अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप

ईरान से व्यापार पर ट्रंप की टैरिफ चेतावनी,भारत के लिए बढ़ी चुनौती और चाबहार की रणनीतिक अहमियत

नई दिल्ली,13 जनवरी (युआईटीवी)- अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक नए ऐलान ने वैश्विक व्यापार और कूटनीति में हलचल मचा दी है। ट्रंप ने घोषणा की है कि जो भी देश ईरान के साथ व्यापार करेगा,उस पर अमेरिका 25 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क यानी टैरिफ लगाएगा। यह फैसला ऐसे समय पर सामने आया है,जब भारत पहले से ही अमेरिकी बाजार में 50 प्रतिशत तक के ऊँचे टैरिफ का सामना कर रहा है। ऐसे में ईरान के साथ अपने ऐतिहासिक और रणनीतिक व्यापारिक संबंधों को बनाए रखने वाले भारत के लिए यह घोषणा चिंता बढ़ाने वाली मानी जा रही है।

भारत और ईरान के बीच व्यापारिक रिश्ते लंबे समय से चले आ रहे हैं और दोनों देश एक-दूसरे के महत्वपूर्ण साझेदार रहे हैं। सरकारी आँकड़ों के अनुसार,वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने ईरान को करीब 1.24 अरब डॉलर का सामान निर्यात किया,जबकि ईरान से लगभग 0.44 अरब डॉलर का आयात किया गया। इस तरह दोनों देशों के बीच कुल द्विपक्षीय व्यापार 1.68 अरब डॉलर के स्तर पर रहा। यह आँकड़ा भले ही भारत के कुल वैश्विक व्यापार की तुलना में छोटा दिखे,लेकिन रणनीतिक दृष्टि से इसका महत्व काफी बड़ा है।

तेहरान स्थित भारतीय दूतावास की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी भी इस बात की पुष्टि करती है कि भारत और ईरान महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदार हैं। हाल के वर्षों में भारत लगातार ईरान के पाँच सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में शामिल रहा है। भारत ईरान को मुख्य रूप से चावल,चाय,चीनी,दवाइयाँ,कृत्रिम रेशे,बिजली के उपकरण और कृत्रिम आभूषण जैसे उत्पाद निर्यात करता है। दूसरी ओर,ईरान से भारत सूखे मेवे,रासायनिक पदार्थ और कांच से बने विभिन्न उत्पाद आयात करता है। इन वस्तुओं का व्यापार दोनों देशों की घरेलू जरूरतों और उद्योगों के लिए अहम माना जाता है।

भारत-ईरान संबंधों का सबसे अहम और संवेदनशील पहलू चाबहार बंदरगाह परियोजना है। वर्ष 2015 में भारत और ईरान ने ईरान के चाबहार स्थित शाहिद बेहेश्टी बंदरगाह को मिलकर विकसित करने के लिए एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए थे। यह बंदरगाह भारत के लिए केवल एक व्यापारिक परियोजना नहीं,बल्कि एक रणनीतिक गलियारा है। इसके जरिए भारत अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक सीधे पहुँच बना सकता है,जिससे उसे पाकिस्तान के रास्ते पर निर्भर नहीं रहना पड़ता।

हाल के वर्षों में अमेरिका द्वारा ईरान पर लगाए गए प्रतिबंधों के चलते चाबहार परियोजना भी कई बार अनिश्चितता के दौर से गुजरी है। हालाँकि,हाल ही में अमेरिका ने भारत को एक बड़ी राहत देते हुए चाबहार बंदरगाह पर अपना परिचालन जारी रखने के लिए दी गई प्रतिबंधों में छूट को छह महीने के लिए बढ़ा दिया है। यह छूट 29 अक्तूबर से प्रभावी मानी जा रही है। इसे भारत की एक अहम कूटनीतिक सफलता के रूप में देखा जा रहा है,खासकर ऐसे समय में जब ईरान और रूस पर अमेरिकी प्रतिबंधों को लेकर वैश्विक स्तर पर तनाव बना हुआ है।

इस छूट के बाद भारत को अगले साल अप्रैल तक चाबहार बंदरगाह को बिना किसी अमेरिकी प्रतिबंध के विकसित और संचालित करने की अनुमति मिल गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बंदरगाह भारत के लिए रणनीतिक और व्यापारिक दोनों ही दृष्टियों से बेहद अहम है। चाबहार के जरिए भारत न केवल अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक अपने व्यापारिक रास्ते खोल सकता है,बल्कि क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और प्रभाव को भी मजबूत कर सकता है।

ऐसे में राष्ट्रपति ट्रंप का यह नया टैरिफ ऐलान भारत के लिए एक जटिल स्थिति पैदा कर सकता है। एक ओर भारत अमेरिका के साथ अपने व्यापारिक और रणनीतिक संबंधों को नुकसान नहीं पहुँचाना चाहता, वहीं दूसरी ओर वह ईरान के साथ अपने ऐतिहासिक रिश्तों और चाबहार जैसे महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट को भी जोखिम में नहीं डाल सकता। भारत पहले से ही अमेरिकी बाजार में ऊँचे टैरिफ का सामना कर रहा है और यदि ईरान के साथ व्यापार जारी रखने पर अतिरिक्त 25 प्रतिशत शुल्क लगाया जाता है,तो इसका असर भारतीय निर्यातकों और उद्योगों पर पड़ सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार चीन है,जो अमेरिकी प्रतिबंधों और दबावों के बावजूद ईरान के साथ बड़े पैमाने पर व्यापार करता रहा है। भारत के अलावा संयुक्त अरब अमीरात और तुर्की जैसे देश भी ईरान के साथ सक्रिय व्यापारिक संबंध रखते हैं। ऐसे में ट्रंप प्रशासन के इस फैसले का असर केवल भारत तक सीमित नहीं रहेगा,बल्कि कई क्षेत्रीय और वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित कर सकता है।

कूटनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक,आने वाले समय में भारत को बेहद संतुलित और सतर्क रणनीति अपनानी होगी। एक तरफ अमेरिका के साथ संबंधों को सँभालना और दूसरी तरफ ईरान के साथ अपने रणनीतिक हितों की रक्षा करना भारत की विदेश नीति के लिए बड़ी चुनौती साबित हो सकता है। अब यह देखना अहम होगा कि भारत इस नई परिस्थिति में किस तरह अपने व्यापारिक हितों,ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय रणनीति के बीच संतुलन साधता है।