नई दिल्ली,27 नवंबर (युआईटीवी)- संविधान दिवस के ऐतिहासिक अवसर पर सोमवार को फ्रांस की राजधानी पेरिस स्थित यूनेस्को मुख्यालय में भारत के महान संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर की प्रतिमा का भव्य अनावरण किया गया। यह क्षण न केवल भारतीय लोकतंत्र और संविधान के प्रति सम्मान का प्रतीक बना,बल्कि वैश्विक मंच पर भारत की संवैधानिक विरासत के गौरवपूर्ण प्रदर्शन का भी अवसर रहा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस अनावरण को देश के लिए अत्यंत गर्व का क्षण बताते हुए कहा कि यह डॉ. आंबेडकर को समर्पित एक सच्ची और हृदयस्पर्शी श्रद्धांजलि है,जिनके विचारों ने विश्वभर के करोड़ों लोगों को प्रेरित किया है।
प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म ‘एक्स’ पर अपने संदेश में लिखा कि संविधान दिवस के इस महत्वपूर्ण अवसर पर बाबासाहेब की प्रतिमा का यूनेस्को जैसे प्रतिष्ठित वैश्विक संस्थान में स्थापित होना भारत की लोकतांत्रिक भावना का सम्मान है। उन्होंने कहा कि डॉ. आंबेडकर ने भारतीय संविधान को केवल एक कानूनी दस्तावेज़ के रूप में नहीं गढ़ा,बल्कि उसे सामाजिक न्याय,समानता,स्वतंत्रता और बंधुत्व जैसे मानवीय मूल्यों से सजाया। यह प्रतिमा उन्हीं आदर्शों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उजागर करती है और दुनिया को भारतीय लोकतंत्र की मजबूती का संदेश देती है।
इसी अवसर पर नई दिल्ली स्थित संसद भवन परिसर में संविधान दिवस का राष्ट्रीय समारोह भी आयोजित किया गया,जिसमें राष्ट्रपति,उपराष्ट्रपति,प्रधानमंत्री,लोकसभा अध्यक्ष,केंद्रीय मंत्रिमंडल,सांसद और अनेक विशिष्ट व्यक्ति उपस्थित रहे। समारोह का आरंभ राष्ट्रगान से हुआ,जिसके बाद लोकसभा अध्यक्ष ने स्वागत भाषण देते हुए संविधान निर्माताओं को नमन किया और इस दिवस के महत्व पर प्रकाश डाला। इसके पश्चात उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने अपने संबोधन में संविधान के संरक्षण और नागरिकों की संवैधानिक जिम्मेदारियों पर बल दिया।
समारोह के मुख्य आकर्षण के रूप में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अपने अभिभाषण में भारत की लोकतांत्रिक यात्रा की चर्चा की और संविधान को राष्ट्र की आत्मा बताते हुए कहा कि यह दस्तावेज़ केवल कानूनों का संग्रह भर नहीं,बल्कि भारत के करोड़ों नागरिकों की आकांक्षाओं और सपनों का आधार है। राष्ट्रपति ने संविधान के मूल सिद्धांत—न्याय,स्वतंत्रता,समानता और बंधुत्व को भारत की राष्ट्रीय पहचान का आधार बताते हुए कहा कि इन आदर्शों को न केवल सरकारों द्वारा,बल्कि प्रत्येक नागरिक द्वारा अपने आचरण में उतारा जाना चाहिए।
राष्ट्रपति के अभिभाषण के बाद संविधान की प्रस्तावना का सामूहिक वाचन किया गया,जिसमें उपस्थित सभी नेताओं,अधिकारियों और अतिथियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। यह दृश्य भारत में संवैधानिक मूल्यों की मजबूती और लोकतांत्रिक परंपरा की निरंतरता का प्रतीक बना। समारोह का समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ,लेकिन उपस्थित लोगों के मन में संविधान के प्रति सम्मान और प्रतिबद्धता की भावना लंबे समय तक गूँजती रही।
वहीं,देश भर में इस अवसर को नागरिक सहभागिता के साथ जोड़ने के लिए संसदीय कार्य मंत्रालय ने माईगॉव प्लेटफ़ॉर्म के सहयोग से एक राष्ट्रव्यापी अभियान चलाया है। “हमारा संविधान,हमारा स्वाभिमान” विषय पर आयोजित इस अभियान के तहत देश के युवा और नागरिकों को निबंध और ब्लॉग लेखन प्रतियोगिता,ऑनलाइन क्विज और प्रस्तावना वाचन जैसी गतिविधियों में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। इसका उद्देश्य संविधान के प्रति जन-जागरूकता बढ़ाना और आम जनमानस में संवैधानिक मूल्यों की समझ को और गहरा करना है।
संविधान दिवस को इस वर्ष विशेष बनाने का सबसे बड़ा कारण पेरिस में बाबासाहेब की प्रतिमा का अनावरण रहा,जिसने भारत की संवैधानिक यात्रा को वैश्विक मंच पर नई पहचान प्रदान की। डॉ. आंबेडकर हमेशा से शिक्षा,समान अवसर और मानवाधिकारों के पक्षधर रहे। यूनेस्को—जो शिक्षा,विज्ञान और संस्कृति को बढ़ावा देने वाला प्रमुख वैश्विक निकाय है,उसके मुख्यालय में उनकी प्रतिमा का स्थापित होना उनके विचारों की वैश्विक प्रासंगिकता को दर्शाता है।
यह क्षण इस बात का भी प्रतीक है कि भारत दुनिया को लोकतंत्र,सामाजिक न्याय और समानता के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता रहा है। प्रधानमंत्री मोदी के शब्दों में,बाबासाहेब के विचार आने वाले समय में भी दुनिया भर के लोगों को शक्ति और आशा प्रदान करते रहेंगे।
संविधान दिवस के आयोजन और पेरिस में प्रतिमा अनावरण के साथ,भारत ने एक बार फिर यह संदेश दिया है कि उसका संविधान केवल उसके शासन का आधार नहीं,बल्कि मानवता के सार्वभौमिक मूल्यों का दर्पण है। इस अवसर ने न केवल भारतीयों को गर्व से भर दिया,बल्कि विश्व समुदाय को भी भारत के महान संवैधानिक विचारक डॉ. आंबेडकर के समृद्ध योगदान से परिचित करवाया।

