नई दिल्ली,17 नवंबर (युआईटीवी)- भारतीय क्रिकेट टीम को कोलकाता टेस्ट में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ वह हार मिली है,जिसे आने वाले वर्षों तक भूल पाना मुश्किल होगा। महज 124 रन का लक्ष्य होने के बावजूद टीम इंडिया 93 रनों पर ढेर हो गई और मैच 30 रन से गंवा बैठी। यह हार सिर्फ स्कोरबोर्ड पर दर्ज एक सामान्य पराजय नहीं है,बल्कि घरेलू धरती पर भारतीय टीम के रिकॉर्ड में दर्ज एक गहरे धब्बे की तरह है,क्योंकि यह टेस्ट इतिहास में भारत का घरेलू पिचों पर सबसे छोटा लक्ष्य है,जिसे टीम हासिल नहीं कर सकी।
सीरीज के पहले ही टेस्ट में मिली यह हार टीम इंडिया को 0–1 से पीछे धकेल चुकी है और अब श्रृंखला बचाना भी भारत के लिए चुनौती बन चुका है। खास बात यह है कि कोलकाता की यह पिच किसी भी तरह असाधारण या असामान्य नहीं थी। गेंदबाजों को मदद जरूर मिल रही थी,लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं था,जो भारतीय बल्लेबाजों को इस कदर बैकफुट पर ले आए। इसके बावजूद भारतीय बल्लेबाजों की नाकामी ने टीम को एक ऐसे छोटे लक्ष्य का पीछा करते हुए भी घुटनों पर ला दिया,जिसकी उम्मीद शायद खुद दक्षिण अफ्रीकी खेमे ने भी नहीं की होगी।
भारतीय टीम के रिकॉर्ड को देखें तो यह पहला मौका नहीं है,जब टीम कम लक्ष्य का पीछा करते हुए बुरी तरह लड़खड़ा गई हो। हाल के वर्षों में छोटे स्कोर का पीछा करते हुए असफलता एक ऐसी कड़वी सचाई बन गई है,जिसने टीम की चौथी पारी में बल्लेबाजी की कमजोरी को उजागर किया है। इससे पहले 2024 में मुंबई टेस्ट में न्यूजीलैंड के खिलाफ भारत 147 रन का सरल लक्ष्य हासिल नहीं कर पाया था। इसी साल हैदराबाद में इंग्लैंड के खिलाफ 242 रन का पीछा करते हुए भी भारतीय टीम धराशायी हो गई थी। इससे पहले 1987 में पाकिस्तान के खिलाफ बेंगलुरु में 221 रन और 1956 में कोलकाता में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ 231 रन का पीछा करते हुए टीम इंडिया नाकाम रही थी।
विदेशी पिचों पर भी ये कहानी कुछ अलग नहीं रही। 1997 में वेस्टइंडीज के खिलाफ ब्रिजटाउन टेस्ट में भारतीय टीम 120 रन जैसे आसान लक्ष्य को भी हासिल नहीं कर सकी थी। 2015 में गाले में श्रीलंका के खिलाफ 176 रन का लक्ष्य और 2018 में अंग्रेजी सरजमीं पर एजबेस्टन में 194 रन का पीछा करते हुए टीम इंडिया को हार का सामना करना पड़ा था। 2025 में लॉर्ड्स के मैदान पर इंग्लैंड के खिलाफ 193 रन का पीछा करते हुए भी भारत को पराजय मिली थी। ये आँकड़े बताते हैं कि चौथी पारी में भारतीय बल्लेबाजों का संघर्ष लंबे समय से जारी है और कोलकाता टेस्ट ने इस समस्या को और भी स्पष्ट रूप से सामने रख दिया है।
कोलकाता टेस्ट की बात करें,तो मैच की शुरुआत ऐसी नहीं थी,जिससे किसी भी टीम की जीत का अनुमान लगाना आसान हो। दक्षिण अफ्रीका ने टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी का फैसला किया,लेकिन भारतीय गेंदबाजों की घातक गेंदबाजी के सामने पूरी टीम 159 रन पर सिमट गई। भारत ने पहली पारी में संभलकर खेलते हुए 189 रन बनाए और 30 रनों की बढ़त अपने नाम की। उस स्थिति तक मैच भारतीय टीम की पकड़ में नजर आ रहा था,लेकिन दूसरी पारी में दक्षिण अफ्रीका ने संघर्षपूर्ण 153 रन बनाए और भारत के सामने केवल 124 रन का लक्ष्य रखा।
ऐसा लग रहा था कि भारत आसानी से यह लक्ष्य हासिल कर लेगा,लेकिन दक्षिण अफ्रीकी गेंदबाजों ने भारतीय बल्लेबाजी क्रम को तहस-नहस कर दिया। शुरुआत से ही भारतीय बल्लेबाज दबाव में नजर आए। विकेट नियमित अंतराल पर गिरते रहे और पूरी टीम 93 रन पर सिमट गई। दूसरी पारी में भारत की ओर से कोई भी बल्लेबाज टिककर नहीं खेल सका। दक्षिण अफ्रीका के गेंदबाजों ने बेहतरीन लाइन और लेंथ से भारतीय बल्लेबाजों को पूरी तरह दबोचा और मैच को भारत के हाथ से निकाल लिया।
इस हार ने भारतीय टीम की बल्लेबाजी की कमजोरी को एक बार फिर उजागर कर दिया है। खासकर चौथी पारी में भारतीय टीम की नाकामी अब चिंताजनक स्तर पर पहुँच रही है। टीम के अनुभवी खिलाड़ियों से लेकर युवा प्रतिभाओं तक,कोई भी खिलाड़ी इस छोटे लक्ष्य को हासिल करने की जिम्मेदारी उठाता नहीं दिखा। यह स्थिति टीम प्रबंधन और चयनकर्ताओं दोनों के लिए सोचने का विषय है।
यह हार भारतीय क्रिकेट के इतिहास में एक ऐसे अध्याय के रूप में दर्ज होगी,जहाँ आसान दिखने वाला लक्ष्य भी टीम के लिए एक दुर्ग बन गया। कोलकाता टेस्ट ने भारतीय टीम की तैयारी,मानसिक मजबूती और परिस्थितियों के अनुकूल ढलने की क्षमता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब श्रृंखला में वापसी करने के लिए टीम को न सिर्फ अपनी तकनीकी गलतियों को सुधारना होगा,बल्कि मानसिक रूप से भी मजबूत होकर मैदान में उतरना होगा।
