दावोस,22 जनवरी (युआईटीवी)- अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर ग्रीनलैंड को लेकर दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। बहुप्रतीक्षित इस विषय पर बोलते हुए ट्रंप ने न सिर्फ आक्रामक रुख अपनाया,बल्कि डेनमार्क और नाटो सहयोगियों को सुरक्षा की जिम्मेदारियों पर भी कठघरे में खड़ा कर दिया। अपने बयान में उन्होंने स्पष्ट किया कि वह अपने भाषण में ग्रीनलैंड का जिक्र नहीं करना चाहते थे,लेकिन उन्हें लगा कि अगर इस मुद्दे पर बात नहीं की गई,तो उसे गलत तरीके से समझा जाएगा। इसी सोच के साथ उन्होंने ग्रीनलैंड,डेनमार्क और वैश्विक सुरक्षा को लेकर अपनी बेबाक राय सामने रखी।
ट्रंप ने शुरुआत में यह कहते हुए संतुलन बनाने की कोशिश की कि उनके मन में ग्रीनलैंड और डेनमार्क के लोगों के लिए बहुत सम्मान है।हालाँकि,इसके तुरंत बाद उन्होंने अपने चिर-परिचित अंदाज में यह भी जोड़ दिया कि नाटो के हर सहयोगी देश की जिम्मेदारी है कि वह अपने इलाके की रक्षा खुद करने में सक्षम हो। ट्रंप के अनुसार,सच्चाई यह है कि अमेरिका के अलावा कोई भी देश या देशों का समूह ग्रीनलैंड की प्रभावी सुरक्षा नहीं कर सकता। उन्होंने यह तर्क देकर साफ कर दिया कि ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका की दिलचस्पी केवल कूटनीतिक नहीं,बल्कि रणनीतिक और सुरक्षा से जुड़ी हुई है।
अपने बयान को मजबूती देने के लिए ट्रंप ने इतिहास का भी सहारा लिया। उन्होंने दूसरे विश्व युद्ध का जिक्र करते हुए कहा कि उस दौर में जर्मनी ने डेनमार्क पर कब्जा कर लिया था और तब ग्रीनलैंड की रक्षा की जिम्मेदारी अमेरिका को उठानी पड़ी थी। ट्रंप के मुताबिक,युद्ध समाप्त होने के बाद अमेरिका ने ग्रीनलैंड को वापस कर दिया,जिसे वह आज एक बड़ी गलती मानते हैं। उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि अमेरिका ने उस समय डेनमार्क पर एहसान किया था,लेकिन बदले में उसे अपेक्षित सम्मान नहीं मिला। ट्रंप ने तीखे शब्दों में कहा कि अगर दूसरे विश्व युद्ध में अमेरिका ने हस्तक्षेप नहीं किया होता,तो आज दुनिया के कई हिस्सों में लोग जर्मन और कुछ हद तक जापानी भाषा बोल रहे होते।
ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप की सोच केवल अतीत तक सीमित नहीं है। उन्होंने इसे अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बेहद अहम क्षेत्र बताया। ट्रंप ने यह स्पष्ट करने की कोशिश की कि ग्रीनलैंड को अमेरिका में शामिल करने की उनकी इच्छा वहाँ मौजूद दुर्लभ खनिजों की वजह से नहीं है,बल्कि इसकी असली वजह सुरक्षा है। उन्होंने कहा कि अमेरिका ग्रीनलैंड को अपने साथ जोड़ने को लेकर तुरंत बातचीत शुरू करना चाहता है,क्योंकि मौजूदा वैश्विक हालात में इस क्षेत्र की अनदेखी करना खतरनाक साबित हो सकता है।
अपने बयान में ट्रंप ने ग्रीनलैंड की भौगोलिक और रणनीतिक स्थिति पर विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि ग्रीनलैंड की रणनीतिक अहमियत बेहद ज्यादा है। यह इलाका बहुत बड़ा है,लगभग खाली है और वहाँ न के बराबर विकास हुआ है। ट्रंप के अनुसार,ग्रीनलैंड अमेरिका,रूस और चीन के बीच एक ऐसी जगह पर स्थित है,जहाँ से वैश्विक शक्ति संतुलन को प्रभावित किया जा सकता है। उनका दावा है कि मौजूदा हालात में ग्रीनलैंड की सही तरीके से सुरक्षा नहीं हो रही है,जो भविष्य में बड़े खतरे को जन्म दे सकती है।
ट्रंप ने यह भी कहा कि जैसे-जैसे दुर्लभ धातुओं और संसाधनों का वैश्विक महत्व बढ़ा है,वैसे-वैसे ग्रीनलैंड की अहमियत भी बढ़ती जा रही है। हालाँकि,उन्होंने जोर देकर कहा कि उनका मुख्य फोकस संसाधनों पर नहीं,बल्कि क्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा पर है। उन्होंने ग्रीनलैंड को उत्तरी अमेरिका का हिस्सा बताते हुए कहा कि इसी वजह से यह क्षेत्र अमेरिका के लिए स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण है। ट्रंप के शब्दों में, “ग्रीनलैंड उत्तरी अमेरिका का हिस्सा है और इसलिए यह अमेरिका का इलाका है।”
ट्रंप के इस बयान ने एक बार फिर अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में हलचल पैदा कर दी है। डेनमार्क के लिए यह बयान कूटनीतिक रूप से असहज करने वाला है,वहीं नाटो सहयोगियों के सामने भी सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है। ग्रीनलैंड,जो भले ही आबादी के लिहाज से छोटा और कम विकसित क्षेत्र हो,लेकिन अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण वैश्विक शक्तियों के लिए बेहद अहम बन चुका है। ट्रंप का यह बयान इस बात का संकेत है कि आने वाले समय में ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका की सक्रियता और बढ़ सकती है।
ग्रीनलैंड पर ट्रंप का यह आक्रामक रुख केवल एक बयान भर नहीं है,बल्कि यह अमेरिका की बदलती रणनीतिक प्राथमिकताओं और वैश्विक शक्ति संतुलन को लेकर उसकी सोच को भी दर्शाता है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि डेनमार्क और अन्य नाटो देश इस बयान पर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं और क्या वाकई ग्रीनलैंड को लेकर कोई औपचारिक बातचीत शुरू होती है या यह मुद्दा केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रह जाता है।
