संयुक्त राष्ट्र,29 अगस्त (युआईटीवी)- संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने लेबनान में संयुक्त राष्ट्र अंतरिम बल (यूएनआईएफआईएल) की तैनाती को उसकी अंतिम अवधि के लिए बढ़ा दिया है। सर्वसम्मति से पारित प्रस्ताव 2790 के अनुसार,यूनिफिल का कार्यकाल 31 दिसंबर 2026 तक जारी रहेगा। इसके बाद एक वर्ष के भीतर इसमें शामिल शांति सैनिकों की संख्या धीरे-धीरे घटाई जाएगी और मिशन की पूर्ण वापसी कर दी जाएगी। यह फैसला संयुक्त राष्ट्र शांति प्रयासों के लगभग 50 साल पुराने अध्याय को समाप्त करने की दिशा में एक निर्णायक कदम माना जा रहा है।
यूएनआईएफआईएल की स्थापना वर्ष 1978 में उस समय की गई थी,जब इजरायल ने लेबनान पर हमला किया था। इस मिशन का उद्देश्य दक्षिण लेबनान से इजरायली सेना की वापसी पर नजर रखना था। इसके बाद वर्ष 2006 में इजरायल और हिज्बुल्लाह के बीच एक महीने तक चले युद्ध ने इस मिशन की जिम्मेदारियों को और विस्तृत कर दिया। उस समय यूनिफिल को केवल निगरानी तक सीमित नहीं रखा गया,बल्कि उसे संघर्षविराम लागू कराने और दक्षिणी लेबनान में सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने की जिम्मेदारी भी दी गई। इस तरह यूनिफिल न केवल एक निगरानी मिशन रहा बल्कि लेबनान की स्थिरता और क्षेत्रीय शांति का भी एक महत्वपूर्ण साधन बन गया।
सुरक्षा परिषद में प्रस्ताव पारित होने के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि वर्ष 2026 के अंत तक दक्षिण लेबनान में संयुक्त राष्ट्र शांति सेना का अध्याय समाप्त हो जाएगा। परिषद ने सर्वसम्मति से यह तय किया कि यूनिफिल अब अपनी अंतिम अवधि पूरी करेगा और फिर धीरे-धीरे वापस लौट जाएगा। इस दौरान परिषद ने लेबनानी सरकार से भी अपील की है कि वह 1995 के सैन्य स्थिति समझौते के प्रावधानों का पूर्ण रूप से सम्मान करे। इसमें यूनिफिल की आवाजाही की स्वतंत्रता और उनके विशेषाधिकारों को बरकरार रखने की बात शामिल है।
लेबनान में यूनिफिल की तैनाती का लगभग आधी सदी लंबा सफर रहा है। इस दौरान उसने कई उतार-चढ़ाव देखे। 1978 से लेकर 2000 तक यूनिफिल का ध्यान मुख्य रूप से इजरायली सेना की गतिविधियों और दक्षिण लेबनान की स्थिति पर रहा। वर्ष 2000 में संयुक्त राष्ट्र ने लेबनान और इजरायल के बीच ब्लू लाइन नाम की सीमा रेखा खींची। इसके बाद से यूनिफिल का काम इस ब्लू लाइन की निगरानी करना और दोनों पक्षों द्वारा संघर्षविराम समझौते का पालन सुनिश्चित करना रहा है।
2006 का युद्ध इस मिशन के लिए एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ। इजरायल और हिज्बुल्लाह के बीच चले इस संघर्ष ने न केवल लेबनान बल्कि पूरे मध्य पूर्व को अस्थिर कर दिया था। उस समय सुरक्षा परिषद ने संकल्प 1701 पारित कर यूनिफिल की भूमिका को और मजबूत किया। इसके तहत मिशन को सिर्फ निगरानी का दायित्व नहीं बल्कि सक्रिय रूप से संघर्षविराम लागू करने और सुरक्षा व्यवस्था कायम करने की जिम्मेदारी भी दी गई। यही कारण रहा कि पिछले डेढ़ दशक में यूनिफिल लेबनान के दक्षिणी इलाकों में शांति बनाए रखने की सबसे बड़ी आधारशिला बना रहा।
अब पारित संकल्प 2790,संकल्प 1701 के पूर्ण कार्यान्वयन पर जोर देता है। यह युद्धविराम की मजबूती और ब्लू लाइन का सम्मान करने की माँग करता है। इसका सीधा संदेश यह है कि 2026 के बाद लेबनान और इजरायल को अपने संबंधों में स्थिरता लाने के लिए अधिक जिम्मेदारी खुद लेनी होगी। संयुक्त राष्ट्र ने साफ कर दिया है कि वह अपनी उपस्थिति को स्थायी नहीं बनाए रखेगा और अब क्षेत्रीय स्थिरता की जिम्मेदारी स्थानीय सरकारों और पक्षों पर ही होगी।
लेबनान में यूनिफिल की उपस्थिति को लेकर हमेशा से मिश्रित प्रतिक्रियाएँ रही हैं। एक ओर स्थानीय लोगों ने इसे सुरक्षा और शांति का प्रतीक माना,तो दूसरी ओर कई बार इसके अधिकारों और सीमाओं पर विवाद भी उठे। हिज्बुल्लाह और इजरायल के बीच लगातार तनाव और समय-समय पर होने वाली झड़पों के बीच यूनिफिल ने कई बार बीच-बचाव किया और बड़े संघर्षों को टालने में अहम भूमिका निभाई,लेकिन यह भी सच है कि यूनिफिल कभी भी पूरी तरह से इजरायल-हिज्बुल्लाह के टकराव को रोक नहीं पाया।
इस फैसले के बाद अब अंतर्राष्ट्रीय जगत की नजरें इस बात पर होंगी कि 2026 के बाद लेबनान में सुरक्षा व्यवस्था किस तरह कायम रहती है। दक्षिण लेबनान लंबे समय से संघर्ष का केंद्र रहा है और वहाँ की राजनीतिक अस्थिरता ने हमेशा अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को चिंतित किया है। संयुक्त राष्ट्र का मानना है कि अब लेबनान की सरकार को खुद अपनी सुरक्षा व्यवस्था को संभालने और इजरायल के साथ स्थायी शांति स्थापित करने की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे।
यूनिफिल का यह सफर 50 साल के करीब रहा है और इस दौरान उसने हजारों सैनिकों और अधिकारियों को क्षेत्र में तैनात किया। कई बार इन शांति सैनिकों ने अपनी जान भी गंवाई,लेकिन उनका योगदान यह साबित करता है कि संयुक्त राष्ट्र की शांति सेनाएँ वैश्विक स्थिरता में कितनी अहम भूमिका निभाती हैं। अब जब यह मिशन अपने अंत की ओर है,तो लेबनान और इजरायल के भविष्य को लेकर कई सवाल खड़े हो गए हैं।
2026 तक यूनिफिल की उपस्थिति इस बात का अवसर होगी कि दोनों देश युद्धविराम और सीमा सुरक्षा को स्थायी स्वरूप दें। यदि ऐसा हो पाया तो यूनिफिल की यह लंबी यात्रा अपने उद्देश्य में सफल कही जाएगी,लेकिन अगर क्षेत्रीय तनाव जारी रहा,तो इसकी वापसी के बाद स्थिति और भी जटिल हो सकती है। फिलहाल, संयुक्त राष्ट्र ने साफ संकेत दे दिया है कि लेबनान में शांति सेना का युग अब अपने अंतिम पड़ाव पर है।