वॉशिंगटन,24 फरवरी (युआईटीवी)- अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को टैरिफ के मुद्दे पर आक्रामक रुख अपनाते हुए कहा कि उन्हें नए सिरे से शुल्क लगाने के लिए कांग्रेस की मंजूरी की आवश्यकता नहीं है। ट्रंप ने चेतावनी दी कि जिन देशों ने दशकों तक अमेरिका का “फायदा उठाया” है,वे अब कहीं अधिक सख्त और ऊँचे टैरिफ के लिए तैयार रहें। उनका यह बयान ऐसे समय आया है,जब अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के बाद टैरिफ व्यवस्था को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है और इसी पृष्ठभूमि में भारत ने अपना प्रस्तावित व्यापारिक प्रतिनिधिमंडल वॉशिंगटन भेजने का कार्यक्रम फिलहाल टाल दिया है।
ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर लिखा कि राष्ट्रपति के रूप में उन्हें टैरिफ लागू करने के लिए कांग्रेस के पास वापस जाने की जरूरत नहीं है,क्योंकि इसकी मंजूरी पहले ही विभिन्न रूपों में मिल चुकी है। उन्होंने हालिया सुप्रीम कोर्ट के फैसले को “हास्यास्पद और खराब तरीके से तैयार किया गया” बताते हुए कहा कि इस निर्णय से भी उनके अधिकारों की पुष्टि होती है। ट्रंप के इस बयान ने वैश्विक व्यापारिक साझेदारों के बीच नई बहस को जन्म दे दिया है।
ट्रंप ने अपने संदेश में साफ शब्दों में कहा कि यदि कोई देश इस फैसले का लाभ उठाकर अमेरिका के साथ “खेल” खेलने की कोशिश करेगा,तो उसे हाल में बनी किसी भी टैरिफ सहमति से कहीं अधिक कठोर शुल्क झेलने होंगे। उन्होंने विशेष रूप से उन देशों का जिक्र किया जो,उनके अनुसार,वर्षों और दशकों से अमेरिका के साथ व्यापार में असंतुलन का फायदा उठाते रहे हैं। हालाँकि,उन्होंने किसी देश का नाम नहीं लिया,लेकिन उनके बयान को चीन,यूरोपीय संघ और भारत जैसे प्रमुख व्यापारिक साझेदारों के संदर्भ में देखा जा रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच व्हाइट हाउस की ओर से कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है। एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी ने आईएएनएस से कहा कि अमेरिका अपने सभी व्यापारिक साझेदारों के साथ पर्दे के पीछे काम करना जारी रखे हुए है। अधिकारी ने यह भी संकेत दिया कि कानूनी स्थिति स्पष्ट होने तक औपचारिक घोषणाओं से परहेज किया जा सकता है।
उधर,भारत ने इस अनिश्चितता के माहौल में अपना प्रस्तावित व्यापारिक प्रतिनिधिमंडल का अमेरिका दौरा स्थगित कर दिया है। सूत्रों के अनुसार,भारतीय और अमेरिकी अधिकारियों के बीच परामर्श के बाद यह निर्णय लिया गया। फिलहाल नई तिथि तय नहीं की गई है,क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद टैरिफ ढांचे की स्थिति स्पष्ट नहीं है। भारतीय प्रतिनिधिमंडल को वॉशिंगटन में एक अंतरिम व्यापार समझौते पर बातचीत करनी थी,जिसके तहत भारतीय निर्यात पर लगाए गए दंडात्मक टैरिफ में कमी और अमेरिकी आयात में वृद्धि की संभावना जताई जा रही थी।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका टैरिफ नीति को लेकर फिर से आक्रामक रुख अपनाता है,तो वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं पर इसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। पिछले वर्षों में टैरिफ युद्धों ने न केवल अमेरिका और चीन के बीच व्यापार को प्रभावित किया,बल्कि उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर भी दबाव डाला। भारत,जो अमेरिका का एक प्रमुख व्यापारिक साझेदार है,इस स्थिति को सावधानी से देख रहा है। भारत के लिए आईटी सेवाएँ, फार्मास्युटिकल्स,टेक्सटाइल और इंजीनियरिंग उत्पाद जैसे क्षेत्र अमेरिकी बाजार पर काफी निर्भर हैं।
टैरिफ से जुड़ी कानूनी जटिलताओं ने भी स्थिति को उलझा दिया है। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले के बाद यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि राष्ट्रपति के अधिकारों की सीमा क्या है और क्या कार्यपालिका बिना नई संसदीय स्वीकृति के व्यापक टैरिफ लागू कर सकती है। ट्रंप का दावा है कि उन्हें पूर्व में मिले अधिकार पर्याप्त हैं,लेकिन कानूनी विशेषज्ञों का एक वर्ग मानता है कि इस मुद्दे पर आगे और न्यायिक स्पष्टता की आवश्यकता हो सकती है।
भारतीय व्यापार विशेषज्ञों का कहना है कि भारत फिलहाल स्थिति स्पष्ट होने का इंतजार कर रहा है। यदि अमेरिका अपनी टैरिफ नीति में बदलाव करता है,तो भारत को अपनी निर्यात रणनीति और वार्ता की दिशा पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है। अंतरिम व्यापार समझौते की संभावनाएँ अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं,लेकिन मौजूदा अनिश्चितता ने बातचीत की गति को धीमा कर दिया है।
ट्रंप के ताजा बयान से यह संकेत मिलता है कि यदि वे दोबारा सत्ता में आते हैं या उनकी नीति प्रभावी रहती है, तो “अमेरिका फर्स्ट” की रणनीति के तहत व्यापारिक संरक्षणवाद को फिर से प्राथमिकता मिल सकती है। इससे वैश्विक व्यापार तंत्र में तनाव बढ़ सकता है और बहुपक्षीय व्यापार संस्थाओं की भूमिका भी चुनौती के घेरे में आ सकती है।
फिलहाल,दुनिया की निगाहें अमेरिका की कानूनी और राजनीतिक स्थिति पर टिकी हैं। भारत सहित कई देश यह आकलन कर रहे हैं कि आने वाले समय में अमेरिकी टैरिफ नीति किस दिशा में जाएगी और उसके अनुसार अपनी रणनीति तय कर रहे हैं। अनिश्चितता के इस दौर में स्पष्टता आने तक व्यापारिक वार्ताएं सतर्कता के साथ आगे बढ़ेंगी।
