राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप

ट्रंप के ‘बोर्ड ऑफ पीस’ को झटका, इटली और पोलैंड ने भी बनाई दूरी

नई दिल्ली,12 फरवरी (युआईटीवी)- अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की पहल पर प्रस्तावित ‘बोर्ड ऑफ पीस’ को एक और बड़ा कूटनीतिक झटका लगा है। इटली और पोलैंड ने इस बहुप्रचारित अंतर्राष्ट्रीय मंच में शामिल होने से इनकार कर दिया है। वारसॉ और रोम दोनों ने बुधवार को अपने-अपने रुख को सार्वजनिक करते हुए साफ कर दिया कि वे मौजूदा स्वरूप में इस बोर्ड का हिस्सा नहीं बनेंगे। इससे पहले भी कई यूरोपीय देशों ने इस प्रस्ताव से दूरी बनाई थी,जिससे ट्रंप की इस महत्वाकांक्षी पहल पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

समाचार एजेंसी रॉयटर्स और अन्य अंतर्राष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार,पोलैंड के प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क ने एक सरकारी बैठक के दौरान स्पष्ट किया कि उनका देश वर्तमान परिस्थितियों में अमेरिका के नेतृत्व वाले ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में शामिल नहीं होगा। टस्क ने कहा कि “मौजूदा हालात” और बोर्ड के आकार व संरचना को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर उठी शंकाओं को ध्यान में रखते हुए पोलैंड इस पहल से दूर रहेगा। हालाँकि,उन्होंने यह भी जोड़ा कि पोलैंड इस प्रस्ताव का विश्लेषण जारी रखेगा और भविष्य की परिस्थितियों के आधार पर निर्णय की समीक्षा की जा सकती है।

बताया जा रहा है कि टस्क ने यह बयान नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल की बैठक से पहले दिया,जहाँ उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी करोल नॉवरोकी के साथ इस मुद्दे पर चर्चा होनी थी। बोर्ड ऑफ पीस इस बैठक के एजेंडे में प्रमुख विषयों में शामिल था। पोलैंड का यह रुख ऐसे समय सामने आया है,जब यूरोप में सुरक्षा और भू-राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। यूक्रेन युद्ध,नाटो की भूमिका और यूरोपीय संघ की सामूहिक सुरक्षा नीति जैसे मुद्दों के बीच पोलैंड किसी ऐसे मंच से जुड़ने में सतर्कता बरत रहा है,जिसकी संरचना और अधिकार-सीमा स्पष्ट नहीं है।

इटली ने भी लगभग इसी तरह का रुख अपनाया है,लेकिन उसके तर्क संवैधानिक आधार पर टिके हुए हैं। इटली के विदेश मंत्री एंटोनियो तजानी ने स्काई टीजी24 न्यूज चैनल से बातचीत में कहा कि इटली ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में शामिल नहीं हो सकता क्योंकि यह देश के संविधान के अनुरूप नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इटली का संविधान केवल उन अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं में शामिल होने की अनुमति देता है,जहाँ सदस्य देशों के बीच समान शर्तें लागू हों। तजानी के अनुसार,बोर्ड के मौजूदा नियम और संरचना इस मानक पर खरे नहीं उतरते।

रोम का मानना है कि प्रस्तावित बोर्ड की संरचना ट्रंप को अत्यधिक कार्यकारी शक्तियाँ प्रदान करती है,जो एक संतुलित बहुपक्षीय ढाँचे की भावना के विपरीत है। इटली की प्रधानमंत्री जियोर्जिया मेलोनी ने पिछले महीने संकेत दिया था कि उन्होंने राष्ट्रपति ट्रंप से बोर्ड की शर्तों में बदलाव करने का आग्रह किया है,ताकि इटली के लिए इसमें शामिल होना संवैधानिक रूप से संभव हो सके। हालाँकि,अब तक इन शर्तों में कोई ठोस संशोधन सामने नहीं आया है,जिसके चलते इटली ने फिलहाल दूरी बनाए रखने का फैसला किया है।

डोनाल्ड ट्रंप की अध्यक्षता वाला ‘बोर्ड ऑफ पीस’ प्रारंभ में एक सीमित उद्देश्य के लिए प्रस्तावित किया गया था। इसे विश्व नेताओं के एक छोटे समूह के रूप में तैयार किया गया था,जिसका मुख्य मकसद गाजा में संभावित युद्धविराम योजना की निगरानी करना था। उस समय इसे एक अस्थायी और विशिष्ट उद्देश्य वाला मंच बताया गया था,लेकिन बाद में ट्रंप प्रशासन ने इसके दायरे को काफी व्यापक बनाने के संकेत दिए। कई दर्जन देशों को इसमें शामिल होने का निमंत्रण भेजा गया और यह संकेत भी दिया गया कि भविष्य में यह बोर्ड केवल गाजा तक सीमित न रहकर वैश्विक संघर्षों में मध्यस्थता की भूमिका निभा सकता है।

इसी विस्तारवादी दृष्टिकोण ने कई यूरोपीय देशों को सतर्क कर दिया है। फ्रांस,नॉर्वे,स्वीडन और यूनाइटेड किंगडम पहले ही इस बोर्ड में शामिल होने से इनकार कर चुके हैं। इन देशों का मानना है कि अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर संयुक्त राष्ट्र और अन्य स्थापित बहुपक्षीय संस्थाओं की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ऐसे में एक नए मंच का गठन,जिसमें शक्ति संतुलन स्पष्ट न हो,कूटनीतिक जटिलताओं को जन्म दे सकता है।

दूसरी ओर,पाकिस्तान,मिस्र और तुर्की जैसे देशों ने इस बोर्ड के निमंत्रण को स्वीकार कर लिया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि ट्रंप की पहल को कुछ क्षेत्रों में समर्थन मिल रहा है,विशेष रूप से उन देशों से जो मध्य पूर्व और इस्लामी दुनिया की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाते हैं। हालाँकि,यूरोप के प्रमुख लोकतांत्रिक देशों की दूरी इस पहल की वैश्विक वैधता और स्वीकार्यता पर प्रश्नचिह्न लगा रही है।

विश्लेषकों का मानना है कि ‘बोर्ड ऑफ पीस’ को लेकर उभरे मतभेद अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति में शक्ति-संतुलन की बहस को और गहरा करेंगे। यदि यह मंच ट्रंप के नेतृत्व में अत्यधिक केंद्रीकृत संरचना अपनाता है,तो यूरोपीय संघ जैसे क्षेत्रीय समूहों के लिए इसमें शामिल होना राजनीतिक और संवैधानिक रूप से कठिन हो सकता है। वहीं,यदि इसमें व्यापक सुधार और संतुलन लाया जाता है,तो भविष्य में कुछ देश अपने रुख पर पुनर्विचार कर सकते हैं।

फिलहाल इटली और पोलैंड के फैसले ने यह संकेत दे दिया है कि ट्रंप की इस नई वैश्विक पहल को सर्वसम्मति मिलना आसान नहीं होगा। आने वाले हफ्तों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या अमेरिका इस बोर्ड की संरचना में बदलाव कर अधिक देशों को साथ लाने की कोशिश करता है या फिर यह पहल सीमित समर्थन के साथ आगे बढ़ती है।