अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप

ग्रीनलैंड पर बनी सहमति के बाद ट्रंप का यू-टर्न, यूरोपीय देशों पर टैरिफ टालने का ऐलान

नई दिल्ली,23 जनवरी (युआईटीवी)- अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने दूसरे कार्यकाल में एक बार फिर आक्रामक व्यापार नीति को लेकर सुर्खियों में हैं,लेकिन इस बार उन्होंने अपने ही फैसले से आंशिक रूप से यू-टर्न ले लिया है। ग्रीनलैंड और आर्कटिक क्षेत्र को लेकर नाटो के साथ बनी नई सहमति के बाद ट्रंप ने यूरोपीय देशों पर 1 फरवरी से लागू होने वाले टैरिफ फिलहाल नहीं लगाने का ऐलान किया है। यह फैसला ऐसे समय में आया है,जब ट्रंप प्रशासन पहले ही दुनिया के कई देशों,जिनमें भारत भी शामिल है,पर टैरिफ लगाने के कारण अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आलोचना झेल रहा है।

ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका और यूरोप के बीच बढ़ते तनाव के बीच ट्रंप का यह कदम कूटनीतिक दृष्टि से अहम माना जा रहा है। राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रूथ सोशल पर इस फैसले की जानकारी देते हुए कहा कि नाटो महासचिव मार्क रूट के साथ उनकी एक “बहुत अच्छी मीटिंग” हुई है। इस बैठक के आधार पर ग्रीनलैंड ही नहीं,बल्कि पूरे आर्कटिक इलाके के लिए भविष्य की एक व्यापक डील का फ्रेमवर्क तैयार किया गया है। ट्रंप के मुताबिक,अगर यह समाधान पूरी तरह लागू होता है,तो यह अमेरिका और सभी नाटो देशों के लिए फायदेमंद साबित होगा।

ट्रंप ने अपने पोस्ट में साफ किया कि इसी समझौते के चलते उन्होंने यूरोपीय देशों पर प्रस्तावित टैरिफ लगाने का फैसला फिलहाल टाल दिया है। उन्होंने लिखा कि “इस समझ के आधार पर मैं वे टैरिफ नहीं लगाऊँगा जो 1 फरवरी से लागू होने वाले थे।” यह बयान ऐसे समय आया है,जब ट्रंप ने हाल ही में यूरोप को लेकर बेहद सख्त भाषा का इस्तेमाल किया था और व्यापारिक मोर्चे पर दबाव बनाने की रणनीति अपनाई थी।

ग्रीनलैंड का मुद्दा ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में एक बार फिर रणनीतिक बहस के केंद्र में आ गया है। ट्रंप पहले भी ग्रीनलैंड की रणनीतिक अहमियत पर जोर देते रहे हैं और इसे अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ते रहे हैं। अपने ताजा बयान में उन्होंने ग्रीनलैंड से जुड़े मिसाइल डिफेंस शील्ड ‘द गोल्डन डोम’ का भी जिक्र किया। ट्रंप ने कहा कि इस रक्षा प्रणाली को लेकर बातचीत अभी जारी है और जैसे-जैसे चर्चा आगे बढ़ेगी और जानकारी साझा की जाएगी। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इस पूरी बातचीत की जिम्मेदारी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस,अमेरिकी विदेश सचिव मार्को रुबियो,खास दूत स्टीव विटकॉफ और जरूरत पड़ने पर अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के पास होगी,जो सीधे उन्हें रिपोर्ट करेंगे।

ट्रंप का यह रुख ऐसे समय सामने आया है,जब उन्होंने हाल ही में स्विट्जरलैंड के दावोस में विश्व आर्थिक मंच के दौरान यूरोप पर खुलकर हमला बोला था। अपने संबोधन की शुरुआत में ही ट्रंप ने कहा था कि “यहाँ दूसरी बार इतने सारे दोस्तों और कुछ दुश्मनों के बीच आकर अच्छा लग रहा है।” इस बयान को लेकर भी काफी चर्चा हुई थी,क्योंकि इसे यूरोपीय नेताओं के लिए एक कड़ा संदेश माना गया।

दावोस में ट्रंप ने यूरोप की इमिग्रेशन नीति और आर्थिक नीतियों की जमकर आलोचना की थी। उन्होंने कहा था कि यूरोप की नीतियों के नतीजे “विनाशकारी” रहे हैं,जबकि इसके मुकाबले अमेरिका में एक “आर्थिक चमत्कार” देखने को मिल रहा है। ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिका में उनकी नीतियों के चलते रोजगार बढ़े हैं,निवेश आया है और अर्थव्यवस्था मजबूत हुई है,जबकि यूरोप गलत दिशा में आगे बढ़ रहा है।

अपने भाषण में ट्रंप ने कहा, “मुझे यूरोप से प्यार है और मैं चाहता हूँ कि यूरोप आगे बढ़े,लेकिन वह सही दिशा में नहीं जा रहा है।” उन्होंने इसके लिए लगातार बढ़ते सरकारी खर्च,बिना नियंत्रण के बड़े पैमाने पर प्रवासन और अंतहीन विदेशी आयात को जिम्मेदार ठहराया। ट्रंप का मानना है कि यही वजह है कि यूरोप आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों से जूझ रहा है।

ट्रंप ने यह भी कहा कि आर्थिक मामलों में यूरोप को अमेरिका जैसा बनने की जरूरत है। उनके मुताबिक,यूरोप को वही करना चाहिए जो अमेरिका कर रहा है,तभी वह अपनी समस्याओं से बाहर निकल सकता है। इस दौरान उन्होंने यूरोप के ग्रीन एनर्जी फोकस पर भी सवाल उठाए और कहा कि अत्यधिक पर्यावरणीय नियमों ने उद्योग और विकास को नुकसान पहुँचाया है।

इसके साथ ही ट्रंप ने “बिना रोक-टोक के बड़े पैमाने पर माइग्रेशन” को यूरोप की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक बताया। उन्होंने दावा किया कि यूरोप के कुछ इलाके अब “सच में पहचानने लायक नहीं रहे हैं।” ट्रंप ने कहा कि उनके दोस्त जब यूरोप की अलग-अलग जगहों से वापस आते हैं,तो नेगेटिव अंदाज में कहते हैं कि “मैं इसे पहचान नहीं पा रहा हूँ।” इस बयान को लेकर भी यूरोप में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली थी।

हालाँकि,ग्रीनलैंड और आर्कटिक क्षेत्र को लेकर नाटो के साथ बनी नई सहमति के बाद ट्रंप का टैरिफ पर यू-टर्न यह दिखाता है कि अमेरिका फिलहाल यूरोप के साथ टकराव को पूरी तरह चरम पर ले जाने के मूड में नहीं है। जानकारों का मानना है कि आर्कटिक क्षेत्र में रूस और चीन की बढ़ती गतिविधियों के बीच अमेरिका और नाटो के लिए आपसी सहयोग और भी अहम हो गया है। ऐसे में ट्रंप का यह कदम रणनीतिक संतुलन साधने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

फिलहाल, ट्रंप के इस फैसले से यूरोपीय देशों को अस्थायी राहत जरूर मिली है,लेकिन यह साफ है कि अमेरिका की सख्त व्यापार नीति पूरी तरह बदली नहीं है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि ग्रीनलैंड और आर्कटिक को लेकर बनने वाला यह फ्रेमवर्क वास्तव में किस दिशा में जाता है और क्या ट्रंप भविष्य में फिर से टैरिफ की धमकी देते हैं या नहीं।