अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (तस्वीर क्रेडिट@OpIndia_in)

दावोस से ट्रंप का यूरोप पर तीखा हमला: इमिग्रेशन,अर्थव्यवस्था और ग्रीन एनर्जी नीति पर उठाए सवाल

दावोस,22 जनवरी (युआईटीवी)- विश्व आर्थिक मंच के मंच से अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर अपने बेबाक और आक्रामक अंदाज में वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था को लेकर अपनी सोच रखी। दावोस में दिए गए अपने संबोधन में ट्रंप ने जहाँ अमेरिका की आर्थिक उपलब्धियों की खुलकर तारीफ की,वहीं बँटे हुए यूरोप को लेकर गहरी निराशा भी जताई। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि यूरोप की मौजूदा नीतियाँ उसे सही दिशा में नहीं ले जा रहीं और इसके नतीजे आने वाले समय में और भी गंभीर हो सकते हैं।

अपने भाषण की शुरुआत ट्रंप ने अपेक्षाकृत सधे हुए लहजे में की। उन्होंने कहा कि दावोस में दूसरी बार आकर उन्हें खुशी हो रही है और यहाँ इतने सारे दोस्तों के साथ-साथ “कुछ दुश्मनों” के बीच होना भी उनके लिए एक दिलचस्प अनुभव है। इस टिप्पणी के साथ ही उन्होंने यह संकेत दे दिया कि उनका संबोधन सिर्फ कूटनीतिक शिष्टाचार तक सीमित नहीं रहने वाला है,बल्कि इसमें कड़े संदेश भी शामिल होंगे।

ट्रंप ने अपने भाषण का बड़ा हिस्सा यूरोप की नीतियों की आलोचना में बिताया। उन्होंने कहा कि यूरोप की इमिग्रेशन पॉलिसी और आर्थिक फैसलों के नतीजे “विनाशकारी” साबित हुए हैं। उनके मुताबिक,बड़े पैमाने पर और बिना नियंत्रण के प्रवासन,लगातार बढ़ता सरकारी खर्च और विदेशी आयात पर अत्यधिक निर्भरता ने यूरोप की आर्थिक और सामाजिक संरचना को कमजोर कर दिया है। ट्रंप ने दावा किया कि इसके ठीक उलट अमेरिका में एक “आर्थिक चमत्कार” देखने को मिल रहा है,जहाँ उनकी नीतियों की वजह से विकास, निवेश और रोजगार के नए अवसर पैदा हुए हैं।

अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि उन्हें यूरोप से प्यार है और वह सच में चाहते हैं कि यूरोप आगे बढ़े और मजबूत बने। हालाँकि,उन्होंने यह भी जोड़ा कि मौजूदा हालात में यूरोप सही दिशा में नहीं जा रहा है। उनके शब्दों में,यूरोप की समस्याओं की जड़ उसकी नीतियों में छिपी है,जहाँ सरकारें खर्च तो बढ़ा रही हैं,लेकिन सुधार और अनुशासन की कमी साफ दिखाई देती है। ट्रंप ने जोर देकर कहा कि आर्थिक मामलों में यूरोप को अमेरिका से सीखना चाहिए और वही करना चाहिए जो अमेरिका कर रहा है।

ट्रंप ने अपने संबोधन में यूरोप की ग्रीन एनर्जी नीति पर भी तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि पर्यावरण के नाम पर अपनाई जा रही कुछ नीतियाँ अव्यावहारिक हैं और उन्होंने यूरोप की अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त बोझ डाला है। इसके साथ ही उन्होंने बड़े पैमाने पर माइग्रेशन को लेकर भी कड़ी टिप्पणी की। ट्रंप ने दावा किया कि यूरोप के कई इलाके अब ऐसे हो गए हैं,जिन्हें पहचानना मुश्किल हो गया है। उन्होंने कहा कि उनके दोस्त जब अलग-अलग यूरोपीय शहरों से लौटते हैं,तो नकारात्मक अनुभव साझा करते हुए कहते हैं कि वे उन जगहों को पहचान ही नहीं पा रहे,जहाँ वे पहले जाया करते थे।

हालाँकि,ट्रंप ने यह भी दोहराया कि वह नहीं चाहते कि यूरोप असफल हो। उनके मुताबिक,उनका उद्देश्य सिर्फ यह बताना है कि मौजूदा नीतियाँ यूरोप को गलत दिशा में ले जा रही हैं और अगर समय रहते बदलाव नहीं किया गया,तो हालात और बिगड़ सकते हैं। यह बयान ट्रंप की उस सोच को दर्शाता है,जिसमें वह वैश्विक मुद्दों को अमेरिका-केंद्रित नजरिए से देखते हैं और दूसरे देशों से भी उसी मॉडल को अपनाने की अपेक्षा करते हैं।

अपने भाषण के अगले हिस्से में ट्रंप ने अमेरिका की आर्थिक स्थिति की जमकर सराहना की। उन्होंने कहा कि उनके नेतृत्व में अमेरिका ने महँगाई को काबू में किया है और बड़ी आर्थिक उपलब्धियाँ हासिल की हैं। ट्रंप के अनुसार,उनकी सरकार की नीतियों ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाया है और निवेशकों का भरोसा बढ़ाया है। उन्होंने इसे अपनी नीतियों की सफलता का प्रमाण बताया।

ट्रंप ने अपनी टैरिफ नीति का भी जोरदार बचाव किया। उन्होंने कहा कि सख्त टैरिफ नीति की वजह से अमेरिका अपने व्यापार घाटे को काफी हद तक कम करने में सफल रहा है। उन्होंने जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों के साथ किए गए समझौतों का उदाहरण देते हुए कहा कि ये डील्स न सिर्फ अमेरिका के लिए फायदेमंद साबित हुई हैं,बल्कि उन देशों के लिए भी आर्थिक विकास और शेयर बाजारों में तेजी लेकर आई हैं। उनके मुताबिक,अमेरिका के साथ समझौता करने वाले लगभग हर देश को इसका सकारात्मक लाभ मिला है।

दावोस में ट्रंप का यह संबोधन एक बार फिर यह दिखाता है कि वह वैश्विक मंचों पर भी अपनी घरेलू राजनीति और “अमेरिका फर्स्ट” नीति को केंद्र में रखते हैं। यूरोप पर की गई उनकी आलोचना से यह साफ है कि ट्रंप अब भी पारंपरिक सहयोगियों को खुलकर सलाह देने और उन पर दबाव बनाने से पीछे नहीं हटते। वहीं,अमेरिका की आर्थिक सफलता के उनके दावे उनके समर्थकों के लिए एक मजबूत संदेश हैं,जबकि आलोचकों के लिए बहस का नया मुद्दा।