अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (तस्वीर क्रेडिट@Mahsar_khan)

ईरान मुद्दे पर ट्रंप का फूटा गुस्सा: यूरोपीय सहयोगियों और नाटो पर साधा निशाना, ‘सिर्फ समर्थन, कोई योगदान नहीं’

वाशिंगटन,18 मार्च (युआईटीवी)- मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य कार्रवाई को लेकर यूरोपीय सहयोगियों पर तीखी नाराजगी जताई है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि नाटो देशों ने सिद्धांत रूप में तो इस कार्रवाई का समर्थन किया,लेकिन जब वास्तविक योगदान देने की बात आई तो वे पीछे हट गए। ट्रंप के इस बयान ने अमेरिका और उसके पारंपरिक सहयोगियों के बीच बढ़ती खाई को एक बार फिर उजागर कर दिया है।

व्हाइट हाउस के ओवल ऑफिस में माइकल मार्टिन के साथ बैठक के दौरान ट्रंप ने खुलकर अपनी नाराजगी जाहिर की। उन्होंने कहा कि अमेरिका ने ईरान के खिलाफ जो कदम उठाया,वह पूरी तरह से निर्णायक था और इसके लिए किसी बाहरी मदद की आवश्यकता नहीं थी। हालाँकि,उन्होंने यह भी जोड़ा कि सहयोगी देशों को नैतिक और रणनीतिक रूप से अमेरिका के साथ खड़ा होना चाहिए था। “हमें ज्यादा मदद की जरूरत नहीं है,बल्कि किसी मदद की जरूरत ही नहीं है,लेकिन उन्हें हमारे साथ होना चाहिए था,” ट्रंप ने कहा।

ट्रंप ने नाटो की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए इसे “मूर्खतापूर्ण” करार दिया। उनका कहना था कि जब भी कोई बड़ा कदम उठाने की जरूरत होती है,तो सहयोगी देश केवल समर्थन का बयान देते हैं,लेकिन जमीनी स्तर पर सहयोग नहीं करते। इस टिप्पणी ने नाटो के भीतर भी असहजता पैदा कर दी है।

अमेरिकी राष्ट्रपति ने इस सैन्य कार्रवाई को सफल बताते हुए दावा किया कि इससे ईरान की सैन्य क्षमताओं को गंभीर नुकसान पहुँचा है। उन्होंने कहा कि ईरान की नौसेना और वायुसेना लगभग पूरी तरह से निष्क्रिय हो चुकी हैं और उसका रडार सिस्टम भी नष्ट कर दिया गया है। ट्रंप के अनुसार,यह कार्रवाई इसलिए जरूरी थी क्योंकि ईरान तेजी से परमाणु हथियार बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा था। उन्होंने कहा कि, “ईरान एक महीने के भीतर परमाणु हथियार बना सकता था और वह पूरी दुनिया के लिए बड़ा खतरा था।”

इस बयान के बाद अमेरिकी राजनीतिक गलियारों में भी हलचल तेज हो गई है। रिपब्लिकन पार्टी के वरिष्ठ नेता लिंडसे ग्राहम ने भी ट्रंप के गुस्से की पुष्टि की। उन्होंने कहा कि यूरोपीय सहयोगियों के रवैये से ट्रंप बेहद नाराज हैं और उन्होंने उन्हें पहले कभी इतना आक्रोशित नहीं देखा। ग्राहम ने आरोप लगाया कि यूरोपीय देशों ने न केवल सैन्य कार्रवाई में सहयोग नहीं किया,बल्कि हॉर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर भी कोई ठोस कदम नहीं उठाया।

अमेरिकी प्रशासन के अन्य वरिष्ठ अधिकारियों ने भी इस मुद्दे पर चिंता जताई है। उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा कि क्षेत्र में खतरा लगातार बढ़ रहा है और अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिलिशिया समूहों द्वारा हमले किए जा रहे हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर ऐसे समूहों को परमाणु हथियार हासिल करने का मौका मिल गया,तो इसके परिणाम बेहद गंभीर हो सकते हैं। वेंस ने कहा कि अमेरिका का प्राथमिक लक्ष्य इन खतरों को समय रहते रोकना है।

हालाँकि,इस पूरे घटनाक्रम के बीच यूरोपीय पक्ष से संतुलित प्रतिक्रिया सामने आई है। आयरलैंड के प्रधानमंत्री माइकल मार्टिन ने दोनों पक्षों के बीच संबंधों को महत्वपूर्ण बताते हुए तनाव कम करने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि अमेरिका और यूरोप के रिश्ते वैश्विक स्थिरता के लिए बेहद जरूरी हैं और किसी भी मतभेद को बातचीत के जरिए सुलझाया जाना चाहिए। मार्टिन ने यह भी स्वीकार किया कि ईरान एक संभावित खतरा है, लेकिन उन्होंने कूटनीतिक समाधान पर जोर दिया।

विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप के ये बयान केवल तत्काल नाराजगी का परिणाम नहीं हैं,बल्कि यह अमेरिका की बदलती विदेश नीति का संकेत भी हो सकते हैं। पिछले कुछ समय से अमेरिका अपने सहयोगियों से अधिक जिम्मेदारी और योगदान की अपेक्षा कर रहा है,खासकर ऐसे मामलों में जहाँ वैश्विक सुरक्षा दांव पर हो।

इस बीच,ईरान के खिलाफ अमेरिकी कार्रवाई और उस पर अंतर्राष्ट्रीय प्रतिक्रिया ने पूरे मध्य पूर्व को एक बार फिर अस्थिरता के मुहाने पर ला खड़ा किया है। एक ओर जहाँ अमेरिका अपनी सैन्य ताकत का प्रदर्शन कर रहा है,वहीं दूसरी ओर कूटनीतिक प्रयासों की भी जरूरत महसूस की जा रही है।

फिलहाल,यह स्पष्ट है कि अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगियों के बीच इस मुद्दे को लेकर मतभेद गहरे हो गए हैं। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या दोनों पक्ष अपने मतभेदों को दूर कर पाते हैं या यह विवाद और अधिक बढ़ता है,जिससे वैश्विक राजनीति पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।