वाशिंगटन,2 सितंबर (युआईटीवी)- अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर भारत के साथ अमेरिका के व्यापारिक संबंधों को लेकर तीखी टिप्पणी की है। सोमवार को अपने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म ‘ट्रुथ’ पर पोस्ट करते हुए ट्रंप ने नई दिल्ली और वाशिंगटन के बीच आर्थिक रिश्तों को ‘एकतरफा’ करार दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि भारत भारी मात्रा में अमेरिकी बाजार में सामान निर्यात करता है,जबकि अमेरिकी कंपनियों को भारतीय बाजार में प्रवेश के लिए ऊँचे टैरिफ और कड़े नियमों का सामना करना पड़ता है। ट्रंप की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है,जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चीन के तियानजिन शहर में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन में शामिल हुए हैं और वहाँ रूस व चीन के राष्ट्रपतियों के साथ द्विपक्षीय वार्ताएँ भी कर चुके हैं।
ट्रंप ने अपने पोस्ट में लिखा, “बहुत कम लोग जानते हैं कि हम भारत के साथ बहुत कम व्यापार करते हैं,लेकिन वे हमारे साथ बहुत अधिक व्यापार करते हैं। अमेरिका भारत का सबसे बड़ा ग्राहक है,जबकि हमारे कारोबारी उनके बाजार में प्रतिस्पर्धा ही नहीं कर पाते। वजह है वहाँ लगाए गए भारी टैरिफ और प्रशासनिक बाधाएँ।” उन्होंने दावा किया कि भारत ने दशकों से अमेरिकी कंपनियों के साथ असमान व्यापार संबंध बनाए रखे हैं और इस कारण अमेरिकी उद्योग जगत को लगातार घाटा झेलना पड़ा है।
अमेरिकी राष्ट्रपति का आरोप है कि भारत ने अब तक किसी भी देश की तुलना में सबसे अधिक टैरिफ लगाए हैं। ट्रंप के मुताबिक, “यह व्यापारिक असंतुलन कई दशकों से चला आ रहा है और अब अमेरिकी व्यवसायों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। भारत अमेरिकी वस्तुओं पर ऊँचे शुल्क लगाकर अपने उद्योगों को सुरक्षा देता है,जबकि हम उनके लिए दुनिया का सबसे खुला और आकर्षक बाजार बने हुए हैं।” उन्होंने यह भी कहा कि भारत ने हाल ही में टैरिफ कम करने की पेशकश जरूर की है,लेकिन अब ‘बहुत देर हो चुकी है।’
ट्रंप की यह नाराजगी सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं रही। उन्होंने भारत की रक्षा और ऊर्जा खरीद नीतियों पर भी सवाल उठाए। राष्ट्रपति ने कहा कि भारत अपने अधिकांश सैन्य उपकरण और तेल रूस से आयात करता है,जबकि अमेरिका से बहुत कम खरीद करता है। ट्रंप ने लिखा, “भारत अपने सुरक्षा ढाँचे और ऊर्जा आपूर्ति के लिए अमेरिका पर निर्भर होने की बजाय रूस पर भरोसा करता है। यह न केवल अनुचित है,बल्कि रणनीतिक दृष्टि से भी अमेरिका के हितों के खिलाफ है।”
यह पहली बार नहीं है,जब ट्रंप ने भारत की तेल नीति को निशाना बनाया हो। 4 अगस्त को भी उन्होंने रूस से बड़े पैमाने पर कच्चा तेल खरीदने को लेकर भारत पर चिंता जताई थी। तब उन्होंने आरोप लगाया था कि भारत खरीदे गए अधिकांश रूसी तेल को खुले बाजार में ऊँचे मुनाफे पर बेच रहा है,जिससे वैश्विक ऊर्जा संतुलन बिगड़ रहा है और रूस को भी आर्थिक लाभ मिल रहा है। ट्रंप के करीबी सलाहकार और पूर्व व्यापार अधिकारी पीटर नवारो तथा वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने भी भारत पर इसी तरह के आरोप लगाते हुए कई बार सार्वजनिक बयान दिए हैं। उनका कहना रहा है कि अमेरिका को भारत से अपेक्षा है कि वह रूस के बजाय वाशिंगटन को प्राथमिकता दे और ऊर्जा व रक्षा खरीद में बदलाव करे।
भारत ने हालाँकि इन आरोपों को खारिज किया है। नई दिल्ली का कहना है कि अमेरिकी सरकार भारत द्वारा लगाए गए शुल्कों को गलत तरीके से ‘अनुचित’ बता रही है। भारत का तर्क है कि अमेरिका भी कई श्रेणियों में 50 प्रतिशत तक टैरिफ लगाता है,जो उसके संरक्षणवादी रवैये को दर्शाता है। भारत के वाणिज्य मंत्रालय ने कहा है कि भारतीय बाजार में अमेरिकी कंपनियों को किसी भी अन्य विदेशी निवेशक की तरह ही अवसर दिए जाते हैं और टैरिफ संरचना अंतर्राष्ट्रीय नियमों के अनुरूप है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप की यह टिप्पणी आने वाले समय में भारत-अमेरिका संबंधों में नई चुनौती खड़ी कर सकती है। हाल के वर्षों में दोनों देशों के बीच रक्षा,तकनीकी सहयोग और रणनीतिक साझेदारी बढ़ी है,लेकिन व्यापार के मोर्चे पर मतभेद लगातार बने हुए हैं। टैरिफ,बाजार पहुँच और बौद्धिक संपदा जैसे मुद्दों पर दोनों पक्ष कई बार आमने-सामने आ चुके हैं। अब ट्रंप की ओर से सीधे तौर पर सोशल मीडिया के माध्यम से की गई आलोचना यह संकेत देती है कि आने वाले महीनों में व्यापारिक वार्ताओं में और तनाव देखने को मिल सकता है।
कूटनीतिक हलकों का मानना है कि ट्रंप की यह नाराजगी घरेलू राजनीति से भी जुड़ी हो सकती है। अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावी माहौल में अक्सर अंतर्राष्ट्रीय व्यापार असंतुलन को अपने एजेंडे का हिस्सा बनाते हैं और भारत जैसे बड़े निर्यातक देश पर दबाव बनाने की कोशिश करते हैं। दूसरी ओर,भारत की प्राथमिकता अपने ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण और रक्षा जरूरतों की पूर्ति है,जिसमें रूस लंबे समय से एक अहम भागीदार रहा है। अमेरिका चाहता है कि भारत अपनी निर्भरता रूस से कम करे,जबकि नई दिल्ली अपने रणनीतिक स्वायत्तता के सिद्धांत पर कायम रहना चाहती है।
इन तमाम बयानों और आरोप-प्रत्यारोपों के बीच यह स्पष्ट है कि भारत और अमेरिका के बीच व्यापार और रणनीतिक रिश्तों को लेकर असहमति गहराती जा रही है। हालाँकि,दोनों देश लोकतांत्रिक मूल्यों और वैश्विक स्थिरता के लिए एक-दूसरे के साझेदार माने जाते हैं,लेकिन आर्थिक और सामरिक नीतियों के सवाल पर खींचतान भविष्य में रिश्तों की दिशा तय करेगी।

