वाशिंगटन,3 अप्रैल (युआईटीवी)- अमेरिका ने अपनी व्यापार और स्वास्थ्य सुरक्षा नीति में एक बड़ा बदलाव करते हुए आयातित पेटेंट दवाओं पर भारी शुल्क लगाने का ऐलान किया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस फैसले को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ते हुए कहा है कि विदेशी आपूर्ति शृंखलाओं पर बढ़ती निर्भरता अमेरिका के लिए एक गंभीर जोखिम बन चुकी है। इस नई नीति के तहत अधिकांश आयातित पेटेंट दवाओं और उनसे जुड़े सक्रिय औषधीय घटकों (एपीआई) पर 100 प्रतिशत तक का शुल्क लगाया जाएगा,जो वैश्विक दवा व्यापार में एक बड़े बदलाव का संकेत माना जा रहा है।
राष्ट्रपति ट्रंप ने अपनी घोषणा में स्पष्ट किया कि दवाइयाँ और उनके घटक इतनी बड़ी मात्रा में और ऐसी परिस्थितियों में अमेरिका में आयात किए जा रहे हैं कि वे देश की राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित कर सकते हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि किसी भू-राजनीतिक या आर्थिक संकट की स्थिति उत्पन्न होती है,तो विदेशी उत्पादन पर निर्भरता के कारण जीवन रक्षक दवाओं की आपूर्ति बाधित हो सकती है। इस बयान ने यह साफ कर दिया कि यह कदम केवल आर्थिक नीति नहीं बल्कि रणनीतिक और सुरक्षा दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है।
नई नीति के तहत अधिकांश आयातित पेटेंट दवाओं पर मूल्य-आधारित यानी एड वैलोरेम शुल्क लगाया जाएगा,जिसकी दर 100 प्रतिशत तक हो सकती है। हालाँकि,प्रशासन ने कंपनियों को एक विकल्प भी दिया है। जो कंपनियाँ अपने उत्पादन को अमेरिका में स्थानांतरित करने का वादा करेंगी,उन्हें शुरुआती तौर पर केवल 20 प्रतिशत शुल्क देना होगा,जो चार वर्षों के भीतर बढ़ाकर 100 प्रतिशत कर दिया जाएगा। इस प्रावधान का उद्देश्य स्पष्ट रूप से घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहित करना और कंपनियों को अमेरिका में निवेश के लिए प्रेरित करना है।
इस नीति में कुछ देशों और दवा श्रेणियों के लिए विशेष प्रावधान भी किए गए हैं। यूरोपीय संघ,जापान,दक्षिण कोरिया और स्विट्ज़रलैंड जैसे प्रमुख व्यापारिक साझेदारों से आने वाली दवाओं पर अपेक्षाकृत कम,लगभग 15 प्रतिशत शुल्क लगाया जाएगा। इसके अलावा अनाथ दवाओं,परमाणु चिकित्सा में उपयोग होने वाली दवाओं और जीन थेरेपी जैसी विशेष श्रेणियों को इस शुल्क से पूरी तरह छूट दी गई है। यह छूट उन क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है,जहाँ अनुसंधान और नवाचार की भूमिका अधिक होती है और वैश्विक सहयोग आवश्यक होता है।
फिलहाल जेनेरिक दवाओं और बायोसिमिलर्स को इस नई शुल्क व्यवस्था से बाहर रखा गया है। प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि इन दवाओं पर अभी कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं लगाया जाएगा। यह निर्णय महत्वपूर्ण है क्योंकि जेनेरिक दवाएँ आम लोगों के लिए सस्ती स्वास्थ्य सेवाओं का आधार हैं और इन पर शुल्क लगाने से दवाओं की कीमतों में भारी वृद्धि हो सकती थी। हालाँकि,विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में यदि इस नीति का दायरा बढ़ाया गया,तो इसका असर व्यापक हो सकता है।
व्हाइट हाउस में अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जैमिसन ग्रीर ने इस नीति के व्यापक उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए कहा कि यह केवल शुल्क बढ़ाने का मामला नहीं है,बल्कि दीर्घकालिक आपूर्ति शृंखला पुनर्गठन का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि अमेरिका उन समझौतों पर काम कर रहा है,जिनसे उत्पादन को देश के भीतर लाया जा सके और आपूर्ति शृंखलाओं को अधिक सुरक्षित बनाया जा सके। ग्रीर के अनुसार,इस दिशा में पहले से ही सकारात्मक संकेत मिल रहे हैं और कई कंपनियाँ अमेरिका में नए फार्मास्युटिकल संयंत्र स्थापित करने की दिशा में कदम उठा रही हैं।
यह शुल्क 31 जुलाई 2026 से चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाएगा। कुछ कंपनियों को उनके मौजूदा अनुबंधों और निवेश योजनाओं के आधार पर समयसीमा में छूट भी दी जा सकती है। यह लचीलापन इसलिए दिया गया है,ताकि कंपनियाँ अचानक होने वाले बदलाव से प्रभावित न हों और उन्हें अपने उत्पादन ढाँचे को समायोजित करने का समय मिल सके।
इस फैसले का वैश्विक दवा बाजार पर व्यापक प्रभाव पड़ने की संभावना है। खासतौर पर उन देशों पर इसका असर अधिक होगा,जो अमेरिका को दवाओं और कच्चे माल की बड़ी मात्रा में आपूर्ति करते हैं। भारत और चीन जैसे देश इस क्षेत्र में अग्रणी हैं और अमेरिकी बाजार में उनकी महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है। हालाँकि,अभी जेनेरिक दवाओं को छूट दी गई है, लेकिन यदि भविष्य में इन पर भी शुल्क लगाया गया,तो इससे वैश्विक दवा कीमतों और आपूर्ति शृंखलाओं में बड़ा बदलाव आ सकता है।
इस नीति को लागू करने के लिए अमेरिकी प्रशासन ने ट्रेड एक्सपेंशन एक्ट की धारा 232 का उपयोग किया है। यह प्रावधान राष्ट्रपति को उन आयातों पर प्रतिबंध लगाने की अनुमति देता है,जिन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा माना जाता है। इससे पहले इस कानून का उपयोग स्टील और एल्यूमिनियम पर शुल्क लगाने के लिए किया गया था,लेकिन अब इसे दवा क्षेत्र तक विस्तारित करना एक बड़ा नीतिगत परिवर्तन माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम अमेरिका की “आत्मनिर्भरता” की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है। कोविड-19 महामारी के दौरान वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में आई बाधाओं ने यह दिखा दिया था कि दवाओं और चिकित्सा उपकरणों के लिए विदेशी निर्भरता कितनी जोखिमपूर्ण हो सकती है। इसी अनुभव के आधार पर अमेरिका अब अपने घरेलू उत्पादन को मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
हालाँकि,इस फैसले को लेकर कुछ चिंताएँ भी सामने आई हैं। आलोचकों का कहना है कि उच्च शुल्क से दवाओं की कीमतों में वृद्धि हो सकती है,जिससे आम उपभोक्ताओं पर बोझ बढ़ेगा। इसके अलावा यह कदम वैश्विक व्यापार संबंधों में तनाव भी पैदा कर सकता है, खासकर उन देशों के साथ जो अमेरिकी बाजार पर निर्भर हैं।
आयातित पेटेंट दवाओं पर 100 प्रतिशत तक शुल्क लगाने का यह निर्णय अमेरिका की व्यापार और सुरक्षा नीति में एक बड़ा बदलाव है। यह न केवल घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने का प्रयास है,बल्कि वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं को पुनर्गठित करने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस नीति का वैश्विक दवा उद्योग,कीमतों और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संबंधों पर क्या प्रभाव पड़ता है।
