अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप

वाशिंगटन डीसी में इजरायली दूतावास के दो कर्मचारियों की हत्या पर डोनाल्ड ट्रंप ने कहा- ‘नफरत और कट्टरता की अमेरिका में कोई जगह नहीं’

वाशिंगटन,22 मई (युआईटीवी)- वाशिंगटन डीसी में बुधवार देर रात एक भयावह और चौंकाने वाली घटना घटी। अमेरिका की राजधानी में स्थित “कैपिटल यहूदी संग्रहालय” के बाहर इजरायल दूतावास के दो कर्मचारियों की गोली मारकर हत्या कर दी गई। अमेरिकी अधिकारियों ने इसे यहूदी-विरोधी भावना से प्रेरित एक घृणास्पद अपराध करार दिया है और इसकी जाँच कई एजेंसियों द्वारा शुरू कर दी गई है।

अमेरिकी होमलैंड सिक्योरिटी के मुताबिक, इजरायली दूतावास के दो कर्मचारी – एक पुरुष और एक महिला जब संग्रहालय से बाहर निकल रहे थे,तभी एक अज्ञात हमलावर ने उन पर गोलियाँ चला दीं। हमलावर की पहचान अभी नहीं हो सकी है और वह घटना के बाद फरार हो गया। हमले के पीछे की मंशा स्पष्ट रूप से यहूदी-विरोधी मानी जा रही है। इस भयावह घटना ने पूरे अमेरिका और विशेषकर यहूदी समुदाय में गुस्सा और भय फैला दिया है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस हमले की तीखी निंदा की है। उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म “ट्रुथ सोशल” पर पोस्ट करते हुए लिखा, “डीसी में हुए ये भयानक हत्याएँ,जो साफ तौर पर यहूदी-विरोधी हैं,अब बंद होनी चाहिए। अमेरिका में नफरत और कट्टरता के लिए कोई जगह नहीं है। पीड़ितों के परिवारों के प्रति मेरी गहरी संवेदना है। यह बहुत ही दुखद है कि इस प्रकार की घटनाएँ अब भी हो रही हैं। भगवान आप सभी की रक्षा करें।”

ट्रंप का यह बयान अमेरिका में बढ़ती यहूदी-विरोधी घटनाओं को लेकर चिंता का संकेत देता है। उन्होंने अपने पोस्ट में न केवल संवेदना जताई,बल्कि यह स्पष्ट भी किया कि ऐसे घृणास्पद कृत्य अब बर्दाश्त नहीं किए जाएँगे।

अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भी इस घटना की कड़ी आलोचना की। उन्होंने इसे “कायराना और यहूदी-विरोधी हिंसा का निंदनीय कृत्य” बताया और कहा कि अमेरिका ऐसे किसी भी अपराध को नजरअंदाज नहीं करेगा और अपराधियों को खोजकर न्याय के कठघरे में लाया जाएगा।

उन्होंने कहा कि,”कोई गलती न करें,हमलावरों को हम ढूँढ निकालेंगे और उन्हें सजा दिलवाएँगे। अमेरिका में इस प्रकार की नफरत की कोई जगह नहीं है।”

इजरायल में अमेरिकी राजदूत माइक हुकाबी ने भी घटना पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने इसे “आतंक का भयानक कृत्य” बताया और बताया कि अमेरिकी अटॉर्नी जनरल पाम बोंडी भी घटना के तुरंत बाद घटनास्थल पर पहुँची और स्थिति का जायजा लिया।

वहीं संयुक्त राष्ट्र में इजरायल के राजदूत डैनी डैनन ने इस हमले को यहूदी-विरोधी आतंकवाद करार दिया। उन्होंने कहा, “यहूदी समुदाय पर हमला करना खतरे की रेखा पार करना है। यह केवल हमला नहीं है,यह इजरायल और यहूदी लोगों की अस्मिता पर सीधा हमला है।” उन्होंने उम्मीद जताई कि अमेरिकी प्रशासन इस मामले में सख्त कार्रवाई करेगा और इजरायल अपने नागरिकों की वैश्विक स्तर पर रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है।

वाशिंगटन डीसी स्थित इजरायली दूतावास के प्रवक्ता ताल नैम कोहेन ने भी इस हत्या की निंदा करते हुए कहा कि, “हमें स्थानीय और संघीय कानून प्रवर्तन एजेंसियों पर पूरा भरोसा है। हम उम्मीद करते हैं कि हमलावर को जल्द ही गिरफ्तार कर लिया जाएगा और अमेरिका में इजरायल के प्रतिनिधियों और यहूदी समुदाय की सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी।”

एफबीआई के निदेशक काश पटेल ने बताया कि उन्हें और उनकी टीम को इस शूटिंग की जानकारी दे दी गई है और वे मेट्रोपॉलिटन पुलिस डिपार्टमेंट (एमपीडी) के साथ मिलकर गहन जाँच कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि, “हम पीड़ितों और उनके परिवारों के लिए प्रार्थना कर रहे हैं। हमारी टीम इस मामले की हर कड़ी को खंगाल रही है और जनता को समय-समय पर जानकारी दी जाएगी।”

यह घटना ऐसे समय में हुई है,जब अमेरिका और इजरायल के बीच राजनीतिक और कूटनीतिक संबंध बेहद मजबूत हैं,लेकिन वैश्विक स्तर पर यहूदी समुदाय पर हो रहे हमले और कट्टरपंथी मानसिकता के बढ़ते खतरे ने अमेरिका को सतर्क कर दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह हमला एक बार फिर अमेरिका में यहूदी सुरक्षा पर सवाल खड़े करता है। साथ ही,इस घटना ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि अमेरिका अब इस तरह की घटनाओं को गंभीरता से ले रहा है। एफबीआई और अन्य एजेंसियों की त्वरित प्रतिक्रिया यह दिखाती है कि अब ऐसे अपराधों के प्रति ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति अपनाई जाएगी।

वाशिंगटन डीसी में इजरायली दूतावास के दो कर्मचारियों की हत्या केवल दो व्यक्तियों की जान जाना नहीं है,बल्कि यह एक समुदाय पर किया गया सुनियोजित हमला है। अमेरिका के उच्च अधिकारियों,इजरायली प्रतिनिधियों और एफबीआई जैसी एजेंसियों की तत्परता यह दर्शाती है कि अब नफरत और आतंक के खिलाफ वैश्विक मंच पर कड़ी कार्यवाही की जाएगी।

यह घटना दुनियाभर के यहूदी समुदाय के लिए एक चेतावनी है और लोकतांत्रिक देशों के लिए एक चुनौती कि वे इस प्रकार की विचारधारात्मक हिंसा को कैसे रोक सकते हैं। अमेरिका की न्याय प्रणाली पर अब सभी की निगाहें टिकी हैं।