इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी (तस्वीर क्रेडिट@ocjain4)

पाम संडे पर यरूशलम में विवाद: चर्च में प्रवेश से रोके गए पादरी,इटली ने जताई कड़ी आपत्ति

रोम/यरूशलम,30 मार्च (युआईटीवी)- मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच एक नया विवाद सामने आया है,जिसने धार्मिक स्वतंत्रता और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति को लेकर बहस को तेज कर दिया है। रविवार को पाम संडे के पवित्र अवसर पर इज़रायल की पुलिस ने प्रमुख ईसाई धर्मगुरुओं को चर्च ऑफ द होली सेपल्चर में प्रवेश करने से रोक दिया। इस घटना ने न केवल स्थानीय स्तर पर,बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी तीखी प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न की हैं,खासकर इटली ने इस पर गंभीर आपत्ति दर्ज कराई है।

रिपोर्ट के अनुसार,यरूशलम में स्थित इस ऐतिहासिक चर्च में पाम संडे मास के लिए जा रहे लैटिन पैट्रिआर्क पियरबातिस्ता पिज्जाबल्ला और होली लैंड के कस्टोस फ्रांसिस्को इएल्पो को इजरायली पुलिस ने रास्ते में ही रोक दिया। यह घटना उस समय हुई जब दोनों धार्मिक नेता बिना किसी सार्वजनिक जुलूस या बड़े आयोजन के निजी तौर पर मास के लिए जा रहे थे। चर्च प्रशासन का कहना है कि यह निर्णय पूरी तरह से अनुचित और अत्यधिक कठोर था।

लैटिन पैट्रिआर्केट ऑफ यरूशलम और कस्टडी ऑफ द होली लैंड ने एक संयुक्त बयान जारी कर इस कार्रवाई की कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा कि सदियों के इतिहास में यह पहली बार हुआ है,जब चर्च के शीर्ष धार्मिक नेताओं को पाम संडे जैसे महत्वपूर्ण दिन पर मास आयोजित करने से रोका गया है। इस घटना को उन्होंने धार्मिक स्वतंत्रता के सिद्धांतों के खिलाफ बताया और इसे “अनावश्यक प्रतिबंध” करार दिया।

इस विवाद पर इटली की प्रतिक्रिया बेहद तीखी रही है। इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने इस घटना को लेकर कड़ा बयान जारी किया। उन्होंने कहा कि पाम संडे जैसे पवित्र दिन पर धार्मिक नेताओं को रोकना न केवल आस्थावानों का अपमान है,बल्कि यह उन सभी समुदायों के लिए अपमानजनक है,जो धार्मिक स्वतंत्रता में विश्वास रखते हैं। उनके इस बयान ने इटली की नाराजगी को स्पष्ट रूप से सामने ला दिया।

इटली के विदेश मंत्री एंटोनियो तजानी ने भी इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए इसे “अस्वीकार्य” बताया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि इस तरह की कार्रवाई को किसी भी हालत में उचित नहीं ठहराया जा सकता। साथ ही उन्होंने इजरायल में तैनात इतालवी राजदूत को निर्देश दिए कि वे इस मामले में इटली की कड़ी आपत्ति और धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को तेल अवीव तक पहुँचायें। इसके तहत इजरायली दूत को तलब कर आधिकारिक रूप से विरोध दर्ज कराया गया।

यह घटना ऐसे समय में हुई है,जब मध्य पूर्व पहले से ही गंभीर तनाव से गुजर रहा है। ईरान और इजरायल के बीच जारी सैन्य संघर्ष के कारण यरूशलम सहित कई संवेदनशील क्षेत्रों में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। इसी वजह से पवित्र स्थलों पर भी कई प्रकार के प्रतिबंध लगाए गए हैं। कुछ दिन पहले ही लैटिन पैट्रिआर्केट ने सार्वजनिक पाम संडे जुलूस को रद्द कर दिया था और पवित्र सप्ताह के अन्य कार्यक्रमों को भी सीमित कर दिया गया था।

रविवार को होने वाला कार्यक्रम केवल निजी मास तक सीमित रखा गया था,ताकि किसी भी तरह की भीड़ या सुरक्षा जोखिम से बचा जा सके। इसके बावजूद धार्मिक नेताओं को चर्च तक पहुँचने से रोकना चर्च प्रशासन और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के लिए चौंकाने वाला कदम साबित हुआ। चर्च अधिकारियों का मानना है कि जब कार्यक्रम पहले ही सीमित कर दिया गया था,तब इस तरह का प्रतिबंध पूरी तरह से अनावश्यक था।

इस घटना पर वैश्विक स्तर पर भी नजर रखी जा रही है। वेटिकन और दुनिया भर के ईसाई समुदायों ने इस पर चिंता व्यक्त की है। पोप लियो ने भी मध्य पूर्व के ईसाइयों के साथ एकजुटता जताते हुए शांति और धार्मिक स्वतंत्रता की अपील की है। उनका यह संदेश इस बात का संकेत है कि यह मुद्दा केवल स्थानीय नहीं,बल्कि वैश्विक धार्मिक भावना से जुड़ा हुआ है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की घटनाएँ पहले से ही तनावपूर्ण माहौल को और अधिक जटिल बना सकती हैं। यरूशलम,जो तीन प्रमुख धर्मों—यहूदी, ईसाई और इस्लाम के लिए पवित्र स्थल है,वहाँ इस प्रकार के विवादों का असर व्यापक हो सकता है। धार्मिक स्थलों पर किसी भी तरह का प्रतिबंध या हस्तक्षेप अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर संवेदनशील मुद्दा बन जाता है।

कुल मिलाकर,पाम संडे के दिन हुई यह घटना न केवल धार्मिक स्वतंत्रता पर सवाल खड़े करती है,बल्कि यह भी दर्शाती है कि वर्तमान भू-राजनीतिक तनाव का असर अब धार्मिक आयोजनों और परंपराओं पर भी पड़ने लगा है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इस विवाद को कैसे सुलझाया जाता है और क्या इससे क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों पर कोई दीर्घकालिक प्रभाव पड़ता है।