व्हाट्सएप

व्हाट्सएप प्राइवेसी पॉलिसी पर सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई,सीसीआई के 213.14 करोड़ जुर्माने को मेटा और व्हाट्सएप ने दी चुनौती

नई दिल्ली,23 फरवरी (युआईटीवी)- देश की शीर्ष अदालत सोमवार को मेटा प्लेटफॉर्म और व्हाट्सएप द्वारा दायर उन याचिकाओं पर सुनवाई करने जा रही है,जिनमें दोनों कंपनियों ने भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग द्वारा लगाए गए 213.14 करोड़ रुपये के जुर्माने को चुनौती दी है। यह मामला व्हाट्सएप की प्राइवेसी पॉलिसी और उपयोगकर्ताओं के डेटा को मेटा के साथ साझा करने के मुद्दे से जुड़ा है,जिस पर पहले भी अदालत गंभीर टिप्पणियाँ कर चुकी है। इस सुनवाई को डिजिटल निजता और प्रतिस्पर्धा कानून के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है।

मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष होने की संभावना है। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली भी शामिल हैं। इससे पहले 3 फरवरी को हुई सुनवाई के दौरान अदालत ने मेटा और व्हाट्सएप पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा था कि डेटा शेयरिंग के नाम पर नागरिकों के निजता के अधिकार से खिलवाड़ नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया था कि डिजिटल प्लेटफॉर्म की व्यावसायिक नीतियाँ संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों से ऊपर नहीं हो सकतीं।

यह विवाद भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग के उस आदेश से जुड़ा है,जिसमें व्हाट्सएप की 2021 की प्राइवेसी पॉलिसी को प्रतिस्पर्धा कानून का उल्लंघन मानते हुए 213.14 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया गया था। आयोग का मानना था कि व्हाट्सएप ने अपनी बाजार में मजबूत स्थिति का दुरुपयोग करते हुए उपयोगकर्ताओं को नई डेटा शेयरिंग शर्तें स्वीकार करने के लिए बाध्य किया। आयोग के अनुसार,इससे प्रतिस्पर्धा प्रभावित हुई और उपभोक्ताओं की पसंद की स्वतंत्रता सीमित हुई।

सुनवाई के दौरान अदालत ने “साइलेंट कस्टमर्स” शब्द का उल्लेख करते हुए चिंता जताई थी। न्यायाधीशों ने कहा था कि बड़ी संख्या में ऐसे उपयोगकर्ता हैं,जो असंगठित क्षेत्र से आते हैं,डिजिटल माध्यमों पर निर्भर हैं और डेटा शेयरिंग नियमों के जटिल प्रभावों से अनभिज्ञ रहते हैं। अदालत ने कहा कि इन उपभोक्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना राज्य और नियामक संस्थाओं की जिम्मेदारी है। पीठ ने यह भी टिप्पणी की थी कि यदि कोई प्लेटफॉर्म एकाधिकार की स्थिति बनाता है और उपयोगकर्ताओं की निजी जानकारी का दुरुपयोग करता है, तो यह गंभीर चिंता का विषय है।

इस मामले में 4 नवंबर 2025 को नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल ने आंशिक राहत देते हुए सीसीआई के आदेश के उस हिस्से को रद्द कर दिया था,जिसमें व्हाट्सएप को पाँच साल तक विज्ञापन उद्देश्यों के लिए मेटा के साथ यूजर डेटा साझा करने से रोका गया था। हालाँकि,ट्रिब्यूनल ने आर्थिक जुर्माने को बरकरार रखा था। ट्रिब्यूनल का कहना था कि डेटा साझा करने पर पूर्ण प्रतिबंध प्रतिस्पर्धा के संतुलन और व्यापारिक स्वतंत्रता के दृष्टिकोण से अत्यधिक कठोर हो सकता है,लेकिन जुर्माना उचित पाया गया।

बाद में एनसीएलएटी ने यह भी स्पष्ट किया कि गोपनीयता और सहमति से जुड़े सुरक्षा प्रावधानों पर उसका निर्णय केवल व्हाट्सएप तक सीमित नहीं है,बल्कि अन्य उद्देश्यों के लिए यूजर डेटा के संग्रह और साझा करने पर भी लागू होगा। इसमें विज्ञापन और गैर-विज्ञापन दोनों गतिविधियाँ शामिल हैं। इस व्याख्या के बाद मामला और जटिल हो गया,क्योंकि इससे डेटा संरक्षण और प्रतिस्पर्धा कानून के बीच संतुलन का प्रश्न उठ खड़ा हुआ।

मेटा और व्हाट्सएप ने अपनी अपील में तर्क दिया है कि उनकी प्राइवेसी पॉलिसी पारदर्शी है और उपयोगकर्ताओं को स्पष्ट जानकारी दी गई थी। कंपनियों का कहना है कि डेटा साझा करने की प्रक्रिया वैध व्यावसायिक मॉडल का हिस्सा है और इससे उपभोक्ताओं को बेहतर सेवाएँ उपलब्ध कराई जाती हैं। उनका यह भी कहना है कि सीसीआई ने प्रतिस्पर्धा कानून की व्याख्या करते समय तकनीकी और वैश्विक डिजिटल परिदृश्य को पर्याप्त रूप से ध्यान में नहीं रखा।

वहीं,सीसीआई ने सुप्रीम कोर्ट में क्रॉस-अपील दायर कर एनसीएलएटी के उस फैसले को चुनौती दी है,जिसमें व्हाट्सएप और मेटा को विज्ञापन उद्देश्यों के लिए यूजर डेटा साझा करने की अनुमति दी गई थी। आयोग का तर्क है कि डेटा का व्यापक साझा करना बाजार में अनुचित लाभ देता है और प्रतिस्पर्धा को कमजोर करता है। आयोग ने यह भी कहा है कि डिजिटल अर्थव्यवस्था में डेटा ही नई पूँजी है और इसका अनियंत्रित उपयोग उपभोक्ताओं के अधिकारों को प्रभावित कर सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने पहले संकेत दिया था कि वह 9 फरवरी को अंतरिम आदेश पारित करेगा। अदालत ने इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को भी इस मामले में पक्षकार बनाने का निर्देश दिया था,ताकि डेटा संरक्षण और डिजिटल नीति के व्यापक पहलुओं पर सरकार का दृष्टिकोण सामने आ सके। यह निर्देश इस बात का संकेत है कि अदालत इस विवाद को केवल प्रतिस्पर्धा कानून के दायरे में सीमित नहीं रखना चाहती,बल्कि इसे व्यापक डिजिटल अधिकारों और नीति के संदर्भ में देख रही है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला भारत में डेटा संरक्षण कानूनों के भविष्य और डिजिटल बाजार की संरचना को प्रभावित कर सकता है। यदि सुप्रीम कोर्ट सीसीआई के जुर्माने को बरकरार रखता है,तो यह डिजिटल कंपनियों के लिए सख्त संदेश होगा कि वे अपनी डेटा नीतियों को उपभोक्ता अधिकारों और प्रतिस्पर्धा कानून के अनुरूप बनाएँ। वहीं, यदि कंपनियों को राहत मिलती है,तो नियामक संस्थाओं की शक्तियों और सीमाओं पर नई बहस शुरू हो सकती है।

फिलहाल सभी की नजरें सुप्रीम कोर्ट की आगामी सुनवाई पर टिकी हैं। यह फैसला न केवल मेटा और व्हाट्सएप के लिए महत्वपूर्ण होगा,बल्कि करोड़ों भारतीय डिजिटल उपयोगकर्ताओं के निजता अधिकारों और डेटा सुरक्षा के भविष्य को भी दिशा देगा।