संयुक्त राष्ट्र महासचिव चुनाव में बड़ा उलटफेर (तस्वीर क्रेडिट@rashtra_press)

संयुक्त राष्ट्र महासचिव चुनाव में बड़ा उलटफेर,महिला नेतृत्व की ओर बढ़ता झुकाव; कई उम्मीदवारों की वापसी से बदला समीकरण

संयुक्त राष्ट्र,27 मार्च (युआईटीवी)- संयुक्त राष्ट्र महासचिव पद के लिए चल रही चुनावी प्रक्रिया में हाल के दिनों में बड़ा बदलाव देखने को मिला है,जिसने पूरे समीकरण को नया मोड़ दे दिया है। पहले मालदीव द्वारा अपनी उम्मीदवार वर्जीनिया गांबा का नामांकन वापस लेने के बाद अब चिली ने भी अपनी स्थिति बदलते हुए पूर्व राष्ट्रपति मिशेल बेचलेट के समर्थन से हाथ खींच लिया है। इन दोनों फैसलों के बाद चुनावी मैदान में उम्मीदवारों की संख्या घटकर तीन रह गई है,जिससे अब यह मुकाबला और भी दिलचस्प हो गया है।

संयुक्त राष्ट्र महासभा अध्यक्ष की प्रवक्ता ला नीस कॉलिन्स ने इस घटनाक्रम की पुष्टि करते हुए बताया कि मालदीव ने आधिकारिक रूप से महासभा और सुरक्षा परिषद को पत्र भेजकर वर्जीनिया गांबा का नाम वापस लेने की जानकारी दी है। गौरतलब है कि गांबा संयुक्त राष्ट्र में कई महत्वपूर्ण पदों पर कार्य कर चुकी हैं और उनका नामांकन शुरू से ही चर्चा का विषय बना हुआ था,क्योंकि उनका मालदीव से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं था।

मालदीव के स्थायी प्रतिनिधि अली नसीर मोहम्मद ने इस फैसले के पीछे के कारणों को सार्वजनिक नहीं किया है,जिससे अटकलों का दौर जारी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर समर्थन की कमी या बदलते कूटनीतिक समीकरण इस निर्णय के पीछे हो सकते हैं।

इसी तरह,चिली द्वारा मिशेल बेचलेट के समर्थन से पीछे हटना भी एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है। हालाँकि,चिली के हटने के बावजूद ब्राजील और मैक्सिको का समर्थन अभी भी बेचलेट के साथ बना हुआ है। बेचलेट न केवल चिली की पूर्व राष्ट्रपति रह चुकी हैं,बल्कि संयुक्त राष्ट्र में मानवाधिकार उच्चायुक्त के रूप में भी उनकी भूमिका काफी प्रभावशाली रही है।

इसके बावजूद,उनकी उम्मीदवारी को लेकर विवाद भी सामने आए हैं। अमेरिका के सांसद चक एडवर्ड्स ने उनके खिलाफ खुलकर विरोध जताया है। उन्होंने कहा है कि अमेरिकी संसद के कुछ सदस्य उनके खिलाफ एक औपचारिक पत्र तैयार कर रहे हैं। इस विरोध के पीछे मुख्य कारण यह बताया जा रहा है कि बेचलेट ने अपने कार्यकाल के दौरान अमेरिका और इजरायल में मानवाधिकारों को लेकर आलोचनात्मक रुख अपनाया था।

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य होने के नाते अमेरिका के पास वीटो पावर है। यदि अमेरिका बेचलेट के नाम का विरोध करता है,तो उनके लिए महासचिव बनना लगभग असंभव हो सकता है,चाहे उन्हें अन्य देशों का कितना भी समर्थन क्यों न प्राप्त हो।

इस बीच,कोस्टारिका की प्रमुख अर्थशास्त्री रेबेका ग्रिनस्पैन इस चुनाव में एकमात्र प्रमुख महिला उम्मीदवार के रूप में उभरकर सामने आई हैं। वर्तमान परिस्थितियों में उन्हें एक मजबूत दावेदार माना जा रहा है,खासकर तब जब महिला नेतृत्व को लेकर वैश्विक स्तर पर दबाव बढ़ता जा रहा है।

इसके अलावा अर्जेंटीना के राफेल ग्रोसी भी इस दौड़ में बने हुए हैं और उन्हें अपने देश का पूरा समर्थन प्राप्त है। वहीं,एक अन्य उम्मीदवार मैकी सैल को बुरुंडी का समर्थन मिला है। इस प्रकार अब कुल तीन उम्मीदवार मैदान में हैं,जिनमें से प्रत्येक के सामने अपनी-अपनी चुनौतियाँ और संभावनाएँ मौजूद हैं।

महासचिव के इस चुनाव में इस बार एक महिला को शीर्ष पद पर देखने की माँग काफी तेज हो गई है। संयुक्त राष्ट्र महासभा के एक प्रस्ताव में भी लिंग के आधार पर “समान और न्यायसंगत प्रतिनिधित्व” को एक प्रमुख लक्ष्य के रूप में रेखांकित किया गया है। इससे यह संकेत मिलता है कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय अब नेतृत्व के स्तर पर लैंगिक संतुलन को प्राथमिकता देना चाहता है।

महासभा अध्यक्ष एनालेना बेयरबॉक और सुरक्षा परिषद के तत्कालीन अध्यक्ष ने भी पिछले वर्ष चुनाव प्रक्रिया शुरू करते समय महिला उम्मीदवारों को आगे आने के लिए प्रोत्साहित किया था। इसका असर अब स्पष्ट रूप से देखने को मिल रहा है,जहाँ महिला उम्मीदवारों को लेकर चर्चा और समर्थन दोनों बढ़े हैं।

चुनावी प्रक्रिया के तहत नामांकन की अंतिम तारीख बुधवार निर्धारित की गई है,जिसके बाद 20 अप्रैल से उम्मीदवारों के इंटरैक्टिव सत्र शुरू होंगे। इन सत्रों में सभी उम्मीदवार अपनी नीतियां और दृष्टिकोण प्रस्तुत करेंगे तथा सदस्य देशों के सवालों का जवाब देंगे। यह चरण उम्मीदवारों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होगा,क्योंकि यहीं से उनके प्रति अंतर्राष्ट्रीय समर्थन का वास्तविक आकलन किया जाएगा।

हालाँकि,महासभा में साधारण बहुमत से महासचिव का चयन होता है,लेकिन वास्तविक निर्णय संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के हाथ में होता है। संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुसार महासभा महासचिव की नियुक्ति तभी कर सकती है,जब सुरक्षा परिषद उसकी सिफारिश करे। इस प्रक्रिया में स्थायी सदस्यों की भूमिका निर्णायक होती है,क्योंकि उनके पास वीटो का अधिकार होता है।

इस प्रकार,संयुक्त राष्ट्र महासचिव पद का यह चुनाव केवल उम्मीदवारों के बीच की प्रतिस्पर्धा नहीं,बल्कि वैश्विक राजनीति, कूटनीति और शक्ति संतुलन का भी एक महत्वपूर्ण प्रतिबिंब है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि कौन उम्मीदवार इस जटिल प्रक्रिया को पार करते हुए दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संगठन का नेतृत्व सँभालता है।