिटीज,मोटापा, न्यूरोलॉजिकल और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएँ — उन्हें वीजा जारी करने से मना किया जा सकता है।

अमेरिकी मीडिया संगठन केएफएफ हेल्थ न्यूज के अनुसार,संबंधित विभाग का मानना है कि इन बीमारियों से ग्रस्त विदेशी नागरिक अमेरिका में आने के बाद वहाँ की स्वास्थ्य सेवाओं और संसाधनों पर अत्यधिक बोझ डाल सकते हैं। उनका कहना है कि ऐसी बीमारियों के इलाज पर लाखों डॉलर तक का खर्च आता है,जो देश के मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर और सामाजिक कल्याण योजनाओं पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। इसी कारण अमेरिकी विदेश विभाग ने दूतावासों और वाणिज्य दूतावासों को निर्देश दिया है कि वे वीजा जारी करते समय आवेदकों की स्वास्थ्य स्थिति का गंभीरता से मूल्यांकन करें।

अमेरिकी मीडिया रिपोर्टों के अनुसार,यह नया दिशा-निर्देश दोनों प्रमुख अमेरिकी दूतावासों को ‘केबल’ के माध्यम से भेजा गया है। इसमें कहा गया है कि अधिकारियों को आवेदक की शारीरिक स्थिति,बीमारी की प्रकृति और उसकी गंभीरता को देखते हुए यह निर्णय लेना होगा कि वह व्यक्ति अमेरिकी स्वास्थ्य तंत्र पर संभावित रूप से कितना बोझ डाल सकता है। इसके साथ ही यह भी मूल्यांकन किया जाएगा कि क्या आवेदक या उसका परिवार अपने इलाज का खर्च स्वयं उठा सकता है या नहीं।

अब तक वीजा आवेदन प्रक्रिया में स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारी पहले से ही माँगी जाती थी,लेकिन यह केवल सामान्य जाँच तक सीमित रहती थी। अब,नए नियम के तहत चिकित्सा स्थिति का विस्तृत मूल्यांकन अनिवार्य कर दिया गया है। विशेष रूप से उन बीमारियों पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा,जिनके इलाज में लंबे समय तक खर्च और देखभाल की जरूरत होती है।

ट्रंप प्रशासन का यह कदम कई मानवाधिकार संगठनों और कानूनी विशेषज्ञों के निशाने पर आ गया है। उनका कहना है कि यह नीति भेदभावपूर्ण है और गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे लोगों के अधिकारों का हनन करती है। गैर-लाभकारी कानूनी सहायता संगठन कैथोलिक लीगल इमिग्रेशन नेटवर्क के वरिष्ठ वकील चार्ल्स व्हीलर ने इस निर्देश को “चिंताजनक और अनुचित” बताया है। उन्होंने कहा, “ये दिशानिर्देश सभी प्रकार के वीजा के लिए लागू हैं,लेकिन इनका इस्तेमाल स्थायी निवास यानी ग्रीन कार्ड के मामलों में अधिक किया जाएगा। सबसे बड़ी समस्या यह है कि वीजा अधिकारी मेडिकल पेशेवर नहीं हैं। उन्हें किसी आवेदक की चिकित्सा स्थिति का सटीक मूल्यांकन करने का प्रशिक्षण नहीं दिया गया है और वे अपने सीमित ज्ञान के आधार पर किसी के भविष्य का फैसला नहीं कर सकते।”

व्हीलर का कहना है कि यह नीति कई स्तरों पर कानूनी विवाद को जन्म दे सकती है। उन्होंने चेतावनी दी कि इस तरह के निर्णय से मानवता के सिद्धांतों को ठेस पहुँच सकती है,क्योंकि यह उन लोगों के लिए एक और बाधा खड़ी करता है,जो पहले से ही अपनी सेहत को लेकर संघर्ष कर रहे हैं।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इस नीति का असर न केवल बीमार व्यक्तियों पर पड़ेगा,बल्कि उनके परिवारों और समुदायों पर भी होगा। यदि किसी व्यक्ति के परिवार के किसी सदस्य को गंभीर बीमारी है,तो यह भी वीजा प्रक्रिया में नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। यानी,अब वीजा अधिकारी न केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य,बल्कि पूरे परिवार की चिकित्सा स्थिति पर भी नजर रखेंगे।

अमेरिका की नई वीजा नीति को लेकर यह भी कहा जा रहा है कि यह ट्रंप सरकार की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति का ही हिस्सा है,जो विदेशी नागरिकों पर घरेलू संसाधनों के इस्तेमाल को सीमित करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। ट्रंप प्रशासन पहले भी स्वास्थ्य बीमा,सोशल सिक्योरिटी और सार्वजनिक सहायता कार्यक्रमों के दुरुपयोग को रोकने के लिए सख्त नीतियाँ लागू कर चुका है।

हालाँकि,इस नीति का बचाव करते हुए कुछ अमेरिकी अधिकारियों ने कहा है कि इसका उद्देश्य भेदभाव करना नहीं,बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी आवेदक अमेरिका आने के बाद सरकार पर निर्भर न हो। एक अधिकारी ने कहा, “हमारा मकसद यह है कि जो लोग अमेरिका आएँ,वे आत्मनिर्भर हों और अपने स्वास्थ्य का जिम्मा खुद उठा सकें।”

फिर भी,इस नीति की आलोचना इस आधार पर हो रही है कि यह स्वास्थ्य असमानता को बढ़ा सकती है और खासकर विकासशील देशों के नागरिकों के लिए अमेरिका में अवसरों के द्वार संकुचित कर सकती है। भारत जैसे देशों में जहाँ डायबिटीज और हृदय रोग के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है,वहाँ इस निर्णय का असर हजारों संभावित वीजा आवेदकों पर पड़ सकता है।

ट्रंप प्रशासन की नई वीजा नीति ऐसे समय में आई है,जब वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य को लेकर सहयोग की जरूरत पहले से कहीं अधिक है। विशेषज्ञों का कहना है कि महामारी के बाद दुनिया को अधिक संवेदनशील और समावेशी नीतियों की आवश्यकता है,लेकिन अमेरिका का यह कदम उस दिशा में उलट प्रतीत होता है।

अब यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में इस नीति पर अमेरिका के भीतर और बाहर कैसी प्रतिक्रिया होती है। फिलहाल इतना तय है कि इस नए आदेश ने वीजा आवेदन प्रक्रिया को और जटिल बना दिया है और डायबिटीज,कैंसर,मोटापा या मानसिक स्वास्थ्य जैसी बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिए अमेरिका का रास्ता पहले से कहीं अधिक कठिन हो गया है।