वाशिंगटन,10 जनवरी (युआईटीवी)- अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर ग्रीनलैंड को लेकर सख्त और विवादास्पद बयान देकर अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में हलचल पैदा कर दी है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि यदि जरूरत पड़ी तो अमेरिका ग्रीनलैंड को “सुरक्षित करने” के लिए कदम उठाएगा। ट्रंप का यह बयान न सिर्फ डेनमार्क और ग्रीनलैंड के लिए चिंता का विषय बना है,बल्कि चीन और रूस के साथ बढ़ती वैश्विक प्रतिस्पर्धा के संदर्भ में भी इसे बेहद अहम माना जा रहा है।
रिपोर्टरों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा कि ग्रीनलैंड की भौगोलिक स्थिति अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि अमेरिका ने समय रहते निर्णायक कार्रवाई नहीं की,तो चीन या रूस वहाँ अपनी मजबूत मौजूदगी स्थापित कर सकते हैं,जो सीधे तौर पर अमेरिकी सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा साबित होगी। ट्रंप ने मौजूदा सैन्य समझौतों को अपर्याप्त बताते हुए कहा कि मौजूदा व्यवस्थाएँ अमेरिका को पूरी तरह सुरक्षित महसूस कराने के लिए काफी नहीं हैं।
ट्रंप ने कहा, “हम ग्रीनलैंड पर कुछ करने जा रहे हैं। उन्हें यह पसंद हो या न हो। अमेरिका पहले बातचीत के जरिए समाधान चाहता है,लेकिन अगर बात नहीं बनी,तो दूसरे विकल्प भी खुले हैं।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि वे किसी भी स्थिति में अमेरिकी सुरक्षा से समझौता नहीं करेंगे। ट्रंप के इस बयान को कई विश्लेषक एक कड़े संदेश के रूप में देख रहे हैं,जिसमें उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से बल प्रयोग या दबाव की संभावना को भी खारिज नहीं किया।
अपने तर्क को और मजबूत करते हुए ट्रंप ने कहा कि किसी भी रणनीतिक स्थान की सही सुरक्षा तभी संभव है,जब उस पर पूर्ण स्वामित्व हो। उन्होंने कहा, “जब हम किसी जगह के मालिक होते हैं,तभी हम उसकी सही तरीके से रक्षा करते हैं। लीज पर ली गई जगह की सुरक्षा वैसी नहीं होती। मालिक होना जरूरी है।” ट्रंप के इस बयान ने एक बार फिर उस पुराने विवाद को ताजा कर दिया है,जब उन्होंने अपने पहले कार्यकाल के दौरान भी ग्रीनलैंड को खरीदने की इच्छा जताई थी,जिसे डेनमार्क ने सिरे से खारिज कर दिया था।
रूस और चीन का जिक्र करते हुए ट्रंप ने दावा किया कि ग्रीनलैंड के आसपास पहले से ही दोनों देशों की सैन्य गतिविधियाँ देखी जा रही हैं। उन्होंने कहा, “अगर आप अभी ग्रीनलैंड के आसपास देखें,तो वहाँ रूसी युद्धपोत हैं,चीनी युद्धपोत हैं और रूसी पनडुब्बियाँ हर जगह हैं।” ट्रंप ने साफ शब्दों में कहा कि अमेरिका किसी भी सूरत में रूस या चीन को ग्रीनलैंड में “पड़ोसी” बनने की इजाजत नहीं देगा। उनके मुताबिक,यह सिर्फ एक क्षेत्रीय मुद्दा नहीं है,बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन से जुड़ा हुआ सवाल है।
डेनमार्क के दावे पर सवाल उठाते हुए ट्रंप ने ऐतिहासिक तर्कों को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि सैकड़ों साल पहले किसी इलाके में पहुँच जाना आज के समय में मालिकाना हक साबित नहीं करता। ट्रंप के शब्दों में, “500 साल पहले वहाँ एक नाव उतर गई थी,इसका मतलब यह नहीं कि आज भी वही मालिक हैं।” इस बयान को डेनमार्क की संप्रभुता पर सीधी टिप्पणी के तौर पर देखा जा रहा है,जिससे दोनों देशों के रिश्तों में तनाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
हालाँकि,ट्रंप ने यह भी कहा कि वे डेनमार्क का सम्मान करते हैं और उसे अमेरिका का सहयोगी मानते हैं। उन्होंने यह स्पष्ट करने की कोशिश की कि उनका विरोध डेनमार्क से नहीं,बल्कि अमेरिका की सुरक्षा जरूरतों से जुड़ा हुआ है। ट्रंप ने कहा कि अमेरिकी हित उनके लिए सबसे ऊपर हैं और इन हितों की रक्षा के लिए वे किसी भी हद तक जा सकते हैं।
इस मुद्दे को ट्रंप ने नाटो से भी जोड़ते हुए कहा कि नाटो की मजबूती अमेरिका की वजह से ही संभव हुई है। उन्होंने दावा किया, “मैंने नाटो को बचाया। अगर मैं नहीं होता,तो आज नाटो नहीं होता।” ट्रंप का यह बयान भी विवादों में रहा है,क्योंकि नाटो के कई सदस्य देश पहले भी उनके इस दावे पर सवाल उठा चुके हैं। फिर भी,ट्रंप का कहना है कि अमेरिका नाटो का सबसे बड़ा योगदानकर्ता है और सुरक्षा से जुड़े मामलों में उसकी भूमिका निर्णायक है।
चीन और रूस को लेकर ट्रंप ने अपने बयान में संतुलन दिखाने की कोशिश भी की। उन्होंने कहा, “मुझे चीन पसंद है,मुझे रूस पसंद है,लेकिन मैं उन्हें ग्रीनलैंड में पड़ोसी के रूप में नहीं चाहता।” इस कथन से साफ है कि ट्रंप व्यक्तिगत या कूटनीतिक रिश्तों से अलग हटकर रणनीतिक हितों को प्राथमिकता देने की बात कर रहे हैं।
ग्रीनलैंड,जो डेनमार्क का एक स्वायत्त क्षेत्र है,हाल के वर्षों में वैश्विक शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा का केंद्र बनता जा रहा है। जलवायु परिवर्तन के कारण आर्कटिक क्षेत्र में बर्फ तेजी से पिघल रही है,जिससे जहाजों के लिए नए समुद्री मार्ग खुल रहे हैं। इससे न केवल व्यापार आसान हुआ है,बल्कि सैन्य आवाजाही भी पहले की तुलना में कहीं ज्यादा सरल हो गई है। यही वजह है कि अमेरिका,रूस और चीन जैसे बड़े देश इस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप का यह बयान सिर्फ एक राजनीतिक बयान नहीं है,बल्कि यह आने वाले समय में आर्कटिक क्षेत्र को लेकर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का संकेत भी देता है। ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका का आक्रामक रुख यह दिखाता है कि वैश्विक शक्ति संतुलन तेजी से बदल रहा है और आने वाले वर्षों में यह इलाका अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का एक बड़ा केंद्र बन सकता है।
