यरूशलम,22 मई (युआईटीवी)- इजरायल की राजनीति और सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ा एक बड़ा संवैधानिक संकट अब एक निर्णायक मोड़ पर पहुँच चुका है। इजरायल की सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक अहम फैसला सुनाते हुए शिन बेट यानी इजरायल की घरेलू सुरक्षा एजेंसी के निदेशक रोनेन बार को बर्खास्त करने के सरकार के फैसले को “अवैध और कानून के विरुद्ध” करार दिया है। इस फैसले ने प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की नीयत, प्रक्रिया और न्यायिक संतुलन पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं।
मामला मार्च 2024 का है,जब प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने यह कहते हुए रोनेन बार को पद से हटाने की घोषणा की थी कि उन्होंने बार पर से “भरोसा खो दिया है”। यह कदम ऐसे समय उठाया गया,जब नेतन्याहू “कतर-गेट” नामक एक संवेदनशील जाँच के घेरे में आ चुके थे। यह जाँच उनके करीबी सहयोगियों और कतर सरकार के बीच कथित गुप्त संवादों से जुड़ी थी।
साथ ही,7 अक्टूबर 2023 को हमास द्वारा इजरायल पर किए गए हमले को रोकने में विफलता के कारण नेतन्याहू और बार के बीच पहले से ही मतभेद थे। यह माना जा रहा था कि शिन बेट ने समय रहते हमले की चेतावनी नहीं दी,जिससे बार पर दबाव बढ़ा।
इजरायल की सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ ने बुधवार को दिए अपने फैसले में कहा कि बार की बर्खास्तगी की प्रक्रिया “गंभीर रूप से त्रुटिपूर्ण” थी और यह “न्यायसंगत प्रक्रिया और कानूनी दायरे का उल्लंघन” थी। कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि, नेतन्याहू सरकार ने बार की बर्खास्तगी को सलाहकार समिति के सामने प्रस्तुत नहीं किया,जो कि अनिवार्य था। बार को कानूनी रूप से आवश्यक सुनवाई का मौका नहीं दिया गया। सबसे अहम बात यह कही गई कि नेतन्याहू की स्थिति “हितों के टकराव” में थी,क्योंकि कतर-गेट और एक अन्य गोपनीय दस्तावेज लीक मामले में उनके सहयोगियों के खिलाफ जाँच चल रही थी। बार इन जाँचों में एक प्रमुख गवाह और अधिकारी हैं।
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश यित्ज़ाक अमित ने अपने फैसले में लिखा, “प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने स्वयं स्वीकार किया है कि कतर-गेट और अन्य जाँच उनकी राजनीतिक और व्यक्तिगत स्थिति को प्रभावित कर सकती हैं। ऐसे में,बार को हटाना सीधे इन जाँचों को प्रभावित कर सकता है।”
जज अमित के अनुसार,इस प्रकार का हस्तक्षेप न केवल बार की भूमिका को बाधित करता,बल्कि जाँच की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाता। इसलिए,प्रधानमंत्री को कानूनी रूप से बार को पद से हटाने का अधिकार नहीं था।
हालाँकि,कोर्ट में मामला लंबित था,इस बीच रोनेन बार ने अप्रैल के अंत में घोषणा की कि वे 15 जून 2024 को स्वेच्छा से इस्तीफा देंगे। इसके ठीक अगले दिन,इजरायल सरकार ने बर्खास्तगी के फैसले को रद्द कर दिया और सुप्रीम कोर्ट से याचिकाओं को खारिज करने की अपील की।
सरकार का तर्क था कि अब जबकि बार ने स्वयं इस्तीफा दे दिया है, तो याचिकाएँ “अप्रासंगिक” हो गई हैं,लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि प्रक्रिया का उल्लंघन पहले ही हो चुका था और न्यायिक समीक्षा जरूरी थी।
“कतर-गेट” एक राजनीतिक घोटाले का नाम है,जिसमें यह आरोप लगाया गया है कि नेतन्याहू के निकट सहयोगियों ने कतर सरकार के साथ गुप्त समझौते और संवाद किए,जिनका उद्देश्य कतर के राजनीतिक और आर्थिक हितों को इजरायल में बढ़ावा देना था। कतर ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज किया है और उन्हें “बेबुनियाद और राजनीतिक रूप से प्रेरित” बताया है।
इजरायल के प्रमुख न्यूज़ चैनल चैनल 12 ने रिपोर्ट किया है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब नेतन्याहू को बार के उत्तराधिकारी की घोषणा करने का अधिकार मिल गया है,लेकिन यह तभी संभव होगा,जब बार औपचारिक रूप से 15 जून को इस्तीफा दे देंगे।
बार की बर्खास्तगी के समय इजरायल की अटॉर्नी जनरल गली बहारव-मियारा और कई विपक्षी नेताओं ने इसे राजनीतिक प्रतिशोध बताया और सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। उनका तर्क था कि बार को हटाने का प्रयास नेतन्याहू के खिलाफ चल रही जाँच को कमजोर करने की मंशा से किया गया।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय अब विपक्ष के लिए एक बड़ी जीत मानी जा रही है और इसे लोकतंत्र की रक्षा में एक निर्णायक कदम बताया जा रहा है।
इस पूरे प्रकरण ने इजरायल में सत्ता के दुरुपयोग,सुरक्षा एजेंसियों की स्वतंत्रता और न्यायपालिका की भूमिका पर नई बहस छेड़ दी है। सुप्रीम कोर्ट का यह साहसिक फैसला यह संकेत देता है कि चाहे प्रधानमंत्री ही क्यों न हो,कानून के ऊपर कोई नहीं है।
रोनेन बार जैसे वरिष्ठ अधिकारी को हटाना यदि राजनीतिक कारणों से प्रेरित हो,तो यह न केवल संस्थाओं की स्वतंत्रता को नुकसान पहुँचाता है,बल्कि लोकतंत्र की आत्मा को भी आघात देता है। इजरायल की सुप्रीम कोर्ट ने यह संदेश स्पष्ट रूप से दिया है कि “लोकतंत्र केवल चुनाव से नहीं चलता,बल्कि संस्थागत जवाबदेही और प्रक्रिया की पवित्रता से चलता है।”
अब देखना यह है कि क्या रोनेन बार 15 जून को अपने इस्तीफे पर कायम रहते हैं, या सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद स्थिति में कोई नया मोड़ आता है। एक बात तो तय है कि नेतन्याहू सरकार के लिए यह फैसला एक राजनीतिक झटका है और आगे के निर्णयों में उन्हें अधिक संवैधानिक सावधानी बरतनी होगी।
