नई दिल्ली,22 जनवरी (युआईटीवी)- साल 2000 के बहुचर्चित लाल किला आतंकी हमले से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर अहम कदम उठाया है। इस हमले में दोषी ठहराए गए लश्कर-ए-तैयबा के आतंकी मोहम्मद आरिफ उर्फ अशफाक द्वारा दायर क्यूरेटिव याचिका पर शीर्ष अदालत ने नोटिस जारी किया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में दिल्ली पुलिस को नोटिस भेजते हुए मामले पर जवाब माँगा है। आरिफ ने अपनी याचिका में मौत की सजा को चुनौती दी है,जिसे पहले अपील,पुनर्विचार याचिका और राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिका खारिज होने के बावजूद बरकरार रखा गया था।
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ,जिसमें जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस जे.के. महेश्वरी शामिल थे,ने इस क्यूरेटिव याचिका पर संक्षिप्त सुनवाई की। सुनवाई के दौरान दोषी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाल के वर्षों में मौत की सजा से जुड़े मामलों में दिए गए कुछ अहम फैसलों के आलोक में आरिफ के मामले पर दोबारा विचार किया जाना चाहिए। वकील ने कहा कि जब आरिफ की अपील और पुनर्विचार याचिका खारिज की गई थी,उस समय जो कानूनी स्थिति थी,उसमें और मौजूदा समय में काफी बदलाव आया है,इसलिए न्याय के हित में इस मामले पर पुनर्विचार जरूरी है।
पीठ ने दलीलें सुनने के बाद कहा कि इस याचिका पर नोटिस जारी किया जाए। इसके साथ ही अदालत ने साफ किया कि फिलहाल यह केवल क्यूरेटिव याचिका पर प्रारंभिक कदम है और अंतिम निर्णय सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद ही लिया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है,क्योंकि क्यूरेटिव याचिका न्यायिक प्रक्रिया का अंतिम विकल्प होती है,जिसे बेहद दुर्लभ परिस्थितियों में स्वीकार किया जाता है।
गौरतलब है कि 22 दिसंबर 2000 को दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किले में हुए इस आतंकी हमले ने पूरे देश को झकझोर दिया था। उस दिन हथियारों से लैस आतंकियों ने लाल किला परिसर में तैनात 7 राजपूताना राइफल्स के जवानों पर अंधाधुंध फायरिंग की थी। इस हमले में तीन जवान शहीद हो गए थे,जबकि कई अन्य बाल-बाल बच गए थे। यह हमला न केवल सुरक्षा व्यवस्था पर सीधा प्रहार था,बल्कि देश की संप्रभुता और प्रतिष्ठा को चुनौती देने की कोशिश भी माना गया था।
इस हमले के चार दिन बाद दिल्ली पुलिस ने जामिया नगर इलाके से पाकिस्तानी नागरिक और लश्कर-ए-तैयबा के आतंकी मोहम्मद आरिफ उर्फ अशफाक को गिरफ्तार किया था। जाँच में सामने आया कि आरिफ इस साजिश का अहम हिस्सा था और उसने हमले को अंजाम देने में सक्रिय भूमिका निभाई थी। इसके बाद लंबी कानूनी प्रक्रिया चली। वर्ष 2005 में ट्रायल कोर्ट ने आरिफ समेत सात आरोपियों को दोषी ठहराया। हालाँकि,बाद में दिल्ली हाई कोर्ट ने अन्य आरोपियों को बरी कर दिया,लेकिन आरिफ की सजा को बरकरार रखा।
सुप्रीम कोर्ट ने 2011 में लाल किला आतंकी हमले के मामले में मोहम्मद आरिफ को फाँसी की सजा सुनाई थी। अदालत ने इसे ‘दुर्लभ से दुर्लभतम’ श्रेणी का अपराध मानते हुए कहा था कि इस तरह के आतंकी हमलों का उद्देश्य देश में डर और अस्थिरता फैलाना होता है,जिसे किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। इसके बाद आरिफ ने सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की,लेकिन 2 सितंबर 2014 को अदालत ने उसे भी खारिज कर दिया।
इसके बाद 3 नवंबर 2022 को सुप्रीम कोर्ट ने आरिफ की एक और पुनर्विचार याचिका को ठुकराते हुए उसकी फाँसी की सजा को कायम रखा। इसके समानांतर आरिफ ने राष्ट्रपति के पास दया याचिका भी दाखिल की थी। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने पिछले साल जून में इस दया याचिका को खारिज कर दिया था। राष्ट्रपति सचिवालय की ओर से कहा गया था कि मामले में ऐसा कोई नया तथ्य या परिस्थिति सामने नहीं आई है,जिससे अपराध की गंभीरता कम होती हो या सजा में नरमी बरती जाए।
दया याचिका खारिज होने के बाद माना जा रहा था कि अब आरिफ के पास कोई कानूनी रास्ता नहीं बचा है। हालाँकि,इसके बाद उसने क्यूरेटिव याचिका दाखिल की,जो न्यायिक प्रक्रिया का अंतिम और सबसे असाधारण उपाय माना जाता है। क्यूरेटिव याचिका तभी स्वीकार की जाती है,जब यह साबित हो कि पहले के फैसलों में न्याय के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ है या किसी गंभीर त्रुटि के कारण आरोपी को निष्पक्ष सुनवाई का मौका नहीं मिला।
आरिफ की ओर से दायर क्यूरेटिव याचिका में यह तर्क दिया गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने हाल के वर्षों में मौत की सजा के मामलों में ‘दुर्लभ से दुर्लभतम’ सिद्धांत की व्याख्या को और अधिक सख्त किया है। इसके अलावा,सजा तय करते समय आरोपी की व्यक्तिगत परिस्थितियों,सुधार की संभावना और वैकल्पिक दंड पर भी विस्तार से विचार करने की बात कही गई है। आरिफ के वकील का कहना है कि इन पहलुओं पर उसके मामले में पर्याप्त रूप से विचार नहीं हुआ।
इस बीच,दिल्ली पुलिस और केंद्र सरकार की ओर से यह स्पष्ट किया गया है कि लाल किला हमला देश की सुरक्षा पर सीधा हमला था और इसमें शहीद हुए जवानों के परिवारों को आज भी न्याय की उम्मीद है। सरकार का रुख अब तक यही रहा है कि इस मामले में किसी तरह की नरमी का सवाल ही नहीं उठता।
अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा नोटिस जारी किए जाने के बाद यह मामला एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है। आने वाले दिनों में अदालत दिल्ली पुलिस और अन्य संबंधित पक्षों के जवाबों पर गौर करेगी। इसके बाद ही यह तय होगा कि क्यूरेटिव याचिका पर आगे सुनवाई होगी या नहीं।
लाल किला आतंकी हमला केवल एक आपराधिक मामला नहीं,बल्कि देश की सामूहिक स्मृति से जुड़ा एक संवेदनशील मुद्दा है। सुप्रीम कोर्ट का अगला कदम न केवल मोहम्मद आरिफ के भविष्य का फैसला करेगा,बल्कि मौत की सजा से जुड़े न्यायिक सिद्धांतों पर भी दूरगामी असर डाल सकता है।
