अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप

वेनेजुएला के प्रतिबंधित तेल पर ट्रंप की घोषणा से वैश्विक ऊर्जा समीकरण बदलने के संकेत

वाशिंगटन,7 जनवरी (युआईटीवी)- अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वेनेजुएला से जुड़े तेल समझौते पर बड़ा बयान देकर अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में नई हलचल पैदा कर दी है। ट्रंप ने कहा है कि वेनेजुएला की अंतरिम सरकार अमेरिका को 30 से 50 मिलियन बैरल तक प्रतिबंधित तेल सौंपेगी। उनके अनुसार यह कदम न केवल अमेरिका,बल्कि वेनेजुएला के नागरिकों के लिए भी लाभकारी साबित होगा। इस घोषणा के साथ ही यह संकेत मिल रहा है कि आने वाले महीनों में तेल व्यापार की दिशा और रणनीति में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।

ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर विस्तृत पोस्ट में लिखा कि वेनेजुएला का यह तेल बाजार भाव पर बेचा जाएगा और वह खुद इस बात की निगरानी करेंगे कि तेल बिक्री से मिलने वाला राजस्व कैसे खर्च किया जाता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इस रकम का उपयोग वेनेजुएला और संयुक्त राज्य अमेरिका दोनों देशों के लोगों के कल्याण के लिए किया जाएगा। ट्रंप का दावा है कि इससे आर्थिक स्थिरता, ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय शांति को मजबूती मिलेगी।

राष्ट्रपति ट्रंप ने इस योजना को तत्काल प्रभाव से लागू करने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने बताया कि ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट को आदेश दिया गया है कि तेल को स्टोरेज जहाजों पर लोड कर सीधे अमेरिकी तटों तक पहुँचाया जाए,जहाँ इसे अनलोड कर रिफाइनरियों में भेजा जाएगा। इस दौरान उन्होंने यह दोहराया कि तेल बाजार कीमत पर ही बेचा जाएगा और उससे जुड़े वित्तीय नियंत्रण का अंतिम अधिकार राष्ट्रपति कार्यालय के पास रहेगा। उनकी इस स्पष्टता को वैश्विक स्तर पर अमेरिकी प्रभाव के पुनर्संयोजन के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

यह घोषणा उस समय आई है,जब हाल ही में वेनेजुएला की राजनीतिक स्थिति में बड़ा बदलाव देखने को मिला। रिपोर्टों के अनुसार,अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के बाद वेनेजुएला के नेता निकोलस मादुरो को हिरासत में लिया गया और काराकस में सत्ता परिवर्तन हुआ। ट्रंप पहले भी यह कह चुके हैं कि अब वेनेजुएला में तेल और व्यापार संबंधी कई शर्तें अमेरिका की निगरानी में तय होंगी। वेनेजुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा प्रमाणित कच्चे तेल का भंडार है,लेकिन लंबे समय से प्रतिबंधों,कुप्रबंधन और निवेश की कमी के कारण उसका तेल उत्पादन घटता चला गया। ऐसे में यह समझौता वेनेजुएला के तेल क्षेत्र के पुनर्गठन की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है।

भारत के लिए भी यह खबर महत्वपूर्ण है। एक समय भारत वेनेजुएला का बड़ा तेल आयातक था,लेकिन 2019 में अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते भारतीय रिफाइनरियों को वहां से खरीद बंद करनी पड़ी। इसके बाद भारत को अपनी ऊर्जा रणनीति में बदलाव करते हुए मध्य पूर्व,रूस और अमेरिका से अधिक तेल आयात करना पड़ा। यदि ट्रंप द्वारा घोषित योजना लागू होती है और वेनेजुएला के तेल का बड़ा हिस्सा अमेरिकी बाजार की ओर मुड़ता है,तो भारतीय ऊर्जा नीति पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है,क्योंकि विश्व बाजार में कीमतों और आपूर्ति दोनों में उतार-चढ़ाव संभव है।

ऊर्जा विशेषज्ञों के अनुसार,वेनेजुएला का भारी कच्चा तेल खास तौर पर अमेरिका के खाड़ी तट पर स्थित रिफाइनरियों के अनुकूल है। इन रिफाइनरियों को पहले लैटिन अमेरिका और कनाडा से मिलने वाले भारी तेल पर निर्भर रहना पड़ता था। अब यदि वेनेजुएला का तेल सीधे इन रिफाइनरियों तक पहुँचता है,तो अमेरिकी ऊर्जा कंपनियों को स्थिर और किफायती आपूर्ति मिल सकती है। इस कदम से अमेरिका अपने घरेलू ईंधन बाजार पर नियंत्रण बढ़ा सकता है और अंतर्राष्ट्रीय दबावों के प्रति अधिक लचीला बन सकता है।

दूसरी ओर,इस समझौते का असर चीन पर भी पड़ सकता है,जो हाल के वर्षों में वेनेजुएला का सबसे बड़ा तेल खरीदार बनकर उभरा था। यदि तेल का बड़ा हिस्सा अमेरिका की ओर मोड़ दिया जाता है,तो चीन तक पहुँचने वाली आपूर्ति घट सकती है। वैश्विक आपूर्ति तंत्र में यह फेरबदल कीमतों में अस्थिरता ला सकता है और कई देशों को अपनी ऊर्जा रणनीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर सकता है। विशेषकर उन देशों के लिए चुनौती बढ़ सकती है जो पहले से ही आयात-निर्भर हैं और बढ़ती भू-राजनीतिक तनातनी के बीच स्थिर आपूर्ति की तलाश में हैं।

ट्रंप ने इस समझौते को केवल आर्थिक नहीं,बल्कि रणनीतिक निर्णय बताया है। उनके मुताबिक,वेनेजुएला के तेल पर अमेरिका का अधिक नियंत्रण होने से अवैध नेटवर्क और तस्करी जैसे अपराधी ढाँचे कमजोर होंगे। साथ ही,क्षेत्रीय स्थिरता में सुधार आएगा और लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूती मिलेगी। ट्रंप ने दावा किया कि इस योजना को बिना देरी के लागू किया जाएगा और जल्द ही इसके सकारात्मक नतीजे दिखने लगेंगे। हालाँकि,अंतर्राष्ट्रीय विश्लेषकों का कहना है कि इतनी जटिल योजना में कानूनी,राजनीतिक और लॉजिस्टिक चुनौतियाँ भी सामने आ सकती हैं,जिन्हें सँभालना आसान नहीं होगा।

वेनेजुएला के इतिहास को देखते हुए यह फैसला वहाँ की आंतरिक राजनीति पर भी गहरा असर डाल सकता है। अंतरिम सरकार के लिए यह अवसर आर्थिक संसाधन जुटाने और जनता का भरोसा जीतने का हो सकता है,लेकिन साथ ही यह आलोचना भी बढ़ा सकता है कि देश के प्राकृतिक संसाधनों पर बाहरी नियंत्रण बढ़ रहा है। अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भी यह प्रश्न उठ सकता है कि प्रतिबंधित संसाधनों के पुनर्नियोजन में किस हद तक पारदर्शिता और वैधानिकता का पालन किया जा रहा है।

वैश्विक ऊर्जा बाजार पहले ही कई अनिश्चितताओं से जूझ रहा है—रूस-यूक्रेन युद्ध, मध्य पूर्व में तनाव और जलवायु नीतियों के चलते निवेश के रुझान बदल रहे हैं। ऐसे में वेनेजुएला से संबंधित यह नया अध्याय बाजार में नई अस्थिरता ला सकता है। कच्चे तेल की कीमतें यदि नीचे जाती हैं,तो उपभोक्ता देशों को राहत मिलेगी,लेकिन उत्पादक देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव बढ़ सकता है। वहीं,कीमतों में उछाल आने पर विकासशील देशों की महंगाई और चालू खाता घाटा दोनों प्रभावित हो सकते हैं।

भारत जैसे देशों की नजर इस पूरी प्रक्रिया पर टिकी है। ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका और वेनेजुएला के बीच यह व्यवस्था स्थिर रहती है,तो भारत को अपनी खरीदारी का पोर्टफोलियो फिर से संतुलित करना होगा। साथ ही,दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा के लिए वैकल्पिक स्रोतों और नवीकरणीय ऊर्जा पर ध्यान बढ़ाना पड़ सकता है। भारत ने पहले भी वैश्विक उतार-चढ़ाव का सामना करते हुए अपने आयात मार्गों में विविधता लाई है,लेकिन मौजूदा परिस्थिति अधिक जटिल और जोखिमपूर्ण दिखाई दे रही है।

ट्रंप की घोषणा ने फिलहाल अंतर्राष्ट्रीय राजनीति और ऊर्जा कूटनीति को एक साथ जोड़ दिया है। जहाँ एक तरफ इस कदम को अवसर के रूप में देखा जा रहा है,वहीं दूसरी ओर इससे जुड़े जोखिमों और संभावित विवादों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि वेनेजुएला के प्रतिबंधित तेल का यह समझौता वैश्विक बाजार के लिए राहत बनता है या नई अस्थिरता की शुरुआत। इतना तय है कि इस कदम ने तेल राजनीति के समीकरणों को नए सिरे से परिभाषित कर दिया है और दुनिया भर के नीति-निर्माता इसकी दिशा पर पैनी नजर बनाए हुए हैं।